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सच की तह तक

आख़िर किसके दबाव में झुकी सरकार? एक इस्तीफे ने बदल दी सियासत की पूरी कहानी!

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नई दिल्ली

By ACGN 7647981711, 9303948009

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद Gen Z में जश्न, सोनम वांगचुक ने कहा “लोकतंत्र की जीत”, विपक्ष बोला “जब प्रधानमंत्री की कुर्सी पर संकट दिखा, तब प्रधान से इस्तीफा लिया गया।”

नई दिल्ली, 25 जुलाई 2026। कई दिनों से देशभर में उठ रहे छात्र आंदोलन, सोशल मीडिया पर उफान और लगातार बढ़ते राजनीतिक दबाव के बीच आखिरकार केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। लेकिन इस्तीफे के बाद देश में सबसे बड़ा सवाल यही गूंज रहा है, क्या यह सिर्फ एक मंत्री का इस्तीफा है, या देश की राजनीति में किसी बड़े बदलाव की शुरुआत?

इस्तीफे की घोषणा के साथ ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X, इंस्टाग्राम और अन्य डिजिटल मंचों पर #GenZWins, #StudentsPower, #DemocracyWins और #DharmendraPradhan जैसे हैशटैग तेजी से ट्रेंड करने लगे। देशभर के छात्र संगठनों और युवाओं ने इसे अपने आंदोलन की पहली बड़ी जीत बताते हुए जश्न मनाया।

धर्मेंद्र प्रधान ने अपने त्यागपत्र में कहा कि यह उनके लिए पद का नहीं, बल्कि छात्रों के भविष्य और देश के हित का विषय था। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि वे नहीं चाहते कि शिक्षा और छात्रों का मुद्दा लगातार राजनीतिक विवाद का कारण बने।

जंतर-मंतर से उठी आवाज”पहला विकेट गिरा”

दिल्ली के जंतर-मंतर पर आंदोलन का नेतृत्व कर रहे CJP  के संस्थापक अभिजीत दीपके ने इस्तीफे को आंदोलन की ऐतिहासिक जीत बताया। उन्होंने कहा, “अभी तो शुरुआत है, पहला विकेट गिरा है। लोगों ने कहा था कि इस सरकार में कोई इस्तीफा नहीं देता, लेकिन अगर जनता डरती नहीं और झुकती नहीं, तो सत्ता को भी झुकना पड़ता है।”
दीपके ने दावा किया कि पिछले एक महीने से उन्हें कई वरिष्ठ नेताओं ने समझाया था कि सरकार कभी पीछे नहीं हटेगी, लेकिन छात्रों की एकजुटता ने पूरी तस्वीर बदल दी।

सोनम वांगचुक बोले”यह लोकतंत्र की जीत है”

शिक्षा और युवाओं के मुद्दों पर लगातार आवाज उठाने वाले सोनम वांगचुक ने आंदोलन में शामिल छात्रों और युवाओं को बधाई देते हुए कहा कि यह किसी व्यक्ति की नहीं, बल्कि लोकतंत्र की जीत है। उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण आंदोलन, संवैधानिक तरीके से अपनी बात रखना और लगातार संघर्ष करना आखिरकार रंग लाया। उनके अनुसार यह संदेश केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लोकतंत्रों के लिए महत्वपूर्ण है कि जब युवा संगठित होकर अहिंसक तरीके से अपनी आवाज उठाते हैं, तो सत्ता को भी जनता की बात सुननी पड़ती है।

विपक्ष का हमला”प्रधानमंत्री की कुर्सी बचाने के लिए लिया गया फैसला”

प्रधान के इस्तीफे के बाद विपक्ष ने केंद्र सरकार पर तीखे हमले शुरू कर दिए।
छत्तीसगढ़ कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा, “जब प्रधानमंत्री की कुर्सी खतरे में दिखाई देने लगी, तब धर्मेंद्र प्रधान से इस्तीफा ले लिया गया। अगर सरकार पहले जिम्मेदारी तय करती तो लाखों छात्रों को सड़क पर उतरने की जरूरत ही नहीं पड़ती।”
उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने छात्रों की आवाज लंबे समय तक अनसुनी की और जब आंदोलन राष्ट्रीय स्तर पर पहुंच गया तथा सरकार की छवि प्रभावित होने लगी, तब यह निर्णय लिया गया।

“Gen Z को सलाम”—मनीष सिसोदिया

दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने सोशल मीडिया पर लिखा, “देश की युवा शक्ति को सलाम,  Gen Z को सलाम, हर आंदोलनकारी को सलाम। छात्रों की ताकत के आगे सरकार को झुकना पड़ा।” उनके इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर युवा वर्ग ने बड़े पैमाने पर प्रतिक्रिया दी और इसे नई पीढ़ी की राजनीतिक ताकत का प्रतीक बताया।

“पेपर लीक से शुरू हुई लड़ाई अब जवाबदेही तक जाएगी” संजय सिंह

आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने कहा,”युवा शक्ति जिंदाबाद, छात्र शक्ति जिंदाबाद। करोड़ों युवाओं ने सरकार को जगाया। यह आंदोलन केवल पेपर लीक तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अब रोजगार, शिक्षा और जवाबदेही तक जाएगा।”

“बहुत पहले हो जाना चाहिए था”अधीर रंजन चौधरी

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि सरकार ने यह फैसला काफी देर से लिया। उन्होंने कहा, “अगर समय रहते कार्रवाई होती तो देशभर में छात्रों का इतना बड़ा आंदोलन देखने को नहीं मिलता। यह फैसला मजबूरी में लिया गया है।”

क्या यह सिर्फ इस्तीफा है… या नए राजनीतिक दौर की शुरुआत?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम केवल एक केंद्रीय मंत्री के इस्तीफे तक सीमित नहीं है। इसने यह संकेत दिया है कि Gen Z अब सिर्फ सोशल मीडिया पर ट्रेंड बनाने वाली पीढ़ी नहीं रही, बल्कि वह नीतिगत फैसलों को प्रभावित करने वाली सामाजिक और राजनीतिक शक्ति के रूप में उभर रही है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है क्या यह केवल “पहला विकेट” है, जैसा आंदोलनकारी दावा कर रहे हैं, या फिर यह भारतीय राजनीति में जवाबदेही के नए दौर की शुरुआत है? आने वाले दिनों में इसका जवाब देश की राजनीति तय करेगी।


इस पूरे घटनाक्रम ने यह भी स्पष्ट किया है कि लोकतंत्र में आंदोलन का सम्मान होना चाहिए, लेकिन कानून और मर्यादा भी उतनी ही आवश्यक है। अब सत्ता में बैठे नेतृत्व की जिम्मेदारी केवल इस्तीफे तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उन सभी मामलों की निष्पक्ष जांच भी होनी चाहिए, जिनमें आंदोलन के दौरान छात्रों के प्रति आपत्तिजनक और गैर-जिम्मेदाराना बयान दिए गए। यदि किसी जनप्रतिनिधि, अधिकारी या अन्य व्यक्ति ने छात्रों को डराने, उनका भविष्य बर्बाद करने या अमर्यादित भाषा का प्रयोग किया है, तो उस पर भी उचित कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं आंदोलन के दौरान यदि किसी पुलिसकर्मी ने कानून की सीमा से बाहर जाकर छात्र-छात्राओं के साथ दुर्व्यवहार, अनावश्यक बल प्रयोग या अभद्र व्यवहार किया है, तो उसकी जवाबदेही भी तय की जानी चाहिए। साथ ही, यदि कुछ असामाजिक तत्वों या उपद्रवियों ने छात्र आंदोलन की आड़ लेकर हिंसा, तोड़फोड़ या कानून व्यवस्था बिगाड़ने का प्रयास किया है, तो उनके विरुद्ध भी निष्पक्ष और कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। लोकतंत्र तभी मजबूत होगा, जब शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों की सुरक्षा सुनिश्चित हो और कानून तोड़ने वाले, चाहे वे किसी भी पक्ष के हों, समान रूप से जवाबदेह ठहराए जाएं।

प्रदीप मिश्रा
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