75 दिन का रहस्य! बस्तर दशहरा को मिलेगी विश्व विरासत की पहचान?
|
😊 कृपया इस न्यूज को शेयर करें😊
|
बस्तर, छत्तीसगढ़
By ACGN – 7647981711, 9303948009
आस्था, परंपरा और भव्यता के बीच सजेगा ऐतिहासिक बस्तर दशहरा, यूनेस्को की सांस्कृतिक धरोहर सूची में शामिल कराने का संकल्प
बस्तर ACGN:- बस्तर की धरती एक बार फिर उस ऐतिहासिक परंपरा की गवाह बनने जा रही है, जिसकी पहचान केवल एक धार्मिक पर्व के रूप में नहीं, बल्कि सदियों पुरानी जनपरंपरा, सामाजिक समरसता और आदिवासी संस्कृति के अद्भुत संगम के रूप में होती है। विश्वप्रसिद्ध 75 दिवसीय बस्तर दशहरा पर्व 2026 इस वर्ष भी अपनी पारंपरिक गरिमा और भव्यता के साथ मनाया जाएगा।
पर्व की तैयारियों को लेकर मंगलवार को कलेक्टोरेट के प्रेरणा कक्ष में बस्तर दशहरा समिति की महत्वपूर्ण बैठक हुई। बैठक की अध्यक्षता बस्तर सांसद एवं दशहरा समिति के अध्यक्ष महेश कश्यप ने की। बैठक में पूजा विधान से लेकर सुरक्षा, स्वच्छता, पेयजल, प्रकाश, यातायात और वित्तीय प्रबंधन तक कई महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा हुई।

पहले बदला समिति का चेहरा
बैठक में बस्तर दशहरा समिति के उपाध्यक्ष पद के लिए निर्वाचन कराया गया। बचेली परगना के बीरो मांझी ने अर्जुन मांझी के नाम का प्रस्ताव रखा, जबकि सोनाबाल परगना के समुन्द मांझी ने बलराम मांझी के नाम का प्रस्ताव किया।
हाथ उठाकर हुए मतदान में बलराम मांझी को स्पष्ट बहुमत मिला और उन्हें समिति का नया उपाध्यक्ष घोषित किया गया। नवनिर्वाचित उपाध्यक्ष ने देवसराय सहित अन्य महत्वपूर्ण स्थलों की व्यवस्थाओं को और बेहतर बनाने के लिए सुझाव भी दिए।
सिर्फ दशहरा नहीं, सदियों की कहानी
बस्तर दशहरा की सबसे बड़ी खासियत यही है कि इसका स्वरूप देश के दूसरे दशहरा आयोजनों से बिल्कुल अलग है। बैठक में सांसद महेश कश्यप ने कहा कि बस्तर दशहरा केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, जनभागीदारी और विश्व की अनूठी सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है।
उन्होंने पर्व की व्यवस्थाओं को मजबूत करने के लिए एनएमडीसी प्रबंधन से सीएसआर मद के अंतर्गत प्रतिवर्ष कम से कम डेढ़ करोड़ रुपये की स्थायी वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने की मांग करने की बात कही।
अब नजर दुनिया की विरासत सूची पर
बस्तर राजपरिवार के सदस्य एवं माटी पुजारी कमलचंद भंजदेव ने बस्तर दशहरा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वर्ष 1423 से चली आ रही यह परंपरा मैसूर और कुल्लू दशहरा से भी प्राचीन है।
इसी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक मंच पर स्थापित करने के लिए बस्तर दशहरा को यूनेस्को की सांस्कृतिक धरोहर सूची में शामिल कराने के सामूहिक प्रयास का संकल्प दोहराया गया।
अगर यह प्रयास आगे बढ़ता है तो बस्तर की इस अनूठी परंपरा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिलने की संभावना बनेगी।
मावली परघाव पर विशेष नजर
कमलचंद भंजदेव ने मावली परघाव से जुड़े स्थलों और मार्गों की विशेष साफ-सफाई कराने तथा देवी-देवताओं और आंगा देव के सम्मानपूर्वक आगमन की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित करने पर जोर दिया।
उन्होंने मांझी-चालकी से दशहरा पर्व के दौरान पारंपरिक वेशभूषा और पगड़ी धारण करने का आग्रह किया। वहीं मेंबर-मेंबरीन के योगदान को महत्वपूर्ण बताते हुए उनके मासिक मानदेय में वृद्धि करने का प्रस्ताव भी रखा गया।
1.21 करोड़ का खाका तैयार
बैठक में दशहरा समिति के सचिव एवं तहसीलदार ने पर्व के लिए एक करोड़ 21 लाख रुपये का बजट प्रस्तावित किया। इस राशि के माध्यम से पर्व के दौरान होने वाले विभिन्न पूजा विधान और उनसे जुड़ी व्यवस्थाओं को संचालित करने का प्रस्ताव रखा गया।
पूजा स्थलों, देवस्थलों और मार्गों की व्यवस्था के साथ श्रद्धालुओं के लिए पेयजल, प्रकाश, स्वच्छता और अन्य बुनियादी सुविधाओं पर भी चर्चा हुई।
सुरक्षा से लेकर यातायात तक तैयारी
कलेक्टर आकाश छिकारा और पुलिस अधीक्षक शलभ सिन्हा ने पर्व को शांतिपूर्ण और सुव्यवस्थित ढंग से संपन्न कराने के लिए प्रशासनिक तैयारियों और विभागों के बीच बेहतर समन्वय पर जोर दिया।
प्रमुख पूजा स्थलों पर सुरक्षा व्यवस्था, यातायात प्रबंधन और आवश्यक बुनियादी सुविधाओं को समय रहते पूरा करने की बात कही गई, ताकि देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों को किसी तरह की परेशानी न हो।
परंपरा के बीच आधुनिक व्यवस्था
बैठक में मौजूद मांझी-चालकी, पुजारी, मेंबर-मेंबरीन और समिति के सदस्यों ने भी विभिन्न पूजा विधान और आयोजन से जुड़ी व्यवस्थाओं को लेकर सुझाव दिए।
बस्तर दशहरा की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि आधुनिक सुविधाओं की व्यवस्था बढ़े, लेकिन सदियों से चली आ रही परंपराओं की मौलिकता कहीं पीछे न छूटे। वर्ष 2026 के आयोजन की तैयारियों में इसी संतुलन को बनाए रखने पर विशेष जोर दिया जा रहा है।
अब बस्तर से उठेगी विश्व मंच तक आवाज?
75 दिनों तक चलने वाला बस्तर दशहरा अपने आप में एक ऐसी सांस्कृतिक परंपरा है, जिसमें राजपरिवार, देवी-देवता, पुजारी, मांझी-चालकी, प्रशासन और आम जनता की सामूहिक भागीदारी दिखाई देती है।
अब इस ऐतिहासिक पर्व को यूनेस्को की सांस्कृतिक धरोहर सूची तक पहुंचाने का संकल्प इसे एक नई दिशा देता दिखाई दे रहा है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि बस्तर की यह सदियों पुरानी परंपरा वैश्विक सांस्कृतिक विरासत के मंच तक किस तरह पहुंचती है।
प्रदीप मिश्रा
निष्पक्ष, निर्भीक और सच्ची खबर, हर खबर पर तिरछी नजर और जनहित के प्रति समर्पित पत्रकारिता के साथ देश में तेजी से बढ़ता विश्वसनीय वेब पोर्टल अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़।
आपके क्षेत्र में भी कोई महत्वपूर्ण खबर, जनसमस्या या जनहित का मुद्दा हो तो हमें इस नंबर पर भेजें। 7647981711, 9303948009।
|
Whatsapp बटन दबा कर इस न्यूज को शेयर जरूर करें |
Advertising Space
















































