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अब छत्तीसगढ़ी की बारी? आठवीं अनुसूची के लिए राजभवन से उठी नई पहल

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रायपुर, छत्तीसगढ़

By ACGN – 7647981711, 9303948009
संवाददाता अनादी पांडेय रायपुर

डेढ़ करोड़ लोगों की जुबान, सदियों पुरानी साहित्यिक परंपरा और अब संविधान की आठवीं अनुसूची में जगह पाने की कोशिश—छत्तीसगढ़ी भाषा को लेकर राजभवन में हुई अहम बातचीत ने एक नई उम्मीद जगा दी है।

रायपुर ACGN:- जुबान से राजभवन तक छत्तीसगढ़ की मिट्टी में रची-बसी छत्तीसगढ़ी भाषा को लेकर लंबे समय से संरक्षण, संवर्धन और संवैधानिक पहचान की मांग उठती रही है। इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल तब सामने आई, जब छत्तीसगढ़ी के भाषाविदों ने राज्यपाल श्री रमेन डेका से लोक भवन में मुलाकात की। बातचीत का केंद्र था—छत्तीसगढ़ी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने की दिशा में आगे की राह तलाशना।
 सवाल सिर्फ भाषा का नहीं – भाषाविदों ने राज्यपाल के सामने छत्तीसगढ़ी भाषा की प्राचीनता, उसके साहित्य, व्याकरण, शब्दकोश और मानकीकरण की प्रक्रिया से जुड़ी जानकारी रखी। उनका कहना था कि छत्तीसगढ़ी प्रदेश की राजभाषा और प्रमुख संपर्क भाषाओं में है तथा करीब डेढ़ करोड़ लोग इसका इस्तेमाल करते हैं।
यानी मांग सिर्फ यह नहीं है कि छत्तीसगढ़ी बोली जाए, बल्कि यह है कि उसे उसकी व्यापक सामाजिक और साहित्यिक पहचान के अनुरूप संवैधानिक स्थान भी मिले।
एक कदम आगे – इस मुलाकात में सबसे महत्वपूर्ण बात राज्यपाल श्री रमेन डेका की पहल रही। उन्होंने छत्तीसगढ़ी को आठवीं अनुसूची में शामिल कराने की दिशा में व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ने की बात कही।
राज्यपाल ने कहा कि इस विषय पर एक समिति गठित की जाएगी। यह समिति छत्तीसगढ़ी भाषा के इतिहास, साहित्य, व्याकरण, शब्दकोश और अन्य संदर्भ सामग्री को व्यवस्थित रूप से संकलित करेगी। विषय के विद्वानों और विशेषज्ञों से भी आवश्यक जानकारी तथा सुझाव लिए जाएंगे।
असमिया-बोडो का उदाहरण – राज्यपाल ने इस दौरान असमिया और बोडो भाषाओं का उदाहरण भी सामने रखा। आठवीं अनुसूची में इन भाषाओं को शामिल किए जाने की प्रक्रिया का संदर्भ देते हुए उन्होंने संकेत दिया कि छत्तीसगढ़ी के मामले में भी मजबूत दस्तावेजी आधार तैयार करना महत्वपूर्ण होगा।
यानी अब मांग को सिर्फ भावनाओं के स्तर पर नहीं, बल्कि इतिहास, साहित्य और प्रमाणों के साथ आगे बढ़ाने की तैयारी दिखाई दे रही है।
कहानी बहुत पुरानी है – भाषाविदों ने राज्यपाल को बताया कि छत्तीसगढ़ी में साहित्य सृजन की परंपरा 15वीं शताब्दी से चली आ रही है। कविता से लेकर कहानी, उपन्यास, नाटक, आलोचना और पत्रकारिता तक छत्तीसगढ़ी में अलग-अलग विधाओं में साहित्य उपलब्ध है।
यह भाषा केवल घर-परिवार में बातचीत की भाषा नहीं रही, बल्कि समय के साथ इसने साहित्य की अपनी मजबूत दुनिया भी तैयार की है।
1890 में पहला दस्तावेज – छत्तीसगढ़ी के व्यवस्थित भाषायी विकास की बात करें तो भाषाविदों के अनुसार वर्ष 1890 में छत्तीसगढ़ी का व्याकरण तैयार किया गया था। इसके बाद वर्ष 1939 में पहला शब्दकोश तैयार हुआ।
ये तथ्य यह बताने के लिए महत्वपूर्ण हैं कि छत्तीसगढ़ी को केवल लोकभाषा मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसके पीछे लंबे समय से व्याकरण और शब्द-संपदा को व्यवस्थित करने का प्रयास भी होता रहा है।
‘हीरू के कहिनी’ का अध्याय – छत्तीसगढ़ी साहित्य की कहानी में वर्ष 1924 का भी खास महत्व बताया गया। इसी वर्ष छत्तीसगढ़ी का पहला उपन्यास ‘हीरू के कहिनी’ प्रकाशित हुआ।
यानी छत्तीसगढ़ी साहित्य ने उपन्यास जैसी विधा में भी बहुत पहले अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी थी।
जेल से निकली आवाज – छत्तीसगढ़ी भाषा के इतिहास में पंडित सुंदरलाल शर्मा का योगदान भी इस मुलाकात में सामने रखा गया। बताया गया कि उन्होंने जेल से हस्तलिखित छत्तीसगढ़ी पत्रिका ‘दुलरवा’ का प्रकाशन किया था।
यह प्रसंग बताता है कि छत्तीसगढ़ी सिर्फ बोलचाल की भाषा नहीं रही, बल्कि सामाजिक चेतना और अभिव्यक्ति का माध्यम भी बनी।
अब पढ़ाई में भी जगह – समय के साथ छत्तीसगढ़ी का दायरा शिक्षा के क्षेत्र में भी बढ़ा है। भाषाविदों के अनुसार प्रदेश के विश्वविद्यालयों में स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर पर छत्तीसगढ़ी का अध्ययन कराया जा रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत कक्षा पहली से आठवीं तक के पाठ्यक्रम में भी छत्तीसगढ़ी को शामिल करने की प्रक्रिया जारी है।
यानी भाषा अब घर की चौखट से निकलकर स्कूल और विश्वविद्यालय तक पहुंच चुकी है।
अब नजर आठवीं अनुसूची पर – संविधान की आठवीं अनुसूची में फिलहाल 22 भाषाएं शामिल हैं। किसी भाषा को इसमें शामिल किए जाने का अर्थ उसके संवैधानिक महत्व और सरकारी स्तर पर उपयोग से जुड़े अधिकारों तथा अवसरों का विस्तार है।
छत्तीसगढ़ी को भी इसी सूची में शामिल कराने की मांग अब एक बार फिर सामने आई है। राज्यपाल की समिति बनाने की पहल ने इस मांग को आगे बढ़ाने के लिए दस्तावेजी तैयारी का रास्ता खोल दिया है।
अब सिर्फ मांग नहीं, प्रमाण भी – इस पूरे प्रयास का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि छत्तीसगढ़ी को आठवीं अनुसूची में शामिल कराने के लिए भाषा के इतिहास, साहित्य, व्याकरण, शब्दकोश और व्यापक उपयोग से संबंधित सामग्री को व्यवस्थित रूप से सामने लाने की तैयारी हो रही है।
आने वाले समय में यही दस्तावेज इस मांग की मजबूती का आधार बन सकते हैं।
राजभवन से निकली उम्मीद – राज्यपाल से हुई यह मुलाकात भले ही एक बैठक के रूप में हुई हो, लेकिन छत्तीसगढ़ी भाषा के लिए इसे एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा सकता है। अब समिति बनेगी, सामग्री जुटेगी, विशेषज्ञों की राय ली जाएगी और फिर इस मांग को आगे बढ़ाने के लिए एक ठोस आधार तैयार किया जाएगा।
छत्तीसगढ़ी के लिए लड़ाई अब केवल पहचान की नहीं, बल्कि पहचान को संवैधानिक दर्जा दिलाने की दिशा में दस्तावेजी प्रयास की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है।
क्या अब बदलेगा इंतजार? – छत्तीसगढ़ की गलियों, गांवों, खेतों और बाजारों में पीढ़ियों से बोली जाने वाली छत्तीसगढ़ी अब संविधान की आठवीं अनुसूची के दरवाजे पर दस्तक दे रही है।
सवाल अब यह है कि यह दस्तक कितनी दूर तक जाएगी?
राजभवन से समिति की पहल हो चुकी है। इतिहास और साहित्य के दस्तावेज सामने लाने की तैयारी है। विशेषज्ञों की राय ली जाएगी।
अब देखना होगा कि छत्तीसगढ़ी की यह आवाज राजभवन से निकलकर दिल्ली के उस दरवाजे तक कब पहुंचती है, जहां से उसे संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान मिलने का रास्ता खुलेगा।

प्रदीप मिश्रा
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