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तारा का रहस्य! जंगल के नीचे क्या था, 2023 में क्यों रुका और 2026 में फिर कैसे खुल गया रास्ता?

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Tara Coal Block Full Story Hasdeo
सूरजपुर, छत्तीसगढ़

By ACGN – 7647981711, 9303948009
संवाददाता :-  संतोष यादव

तारा की पूरी कहानी: जंगल के नीचे छिपा कोयला और तीन साल बाद बदली तस्वीर

हसदेव के जंगलों के बीच मौजूद तारा कोल ब्लॉक आखिर इतना महत्वपूर्ण क्यों है? 2023 में जिस ब्लॉक की नीलामी पर छत्तीसगढ़ सरकार ने आपत्ति जताई और केंद्र ने उसे नीलामी से वापस ले लिया, वही तारा 2026 में फिर नीलाम हो गया। आखिर तीन साल में ऐसा क्या बदला? यही है तारा की पूरी कहानी।


सूरजपुर ACGN:- पहले तारा को समझिए – तारा कोई छोटा-मोटा कोयला क्षेत्र नहीं है। यह छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य क्षेत्र में स्थित कोयला ब्लॉक है और इसका एक हिस्सा सूरजपुर जिले में आता है। हसदेव अरण्य देश के महत्वपूर्ण वन क्षेत्रों में गिना जाता है और इसी जंगल के नीचे कोयले के बड़े भंडार मौजूद हैं। इसलिए तारा की कहानी शुरू होते ही दो चीजें आमने-सामने खड़ी दिखाई देती हैं एक तरफ देश की ऊर्जा जरूरत और कोयला, दूसरी तरफ जंगल, पानी, जैव विविधता और उस पर निर्भर स्थानीय जीवन।
तारा की अहमियत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 2026 की आधिकारिक नीलामी में इसके भूगर्भीय कोयला भंडार 293.91 मिलियन टन और PRC क्षमता 6 मिलियन टन प्रतिवर्ष बताई गई।
नीचे कोयला, ऊपर जंगल – तारा की असली पेचीदगी यहीं से शुरू होती है। वर्ष 2023 में सामने आए सरकारी और मीडिया दस्तावेजों के अनुसार तारा ब्लॉक का लगभग 81 प्रतिशत क्षेत्र वन आवरण वाला बताया गया था और करीब 15.96 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र Very Dense Forest यानी अत्यंत घने वन के रूप में दर्ज था। यानी तारा को सिर्फ कोयले का नक्शा देखकर समझना संभव नहीं था। उसके नीचे कोयला था, लेकिन उसके ऊपर ऐसा जंगल था जिसे लेकर पर्यावरणीय सवाल पहले से मौजूद थे।
फिर आई नीलामी – वर्ष 2023 में केंद्र सरकार ने व्यावसायिक कोयला खदानों की नीलामी के सातवें दौर में तारा को भी शामिल किया। यह वही दौर था जिसमें देश के कई कोयला ब्लॉकों को निजी क्षेत्र के लिए नीलामी में रखा गया था।
केंद्र सरकार का पक्ष यह था कि कोयला ब्लॉकों की पहचान करते समय पर्यावरणीय मानकों और उपलब्ध जैव-विविधता अध्ययन को ध्यान में रखा गया था। कोयला मंत्रालय ने 2023 में कहा था कि तारा को हसदेव-अरण्य कोलफील्ड की जैव-विविधता संबंधी अध्ययन रिपोर्ट की सिफारिशों के आधार पर नीलामी के लिए चुना गया था। मंत्रालय ने यह भी कहा था कि वास्तविक खनन के लिए आगे वन और पर्यावरण संबंधी वैधानिक मंजूरियों की प्रक्रिया होती है। यानी केंद्र की नजर में तारा को नीलामी के लिए चुना जाना अपने आप में खनन की अंतिम अनुमति नहीं थी।
लेकिन छत्तीसगढ़ सरकार की चिंता अलग थी।

छत्तीसगढ़ ने रोक लगा दी – जून 2023 में तत्कालीन छत्तीसगढ़ सरकार ने केंद्र को पत्र लिखकर राज्य के 23 प्रस्तावित कोयला ब्लॉकों में से नौ को व्यावसायिक नीलामी से बाहर रखने का अनुरोध किया। इन नौ ब्लॉकों में तारा भी शामिल था।
राज्य सरकार ने पर्यावरणीय नुकसान और स्थानीय पारिस्थितिकी पर संभावित प्रभाव का हवाला दिया था। राज्य की ओर से यह भी कहा गया था कि हसदेव क्षेत्र में खनन से स्थानीय पर्यावरण और कई गांवों के जीवन पर असर पड़ सकता है। और फिर वह हुआ जिसकी वजह से तारा की कहानी पूरे देश में चर्चा में आ गई।
28 जुलाई का फैसला – केंद्रीय कोयला मंत्रालय ने 28 जुलाई 2023 को तारा को उस समय चल रही व्यावसायिक कोयला नीलामी प्रक्रिया से वापस लेने का फैसला किया।
यानी नीलामी की प्रक्रिया आगे बढ़ रही थी, बोलीदाता सामने आ चुके थे, लेकिन तारा अचानक उस दौर की नीलामी से बाहर हो गया।
उस समय तारा के लिए बोली लगाने वाली कंपनियों में Gujarat Mineral Development Corporation, Jindal Steel and Power Limited और Raigarh Natural Resources Limited के नाम सामने आए थे। तारा उस दौर में छत्तीसगढ़ का ऐसा ब्लॉक था जिसे बोलीदाता मिले थे, फिर भी वह नीलामी से वापस ले लिया गया।
रुका क्यों था तारा? – यही वह सवाल है जिसे समझना सबसे जरूरी है। तारा इसलिए नहीं रुका था कि उसके नीचे कोयला नहीं था। तारा इसलिए नहीं रुका था कि उसमें कोई आर्थिक संभावना नहीं थी। असली विवाद था जंगल और पर्यावरण का।
छत्तीसगढ़ सरकार का कहना था कि हसदेव क्षेत्र के ऐसे कोयला ब्लॉकों की नीलामी से स्थानीय पारिस्थितिकी और ग्रामीण जीवन पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। दूसरी ओर केंद्र सरकार का कहना था कि तारा को उपलब्ध जैव-विविधता अध्ययन और निर्धारित प्रक्रियाओं को ध्यान में रखते हुए नीलामी के लिए चुना गया था और वास्तविक खनन से पहले जरूरी पर्यावरण एवं वन मंजूरियां अलग प्रक्रिया के तहत होती हैं।
यानी उस समय विवाद का केंद्र था—कोयला निकले या जंगल बचाया जाए?
कहानी यहीं खत्म नहीं हुई – तारा नीलामी से बाहर हो गया, लेकिन कोयले की कहानी वहीं समाप्त नहीं हुई।
समय आगे बढ़ा। देश में व्यावसायिक कोयला खनन की नीति जारी रही। वर्ष 2020 से निजी क्षेत्र के लिए व्यावसायिक कोयला खनन की नीलामी व्यवस्था को आगे बढ़ाया गया और प्रतिस्पर्धी ऑनलाइन बोली प्रक्रिया के माध्यम से ब्लॉकों की नीलामी होने लगी। हसदेव का तारा भी आखिरकार फिर लौट आया।
तीन साल बाद फिर वही नाम – वर्ष 2026 में केंद्रीय कोयला मंत्रालय ने तारा को फिर नीलामी के लिए रखा। इस बार इसका नाम था – Tara (Revised)।
अगस्त 2026 में हुई नीलामी के परिणाम ने 2023 की कहानी को फिर जिंदा कर दिया। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार तारा के लिए रिजर्व प्राइस 4 प्रतिशत था, जबकि अंतिम बोली 37.50 प्रतिशत तक पहुंची। सफल बोलीदाता के रूप में CG Syn-Gas and Chemicals Limited का नाम सामने आया।
यानी जिस तारा को 2023 में नीलामी प्रक्रिया से वापस ले लिया गया था, वह 2026 में फिर प्रतिस्पर्धी नीलामी के जरिए सामने आ चुका था।
तारा कितना बड़ा है? – इस बार सामने आए सरकारी आंकड़े कहानी को और बड़ा बना देते हैं, तारा के लिए 6 मिलियन टन प्रतिवर्ष की PRC क्षमता और 293.91 मिलियन टन भूगर्भीय भंडार दर्ज किया गया है। अंतिम बोली 37.50 प्रतिशत रही।
ध्यान रखने वाली बात यह है कि केंद्रीय मंत्रालय ने छह नीलाम किए गए ब्लॉकों के लिए कुल मिलाकर लगभग ₹1,983.67 करोड़ सालाना राजस्व, ₹1,743 करोड़ पूंजी निवेश और 15,710 रोजगार की संभावित बात कही है। ये आंकड़े सभी छह ब्लॉकों के संयुक्त हैं, केवल तारा के नहीं।
फिर कंपनी का नाम आया – नीलामी परिणाम सामने आने के बाद एक और सवाल उठने लगा – CG Syn-Gas and Chemicals Limited आखिर है कौन?
उपलब्ध कॉरपोरेट जानकारी के अनुसार कंपनी वर्ष 2025 में गठित हुई थी और उसका संबंध Mundra Synenergy Limited से है। यही कॉरपोरेट संबंध राजनीतिक बहस में अडानी समूह से जुड़े सवालों का आधार बना, लेकिन यहां तथ्य और राजनीति को अलग-अलग रखना जरूरी है। सरकारी नीलामी परिणाम में विजेता का नाम CG Syn-Gas and Chemicals Limited है। इसलिए खबर में इसे सीधे “अडानी के नाम पर नीलामी” कहना सरकारी रिकॉर्ड की भाषा नहीं होगी। कंपनी की कॉरपोरेट संरचना और उसके संबंध अलग तथ्यात्मक विषय हैं।

यहीं से राजनीति गरम हुई – नीलामी की खबर सामने आते ही पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सोशल मीडिया पर सरकार पर तीखा हमला बोला, उन्होंने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय पर निशाना साधते हुए व्यंग्य किया, “बधाई हो अडानीगढ़ के CEO सह छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय जी!”
बघेल ने कहा कि जिस तारा ब्लॉक की नीलामी पर उनकी सरकार ने वर्ष 2023 में आपत्ति जताई थी, वही ब्लॉक अब नीलाम हो गया है।
“तारा हमारी जीवन वायु है” – भूपेश बघेल ने अपने सोशल मीडिया बयान में तारा को हसदेव के भविष्य से जोड़ते हुए इसे “हमारी जीवन वायु” बताया। उन्होंने जंगलों की कटाई, हसदेव की पारिस्थितिकी और पानी के भविष्य को लेकर गंभीर सवाल उठाए।
उन्होंने पेड़ों की कटाई को लेकर बड़े आंकड़ों का भी दावा किया और हसदेव बांगो बांध तक संभावित प्रभाव की चिंता जताई।
हालांकि इन आंकड़ों को खबर में भूपेश बघेल के दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए। पेड़ों की वास्तविक संख्या या किसी जलाशय पर परियोजना के प्रभाव का अंतिम निष्कर्ष संबंधित आधिकारिक वन, पर्यावरण और तकनीकी अध्ययनों से ही निकलेगा।
कांग्रेस ने उठाया पुराना फैसला – कांग्रेस की राजनीति का सबसे मजबूत आधार यही है कि वह 2023 के फैसले को सामने रख रही है, उस समय राज्य सरकार ने तारा सहित नौ ब्लॉकों की नीलामी रोकने की मांग की थी और तारा वास्तव में उस नीलामी से बाहर भी हुआ था। अब कांग्रेस पूछ रही है कि जब उस समय पर्यावरणीय चिंता के कारण तारा को रोकना जरूरी समझा गया था, तो तीन साल बाद ऐसी कौन-सी परिस्थितियां बदलीं कि वही ब्लॉक फिर नीलामी में आ गया?
यही सवाल अब कांग्रेस के राजनीतिक अभियान का केंद्र बनता दिखाई दे रहा है।
भाजपा का जवाब भी आया – कांग्रेस के हमले पर भाजपा ने भी पलटवार किया। भाजपा की ओर से कहा गया कि तारा की नीलामी किसी बंद कमरे में नहीं हुई, बल्कि केंद्र की निर्धारित प्रतिस्पर्धी ई-नीलामी प्रक्रिया के तहत हुई है।
भाजपा ने कांग्रेस के पुराने राजनीतिक रुख पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि वर्तमान सरकार वैधानिक प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ रही है और नीलामी का अर्थ यह नहीं कि तत्काल जंगल में खनन शुरू हो गया।
असल लड़ाई अब शुरू होगी – तारा की नीलामी हो चुकी है, लेकिन कहानी का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय अभी बाकी है।
अब सवाल यह नहीं है कि बोली किसने जीती। वह सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज हो चुका है।
अब सवाल यह है कि आगे क्या होगा?वन मंजूरी कैसे मिलेगी? पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन क्या कहेगा? स्थानीय लोगों और ग्रामसभाओं की भूमिका क्या होगी? जंगल पर कितना वास्तविक प्रभाव पड़ेगा? पानी के स्रोतों पर क्या असर होगा? पुनर्वास और आजीविका का क्या होगा?
और सबसे बड़ा सवाल – क्या विकास और जंगल के बीच कोई ऐसा रास्ता निकलेगा जिसमें कोयला भी मिले और हसदेव भी बचा रहे?
             2023 का तारा और 2026 का तारा
2023 में तारा के सामने पर्यावरण का सवाल इतना बड़ा था कि राज्य सरकार ने केंद्र से इसकी नीलामी रोकने का अनुरोध किया और केंद्र ने उसे उस दौर की नीलामी से वापस ले लिया।
2026 में वही तारा फिर नीलामी में आया और सफल बोलीदाता भी सामने आ गया।
यही बदलाव अब राजनीतिक विवाद का सबसे बड़ा आधार है।
एक पक्ष पूछ रहा है, तीन साल में आखिर बदला क्या?
दूसरा पक्ष कह रहा है, नीलामी नियमों के तहत हुई है और आगे की मंजूरियां अलग प्रक्रिया हैं।
सच इन दोनों दावों के बीच मौजूद दस्तावेजों और जमीन पर होने वाली अगली कार्रवाई से सामने आएगा।
                       तारा का आखिरी सवाल
तारा की कहानी केवल कोयले की कहानी नहीं है, यह उस विकास मॉडल की कहानी है जहां जमीन के नीचे अरबों-खरबों रुपये का संसाधन मौजूद है और जमीन के ऊपर सदियों पुराना जंगल।
एक तरफ देश को ऊर्जा चाहिए। दूसरी तरफ जंगल पानी, हवा, मिट्टी और जीवन देता है।
तारा इसी दोराहे पर खड़ा है, 2023 में उसकी राह रोक दी गई थी।
2026 में फिर रास्ता खोल दिया गया।
अब आने वाला समय बताएगा कि यह रास्ता सिर्फ कोयले की खदान तक जाता है या हसदेव के जंगलों के भविष्य का भी फैसला करता है।
क्योंकि तारा के नीचे कोयला जरूर है,  लेकिन तारा के ऊपर एक पूरा जंगल भी है, और इसीलिए तारा की असली कहानी अभी खत्म नहीं हुई है, अब शुरू हुआ है वह अध्याय, जिसके हर पन्ने पर विकास और पर्यावरण आमने-सामने खड़े होंगे।

प्रदीप मिश्रा
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