कलेक्टर परिसर में कचरा और शराब की बोतलें, निगम की सफाई व्यवस्था पर बड़ा सवाल!
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कोरबा, छत्तीसगढ़
By ACGN – 7647981711, 9303948009
संवाददाता :- प्रदीप मिश्रा
नीचे कचरे का ढेर, आसपास डिस्पोजल का अंबार और शराब की बोतलें, सूत्रों के मुताबिक छत पर भी मिल सकती है शराब की बोतल, आखिर माजरा क्या है?
जिस कार्यालय से पूरे जिले की व्यवस्था चलती है, उसी के आसपास गंदगी ने खड़े किए सवाल – नगर निगम की सफाई व्यवस्था भी कटघरे में

कोरबा ACGN:- कलेक्टर कार्यालय जिले का सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक केंद्र। यहीं से विकास की योजनाओं की समीक्षा होती है, अधिकारियों को दिशा-निर्देश दिए जाते हैं और जनता से जुड़ी समस्याओं के समाधान की निगरानी की जाती है। लेकिन जब इसी महत्वपूर्ण कार्यालय के आसपास प्लास्टिक की बोतलें, डिस्पोजल प्लेट, थालियां, गिलास और खाने-पीने का कचरा दिखाई देने लगे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है, और जब इसी कचरे के बीच शराब की प्लास्टिक बोतलें पड़ी होने की बात सामने आए, तो मामला केवल सफाई तक सीमित नहीं रहता।

बोतल पड़ी है… लेकिन सवाल किस पर?
शराब की बोतल परिसर के आसपास कैसे पहुंची? किसने फेंकी? कब फेंकी? क्या यह बाहर से आया कचरा है या परिसर के आसपास किसी ने इसे छोड़ा? इन सवालों का जवाब अभी जांच के बिना नहीं दिया जा सकता। लेकिन इतना जरूर है कि कलेक्टर कार्यालय जैसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण परिसर में शराब की बोतल का मिलना सामान्य बात नहीं मानी जा सकती।
यह किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप लगाने का मामला नहीं, बल्कि व्यवस्था और निगरानी की जांच का विषय जरूर है।

छत की बात ने बढ़ाया रहस्य
मामले को और गंभीर बनाने वाली जानकारी यह है कि सूत्रों के मुताबिक कलेक्टर कार्यालय परिसर की छत पर भी शराब की बोतल पड़ी होने की जानकारी सामने आ रही है।
अगर यह जानकारी जांच में सही पाई जाती है तो सवाल और बड़ा हो जाएगा, आखिर कोई छत तक पहुंचा कैसे?
क्या छत पर जाने के रास्ते की निगरानी होती है?
क्या वहां अनधिकृत आवाजाही पर नजर रखी जाती है?
क्या परिसर में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज से इसकी पड़ताल हो सकती है?
नीचे कचरे में बोतल और ऊपर छत पर बोतल, यह महज लापरवाही है या इसके पीछे कोई ऐसी कहानी है जिसे सामने आना बाकी है?

डिस्पोजल की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं
परिसर और आसपास केवल बोतलें ही नहीं, बल्कि प्लास्टिक के डिस्पोजल, प्लेट, थालियां, गिलास और खाने-पीने के बाद बचा कचरा भी पड़े होने की बात सामने आ रही है।
बैठकें होती हैं। चाय-नाश्ता आता है। अधिकारी और कर्मचारी अपनी जिम्मेदारियों में व्यस्त रहते हैं। लेकिन सवाल यह है कि बैठक खत्म होने के बाद उस कचरे का क्या होता है?
क्या कचरे को निर्धारित स्थान पर डाला जाता है?
क्या सफाई कर्मचारी नियमित रूप से सफाई करते हैं?
या फिर कचरा सरकारी परिसर की दीवारों और आसपास की जमीन को ही अपना स्थायी ठिकाना बना चुका है?


नगर निगम की सफाई व्यवस्था पर भी सवाल
एक तरफ नगर पालिक निगम स्वच्छ शहर का सपना दिखाता है। सफाई अभियान चलाए जाते हैं। लोगों को कचरा इधर-उधर नहीं फेंकने की समझाइश दी जाती है।
लेकिन अगर जिले के सबसे महत्वपूर्ण सरकारी कार्यालय के आसपास ही गंदगी नजर आए, तो आम नागरिक के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है, जब कलेक्टर कार्यालय ही साफ नहीं दिखेगा, तो शहर की गलियों से स्वच्छता की उम्मीद कैसे की जाएगी?
सरकारी कार्यालयों के आसपास सफाई सबसे पहले और सबसे बेहतर होनी चाहिए, क्योंकि यही स्थान आम नागरिकों के लिए प्रशासन की कार्यशैली का पहला आईना होते हैं।
कचरा केवल बदसूरती नहीं, बेजुबानों के लिए खतरा भी
कचरे में पड़ी प्लास्टिक की थैलियां, डिस्पोजल और खाने का सामान आवारा पशुओं के लिए बड़ा खतरा बन सकते हैं। भोजन की तलाश में पशु अक्सर प्लास्टिक समेत कचरा निगल लेते हैं।
कार्यालय के आसपास घूमते पशु यदि इस कचरे को खाते हैं तो उनकी जान भी खतरे में पड़ सकती है।
कुछ समय पहले आसपास एक पशु की मौत की बात भी सामने आई थी। उसकी वास्तविक मौत का कारण अधिकृत पशु चिकित्सा जांच या पोस्टमार्टम रिपोर्ट से ही स्पष्ट हो सकता है। इसलिए इस मामले में भी अनुमान के बजाय जांच जरूरी है।
हमने बनाया है, हम ही संवारेंगे… लेकिन शुरुआत कहां से?
सरकार विकास की बात करती है। शहर को बेहतर बनाने की बात करती है। स्वच्छता अभियान चलाती है।
“हमने बनाया है, हम ही संवारेंगे” – यह सोच तभी सार्थक होगी, जब संवारने की शुरुआत उन जगहों से भी हो जहां से पूरे जिले को दिशा दी जाती है।
कलेक्टर कार्यालय कोई सामान्य जगह नहीं है। यह प्रशासन का चेहरा है। यहां की स्वच्छता केवल सफाई कर्मचारी की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की प्रतिष्ठा से जुड़ी हुई है।
अब सवाल बोतल से आगे बढ़ चुका है
शराब की बोतल किसने फेंकी?
छत तक बोतल कैसे पहुंची?
रात में परिसर की निगरानी कैसी है?
सीसीटीवी कैमरे क्या कहते हैं?
सफाई कितनी नियमित है?
कचरा कौन उठाता है? और सबसे बड़ा सवाल क्या कलेक्टर कार्यालय के आसपास की सफाई व्यवस्था की कभी गंभीरता से समीक्षा हुई है?, इन सवालों के जवाब किसी आरोप से नहीं, बल्कि जांच और कार्रवाई से मिलने चाहिए।
क्योंकि जनता केवल यह नहीं देखती कि सरकार क्या कहती है। जनता यह भी देखती है कि सरकारी कार्यालयों के दरवाजे के बाहर सरकार की व्यवस्था कैसी दिखाई देती है।
समाधान की जरूरत
सिर्फ सवाल उठाने से व्यवस्था नहीं बदलेगी, इसके लिए ठोस समाधान भी जरूरी है। कलेक्टर कार्यालय सहित जिले के सभी प्रमुख सरकारी कार्यालयों के आसपास पर्याप्त संख्या में डस्टबिन लगाए जाएं और कचरा डालने के लिए एक स्थायी स्थान निर्धारित किया जाए। नगर निगम द्वारा वहां प्रतिदिन नियमित सफाई और कचरा उठाने की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
साथ ही सफाई व्यवस्था की नियमित निगरानी हो और लापरवाही मिलने पर जिम्मेदारी तय की जाए। कचरा खुले में न फैले और आवारा पशु उसे न खाएं, इसके लिए भी उचित व्यवस्था जरूरी है। सरकारी कार्यालय प्रशासन की पहचान होते हैं, इसलिए इन परिसरों की स्वच्छता भी उतनी ही जरूरी है जितनी शहर की सड़कों और बाजारों की।
स्वच्छता का संदेश बाहर देने से पहले उसकी शुरुआत सरकारी कार्यालयों से हो, तभी “हमने बनाया है, हम ही संवारेंगे” की सोच वास्तव में जमीन पर दिखाई देगी।
अब देखना यह है कि इस कचरे पर झाड़ू कब चलती है और इन बोतलों के रहस्य से पर्दा कब उठता है।
प्रदीप मिश्रा
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