जल-जंगल-जमीन पर आदिवासी अधिकारों हुंकार! 16 राज्यों से पहुंचे हजारों आदिवासी प्रतिनिधि
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नई दिल्ली
By ACGN – 7647981711, 9303948009
संवाददाता :- संजय पराते
16 राज्यों से पहुंचे हजारों आदिवासी प्रतिनिधि, दिल्ली में राष्ट्रीय कन्वेंशन के बाद निकाला मार्च; वनाधिकार, विस्थापन, रोजगार, शिक्षा और आदिवासी पहचान के सवालों पर उठी आवाज
राजधानी में गूंजा आदिवासी अधिकारों का सवाल
नई दिल्ली ACGN:- जल, जंगल और जमीन पर अधिकार के सवाल को लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों से आए आदिवासी प्रतिनिधियों ने दिल्ली में अपनी आवाज बुलंद की। 6 सितंबर को मावलंकर हॉल, कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में आयोजित आदिवासी अधिकार संघर्ष सम्मेलन में 16 राज्यों से 1,000 से अधिक प्रतिनिधियों के शामिल होने का दावा किया गया। इसके अगले दिन 7 सितंबर को भगत सिंह शहीद पार्क से बहादुर शाह जफर मार्ग तक मार्च निकाला गया।
मार्च के दौरान आदिवासी अधिकार, जल-जंगल-जमीन और अपने संसाधनों पर समुदाय के अधिकार से जुड़े नारे लगाए गए। आयोजकों के मुताबिक, यह दो दिवसीय कार्यक्रम आदिवासी समुदायों के अलग-अलग संघर्षों को एक साझा मंच पर लाने की कोशिश थी।

हसदेव से नागरहोल तक एक मंच
सम्मेलन में छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य, मध्य प्रदेश के केन-बेतवा, कर्नाटक के नागरहोल टाइगर रिजर्व और तेलंगाना की पोलावरम परियोजना से जुड़े आंदोलनों के प्रतिनिधियों ने अपने अनुभव साझा किए।
इसके अलावा अखिल भारतीय किसान सभा, भारत जन आंदोलन, अखिल भारतीय खेत मजदूर यूनियन, अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति, कैंपेन फॉर सर्वाइवल एंड डिग्निटी, छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन और मजदूर-किसान शक्ति संगठन सहित विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधि भी कार्यक्रम में शामिल हुए।
सम्मेलन में वनाधिकार, रोजगार, शिक्षा तथा आदिवासी पहचान और विश्वास जैसे मुद्दों पर अलग-अलग सत्र आयोजित किए गए।
कानून है, लेकिन अधिकार कहां?
सम्मेलन का उद्घाटन सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस मदन लोकुर ने किया। सम्मेलन की रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने पांचवीं और छठी अनुसूची, वनाधिकार कानून और पेसा जैसे संवैधानिक एवं कानूनी प्रावधानों के कमजोर क्रियान्वयन पर चिंता जताई।
उन्होंने ग्राम सभाओं की भूमिका और आदिवासियों के अधिकारों के प्रभावी क्रियान्वयन का मुद्दा उठाते हुए कहा कि कानून बनने के बावजूद जमीनी स्तर पर कई चुनौतियां बनी हुई हैं।
पेसा और ग्रामसभा पर सबसे बड़ा सवाल
वनाधिकार कानून और पेसा के मुद्दे पर सम्मेलन में वक्ताओं ने ग्रामसभा की वास्तविक भूमिका सुनिश्चित करने की मांग उठाई। सम्मेलन में प्रस्तुत एक प्रस्ताव के अनुसार, पांचवीं अनुसूची और पेसा का दायरा सीमित अनुसूचित क्षेत्रों तक होने के कारण बड़ी संख्या में अनुसूचित जनजाति समुदाय इन संवैधानिक सुरक्षा प्रावधानों से बाहर रह जाते हैं।
वक्ताओं ने आरोप लगाया कि कई जगह ग्रामसभाओं के फैसलों को प्रशासनिक स्तर पर कमजोर किया जाता है और उनकी सहमति को महज औपचारिकता बना दिया जाता है। महाराष्ट्र के कार्यकर्ता अमोल वाघमारे ने भी ग्रामसभा के अधिकारों के कथित उल्लंघन का मुद्दा उठाया।
इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि सम्मेलन की सामग्री से नहीं होती, लेकिन यह स्पष्ट है कि ग्रामसभा की स्वायत्तता सम्मेलन की प्रमुख मांगों में रही।
वनाधिकार दावों पर भी सवाल
सम्मेलन में वनाधिकार कानून के तहत किए गए दावों की मंजूरी और निरस्तीकरण की प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल उठाए गए। वक्ताओं ने आरोप लगाया कि कई मामलों में ऐसे दस्तावेज मांगे जाते हैं, जिनकी कानून के तहत अनिवार्यता नहीं है और कई दावों को पर्याप्त कारण बताए बिना खारिज कर दिया जाता है।
सम्मेलन में दावा किया गया कि वनाधिकार दावों के निराकरण में आदिवासी समुदायों को अनेक प्रशासनिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में गठित टास्क फोर्स की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए।

विस्थापन बना सबसे बड़ा दर्द
सम्मेलन में आदिवासी विस्थापन का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा। विभिन्न राज्यों से आए प्रतिनिधियों ने खनन, बांध, औद्योगिक परियोजनाओं और वन संरक्षण से जुड़ी परियोजनाओं के कारण विस्थापन की आशंका और उससे जुड़ी समस्याओं को सामने रखा।
छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य को लेकर वक्ताओं ने ग्रामसभा की सहमति और वन कटाई के आरोप उठाए। वहीं तेलंगाना के कुमराम भीम क्षेत्र से जुड़े प्रतिनिधियों ने कथित विस्थापन का मुद्दा उठाते हुए कहा कि उनके संघर्ष के चलते संबंधित परियोजना फिलहाल रुकी हुई है।
सम्मेलन में यह भी सवाल उठाया गया कि देश में विकास परियोजनाओं से प्रभावित और विस्थापित परिवारों का केंद्रीय स्तर पर समग्र आंकड़ा उपलब्ध क्यों नहीं है।
रोजगार में प्रतिनिधित्व पर चिंता
रोजगार के सत्र में सरकारी नौकरियों में आदिवासी समुदाय के प्रतिनिधित्व और आरक्षित पदों के खाली रहने का मुद्दा उठाया गया। सम्मेलन में प्रस्तुत आंकड़ों के आधार पर वक्ताओं ने कहा कि एक तरफ सरकारी क्षेत्र में रोजगार के अवसर घट रहे हैं, वहीं दूसरी ओर आरक्षित पदों का पूरा लाभ भी समुदाय तक नहीं पहुंच पा रहा है।
वक्ताओं ने केंद्र और राज्य सरकारों से आरक्षित पदों को भरने तथा रोजगार से जुड़े आंकड़ों को सार्वजनिक करने की मांग की।
स्कूल बंद होने से आदिवासी शिक्षा पर असर?
शिक्षा सत्र में सरकारी स्कूलों के विलय और बंद होने से आदिवासी क्षेत्रों के बच्चों पर पड़ने वाले प्रभाव पर चर्चा हुई। सम्मेलन में प्रस्तुत सामग्री में 2018-19 के बाद बड़ी संख्या में स्कूलों के बंद होने का दावा किया गया।
एकलव्य विद्यालयों, आदिवासी छात्रावासों, भोजन, पानी और स्वास्थ्य सुविधाओं से जुड़ी समस्याओं को भी प्रतिनिधियों ने सामने रखा। महाराष्ट्र की छात्र नेता निशा साबले ने आदिवासी छात्रावासों की कथित बदहाल व्यवस्था का मुद्दा उठाया।
सम्मेलन में यह मांग भी उठी कि आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा व्यवस्था को स्थानीय जरूरतों और भाषाओं के अनुरूप मजबूत किया जाए।
पहचान और भाषा भी संघर्ष का हिस्सा
सम्मेलन का अंतिम सत्र आदिवासी पहचान और विश्वास पर केंद्रित रहा। वक्ताओं ने कहा कि आदिवासी समुदायों के लिए जमीन और जंगल के अधिकार के साथ उनकी भाषा, संस्कृति और धार्मिक पहचान भी महत्वपूर्ण है।
गोंडी, भीली और कोक बोरोक जैसी भाषाओं को पर्याप्त संवैधानिक एवं शैक्षणिक मान्यता और संसाधन नहीं मिलने का मुद्दा उठाया गया। वक्ताओं ने मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा के संवैधानिक प्रावधान को प्रभावी रूप से लागू करने की मांग की।
कुछ वक्ताओं ने एकलव्य विद्यालयों में भाषा और सांस्कृतिक पहचान से जुड़े सवाल भी उठाए।
धर्म और आदिवासी पहचान पर भी टकराव
सम्मेलन में आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति सूची से बाहर करने की मांगों और धर्मांतरण के मुद्दे पर भी चर्चा हुई। कुछ वक्ताओं ने आरोप लगाया कि धर्मांतरण के आधार पर आदिवासी समुदायों को उनके संवैधानिक अधिकारों से वंचित करने की कोशिश की जा रही है।
यह विषय राजनीतिक और सामाजिक रूप से संवेदनशील है। सम्मेलन में लगाए गए इन आरोपों को संबंधित संगठनों और वक्ताओं के दावों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
चार प्रस्तावों में क्या मांग?
सम्मेलन के अंत में चार प्रस्ताव पारित किए गए। इनमें वनाधिकार के निरस्त दावों की समयबद्ध समीक्षा, पेसा के प्रावधानों को प्रभावी रूप से लागू करना, ग्रामसभा के अधिकारों की रक्षा, आरक्षित पदों को भरना और रोजगार संबंधी आंकड़े सार्वजनिक करना जैसी मांगें शामिल रहीं।
इसके अलावा वर्तमान जनगणना में आदिवासी समुदायों को अपनी धार्मिक पहचान दर्ज कराने के लिए अलग कॉलम उपलब्ध कराने की मांग भी सम्मेलन में उठाई गई।
अब सरकार के सामने अगली परीक्षा
समापन के दौरान वक्ताओं ने कहा कि आदिवासी अधिकारों से जुड़े सवाल केवल किसी एक राज्य या एक परियोजना तक सीमित नहीं हैं। जमीन, जंगल, रोजगार, शिक्षा, भाषा और सांस्कृतिक पहचान जैसे मुद्दे आपस में जुड़े हुए हैं।
आयोजकों के अनुसार, सम्मेलन में पारित प्रस्तावों और मांगों को लेकर आदिवासी अधिकार राष्ट्रीय मंच संबंधित अधिकारियों से मुलाकात करेगा।
दिल्ली के इस सम्मेलन ने एक बार फिर यह सवाल सामने रखा है कि विकास की दौड़ में आदिवासी समुदाय की जमीन, जंगल, संस्कृति और निर्णय लेने के अधिकारों की जगह आखिर कितनी है? इसका जवाब केवल नारों से नहीं, बल्कि कानूनों के वास्तविक और निष्पक्ष क्रियान्वयन से ही सामने आएगा।
प्रदीप मिश्रा
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