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जवाली में आवारा पशुओं की व्यवस्था पर तीसरी और अंतिम बैठक

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कोरबा , छत्तीसगढ़

By ACGN – 7647981711, 9303948009

संवाददाता :- दीपक पटेल

53 ग्रामीणों की मौजूदगी में बनी व्यवस्था की रूपरेखा, चरवाहा-चौकीदार की नियुक्ति से लेकर राशन कार्डधारकों से सहयोग राशि जुटाने पर चर्चा; पुराने गौठान की व्यवस्थाओं और पारदर्शिता को लेकर भी ग्रामीणों ने उठाए सवाल

कटघोरा, जवाली ACGN :- ग्राम पंचायत जवाली में गाय-बैल एवं अन्य आवारा पशुओं की देखरेख, संरक्षण और किसानों की फसलों को नुकसान से बचाने को लेकर शनिवार शाम 5 बजे बाजारपारा मंच में बैठक क्रमांक-3 आयोजित की गई। इसे आवारा पशुओं की व्यवस्था को लेकर तीसरी और अंतिम बैठक बताया गया। बैठक में ग्राम पंचायत के सरपंच, 21 पंचों में से 5 पंच तथा 47 अन्य ग्रामीणों सहित कुल 53 लोगों की उपस्थिति रही। बैठक में गांव में खुले रूप से घूम रहे पशुओं को गौठान में रखने, उनकी देखरेख के लिए चरवाहा एवं चौकीदार नियुक्त करने तथा संचालन के लिए ग्रामीण स्तर पर संसाधन जुटाने को लेकर विस्तार से चर्चा हुई।
बैठक के संबंध में बताया गया कि कलेक्टर के दिशा-निर्देशों के अनुरूप ग्राम पंचायत सरपंच के आदेश पर कोटवार फागून दास द्वारा मुनादी क्रमांक-12 के माध्यम से ग्रामीणों को बैठक की सूचना दी गई थी। बैठक का मुख्य उद्देश्य गांव में घूम रहे आवारा एवं लावारिस पशुओं से किसानों को हो रहे नुकसान और उनके उचित प्रबंधन को लेकर स्थायी व्यवस्था तैयार करना था।


बैठक में प्रस्ताव रखा गया कि गांव में खुले में घूम रहे सैकड़ों आवारा पशुओं को ग्राम के गौठान में ले जाकर रखा जाएगा। इसके लिए चार चरवाहों और एक चौकीदार की व्यवस्था किए जाने पर चर्चा हुई। इन कर्मचारियों को उचित मानदेय देने तथा गौठान के संचालन में आने वाले अन्य खर्चों की व्यवस्था ग्रामीण स्तर पर किए जाने का प्रस्ताव सामने आया।
गौठान संचालन के खर्च को लेकर भी बैठक में एक विशेष व्यवस्था पर विचार किया गया। इसके तहत चार प्रकार के राशन कार्डधारकों से प्रति परिवार प्रतिमाह एक किलो चावल लगातार छह माह तक जमा कराने का प्रस्ताव रखा गया। बैठक में राशन कार्डधारकों की संख्या 1,126 बताई गई तथा इससे संभावित रूप से करीब 22 हजार से 25 हजार रुपये तक की व्यवस्था होने का अनुमान प्रस्तुत किया गया। इस व्यवस्था को अंतिम रूप देने से पहले ग्रामीणों के बीच इसकी व्यवहारिकता और पारदर्शिता पर भी चर्चा किए जाने की बात सामने आई।


बैठक में पशु विभाग के वरिष्ठ चिकित्सक दिवाकर जी से प्राप्त जानकारी का भी उल्लेख किया गया। बताया गया कि उनके अधीन लगभग 13 गांवों के करीब 7,420 पशुओं की देखरेख और उपचार संबंधी जिम्मेदारी है। चर्चा के दौरान जवाली में किसानों के पास लगभग 600 गाय-बैल और चाकाबूढ़ा में करीब 850 पशुओं की संख्या बताई गई। इसके अतिरिक्त गांव में खुले रूप से घूमने वाले पशुओं की संख्या लगभग 1,100 होने का अनुमान बैठक में सामने आया। इन्हीं पशुओं को लेकर किसानों की फसल सुरक्षा और पशु प्रबंधन की तत्काल व्यवस्था किए जाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
ग्रामीणों का कहना है कि लंबे समय के बाद कृषि कार्य व्यवस्थित रूप से शुरू हुए हैं और ऐसे समय में खुले में घूमने वाले पशुओं के कारण खेतों में खड़ी फसलों को नुकसान पहुंच रहा है। किसानों के लिए एक ओर मौसम और कृषि लागत की चिंता है तो दूसरी ओर आवारा पशुओं से फसल बचाने की चुनौती भी बनी हुई है। ग्रामीणों ने स्पष्ट रूप से कहा कि पशुओं की व्यवस्था जरूरी है, लेकिन उसके साथ किसानों की फसल सुरक्षा को भी प्राथमिकता देनी होगी।
चाकाबूढ़ा पंचायत के सहयोग पर भी होगा विचार
बैठक में यह बात भी सामने आई कि पिछले वर्ष ग्राम पंचायत चाकाबूढ़ा द्वारा गौठान की व्यवस्था के लिए प्रतिमाह करीब 20 हजार रुपये का सहयोग किया गया था। दोनों गांव आपस में जुड़े होने के कारण दोनों पंचायतों के पशुओं को एक ही गौठान में रखने की व्यवस्था की गई थी। इस वर्ष भी चाकाबूढ़ा पंचायत के सहयोग को लेकर दोनों पंचायतों के सरपंच एवं पंचों के बीच लिखित रूप से विचार-विमर्श किए जाने की बात कही गई।


आने वाले समय में यह तय किया जाना है कि चाकाबूढ़ा पंचायत पूर्व की तरह संचालन में सहयोग राशि बढ़ाएगी या फिर अपने क्षेत्र के पशुओं के लिए अलग से पशु प्रबंधन की व्यवस्था करेगी। इस संबंध में दोनों पंचायतों के जनप्रतिनिधियों के बीच स्पष्ट सहमति और लिखित व्यवस्था को आवश्यक माना जा रहा है।


चार चरवाहे और एक चौकीदार रखने का प्रस्ताव -गौठान संचालन के लिए पिछले वर्ष की व्यवस्था का हवाला देते हुए इस वर्ष भी चार चरवाहों और एक चौकीदार को प्रतिमाह 9-9 हजार रुपये मानदेय देने का प्रस्ताव बैठक में रखा गया। ग्रामीणों के अनुसार यदि बड़ी संख्या में पशुओं को गौठान में रखा जाना है तो उनकी नियमित चराई, चारा-पानी, सुरक्षा और देखरेख के लिए पर्याप्त कर्मचारियों की जरूरत होगी।
बैठक में यह भी चर्चा हुई कि जिन किसानों के अपने गाय-बैल हैं, वे उनकी चराई और देखरेख की जिम्मेदारी स्वयं उठाएं अथवा निजी चरवाहे की व्यवस्था करें। यदि पशु मालिक अपने पशुओं की उचित व्यवस्था नहीं करते और उनके पशु खुले में घूमते पाए जाते हैं, तो ऐसे पशुओं को आवारा पशुओं की श्रेणी में रखकर गौठान में ले जाने की व्यवस्था किए जाने की बात सामने आई। इस व्यवस्था को लागू करने से पहले पशु मालिकों को स्पष्ट सूचना और नियमों की जानकारी देना भी जरूरी माना गया।


गोबर खाद और पंचायत प्रतिनिधियों की भूमिका पर भी चर्चा– बैठक में गोबर खाद के उपयोग और पंचायत प्रतिनिधियों की भूमिका को लेकर भी चर्चा हुई। उपस्थित 53 सदस्यों के बीच सक्रिय रूप से कार्य करने वाले पांच पंचों को उनके सहयोग के नाम पर एक-एक ट्रैक्टर गोबर खाद दिए जाने का प्रस्ताव सामने आने की जानकारी दी गई।
बैठक में यह भी बताया गया कि एक कार्यकाल के दौरान करीब 20 ट्रैक्टर गोबर खाद एकत्रित किए जाने की बात सामने आती रही है। कुछ ग्रामीणों ने पंचायत प्रतिनिधियों की भूमिका और पशुओं की बिक्री से प्राप्त राशि के उपयोग को लेकर भी सवाल उठाए। ग्रामीणों द्वारा इस प्रकार की बातें उठाए जाने के बाद यह मांग सामने आई कि पशुओं की संख्या, पशुओं से प्राप्त आय, बिक्री, गोबर खाद, चारा-पानी, कर्मचारियों के मानदेय तथा अन्य खर्चों का पूरा हिसाब सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
हालांकि बैठक में उठे इन सवालों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में संबंधित पंचायत प्रतिनिधियों और जिम्मेदार अधिकारियों का पक्ष सामने आना भी जरूरी होगा। ग्रामीणों का कहना है कि यदि गौठान को लंबे समय तक संचालित करना है तो आय और व्यय की पूरी जानकारी सार्वजनिक होने से किसी भी प्रकार के विवाद की संभावना कम होगी।
बड़ा सवाल- गौठान से गौधाम तक की योजना, लेकिन वर्तमान व्यवस्था कितनी तैयार?
बैठक में भविष्य में इसी गौठान को गौधाम के रूप में विकसित किए जाने और इसके लिए करोड़ों रुपये की संभावित स्वीकृति की चर्चा भी हुई। लेकिन इसी चर्चा के बीच ग्रामीणों ने सबसे अहम सवाल उठाया कि जब वर्तमान गौठान में ही पर्याप्त चारा, पानी, छाया, सुरक्षा और रखरखाव की व्यवस्था पूरी तरह सुनिश्चित नहीं है, तो भविष्य में हजारों पशुओं को रखने वाली बड़ी योजना को धरातल पर किस तरह सफल बनाया जाएगा?
ग्रामीणों के अनुसार सीमित स्थान में बड़ी संख्या में पशुओं को रखने और पर्याप्त चारा-पानी उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में पशुओं के बीमार होने और मृत्यु का खतरा बढ़ सकता है। बैठक में पिछले वर्ष की स्थिति का उल्लेख करते हुए बताया गया कि 111 दिनों की अवधि में करीब 240 गाय-बैलों की मृत्यु हुई थी और उनके अंतिम संस्कार में लगभग 80 हजार रुपये खर्च होने की बात सामने आई थी। बताया गया कि यह खर्च पंचायत को उठाना पड़ा।
इन आंकड़ों और दावों की आधिकारिक पुष्टि संबंधित विभाग एवं पंचायत के अभिलेखों से होना आवश्यक है। यदि भविष्य में गौठान को बड़े स्तर पर विकसित किया जाना है तो पिछले वर्षों के पशु मृत्यु, उपचार, चारा-पानी और खर्च संबंधी अभिलेखों की समीक्षा के बाद ही आगे की योजना बनाना अधिक प्रभावी होगा।
छाया, पानी और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर ग्रामीण चिंतित
गौठान की वर्तमान स्थिति को लेकर भी बैठक में ग्रामीणों ने कई सवाल उठाए। ग्रामीणों का कहना है कि गौठान में पशुओं के लिए पर्याप्त आश्रय उपलब्ध नहीं है और सैकड़ों पशुओं को रात के समय खुले आसमान के नीचे रहना पड़ता है। गौठान का घेरा और दरवाजा भी कमजोर होने की बात ग्रामीणों ने कही।
बैठक में पिछले वर्ष उपयोग में लाई गई सीट, तिरपाल, तार, बोरवेल और अन्य सामग्री की वर्तमान उपलब्धता को लेकर भी सवाल उठाए गए। इसके अलावा पर्याप्त मात्रा में चारे की व्यवस्था नहीं होने पर ग्रामीणों ने चिंता जताई।
ग्रामीणों का कहना है कि आवारा पशुओं को केवल एक परिसर में बंद कर देना पशु संरक्षण नहीं कहा जा सकता। यदि वहां पर्याप्त चारा, स्वच्छ पानी, छाया, उपचार, सुरक्षा और नियमित निगरानी नहीं है तो व्यवस्था पुराने समय के कांजीघर जैसी स्थिति में बदल सकती है। इसलिए गौठान को पशुओं को रखने की जगह भर नहीं, बल्कि वास्तविक संरक्षण केंद्र के रूप में विकसित करने की जरूरत है।
योजना बड़ी है, लेकिन असली परीक्षा धरातल पर
छत्तीसगढ़ में गौठान की अवधारणा को ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पशुपालन, गोबर आधारित गतिविधियों और पशु संरक्षण से जोड़कर आगे बढ़ाया गया था। अब पशुधन संरक्षण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ी योजनाओं को प्रभावी तरीके से जमीन पर उतारना प्रशासन और पंचायतों के लिए बड़ी चुनौती है।
जवाली की बैठक में उठे सवाल केवल एक गांव तक सीमित नहीं हैं। आवारा पशुओं की समस्या प्रदेश के कई ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों और पशुपालकों के लिए चुनौती बनी हुई है। किसी भी योजना की सफलता केवल बजट स्वीकृत होने या सरकारी दस्तावेजों में योजना दर्ज होने से तय नहीं होती, बल्कि उसकी वास्तविक सफलता गांव में दिखाई देने वाली व्यवस्था से तय होती है।
यदि किसी गौठान के लिए बड़ी राशि स्वीकृत हो जाए, लेकिन वहां पर्याप्त भूमि, चारा, पानी, चिकित्सा, कर्मचारी, सुरक्षा, निगरानी और पारदर्शिता की व्यवस्था न हो तो योजना का उद्देश्य पूरा करना मुश्किल होगा। इसके लिए योजना तैयार करने से पहले स्थानीय जरूरत, पशुओं की वास्तविक संख्या, उपलब्ध भूमि, पानी के स्रोत, चारा व्यवस्था और मानव संसाधन का वास्तविक आकलन करना जरूरी है।
किसान भी सुरक्षित रहें और पशु भी
जवाली की बैठक से सबसे बड़ा संदेश यही सामने आता है कि आवारा पशुओं की समस्या का समाधान केवल पशुओं को गौठान में बंद करने से नहीं होगा। इसके लिए पशु मालिकों की जिम्मेदारी, चराई की व्यवस्था, फसल सुरक्षा, पशुओं की पहचान, चारा-पानी, पशु चिकित्सा, कर्मचारियों की उपलब्धता और पंचायत की पारदर्शी निगरानी को एक साथ जोड़ना होगा।
गौठान पशुओं के लिए जेल नहीं बल्कि संरक्षण केंद्र होना चाहिए। इसके लिए ग्राम पंचायत जवाली और चाकाबूढ़ा के जनप्रतिनिधियों, पशु विभाग, प्रशासन और ग्रामीणों के बीच स्पष्ट एवं लिखित कार्ययोजना बनना जरूरी है। गौठान में आने वाले प्रत्येक पशु की संख्या, उसकी पहचान, उपचार, चारा-पानी, मृत्यु, स्थानांतरण अथवा बिक्री और उससे संबंधित आय-व्यय का व्यवस्थित अभिलेख रखा जाए तथा समय-समय पर ग्रामीणों के सामने उसकी जानकारी रखी जाए तो व्यवस्था में पारदर्शिता आएगी।
किसानों की फसल बचाना भी जरूरी है और पशुओं का संरक्षण भी। इन दोनों के बीच संतुलन स्थापित करके ही जवाली में प्रस्तावित गौठान व्यवस्था और भविष्य की गौधाम योजना को वास्तव में सफल बनाया जा सकता है। अब तीसरी और अंतिम बैठक के बाद ग्रामीणों की नजर इस बात पर रहेगी कि बैठक में उठाए गए सवालों और प्रस्तावों को जमीन पर किस तरह लागू किया जाता है और क्या नई व्यवस्था किसानों तथा पशुओं दोनों के हित में एक स्थायी समाधान दे पाती है।

प्रदीप मिश्रा
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