क्या अहिंसा और सत्याग्रह की ताकत अब बेअसर हो गई? लोकतंत्र के सामने खड़ा बड़ा सवाल
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नई दिल्ली
By ACGN 7647981711, 9303948009
आलेख – वरिष्ठ पत्रकार कृष्ण प्रताप सिंह
पेपर लीक, बेरोज़गारी और आंदोलनों के बीच उठे सवाल—क्या अब शांतिपूर्ण संघर्षों की आवाज़ सत्ता तक नहीं पहुंचती? वरिष्ठ पत्रकार कृष्ण प्रताप सिंह का विश्लेषण।
नई दिल्ली ACGN: क्या आज के दौर में महात्मा गांधी के अहिंसा और सत्याग्रह जैसे हथियार अपनी प्रभावशीलता खो चुके हैं? क्या लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण आंदोलन अब सत्ता को झुकाने की ताकत नहीं रखते? यही गंभीर सवाल वरिष्ठ पत्रकार कृष्ण प्रताप सिंह ने अपने विस्तृत आलेख में उठाया है।

लेख में कहा गया है कि देशभर में लगातार सामने आ रहे पेपर लीक मामलों से परेशान बेरोज़गार युवाओं और छात्रों द्वारा न्याय तथा केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर चल रहे अनशन और प्रदर्शन के प्रति केंद्र सरकार का रवैया कई गंभीर प्रश्न खड़े करता है। लेखक के अनुसार सरकार संवाद की बजाय तब तक इंतजार करती है, जब तक हालात पूरी तरह गंभीर नहीं हो जाते।
लेख में कहा गया है कि सरकार का अब तक का रिकॉर्ड बताता है कि वह असहमति और आंदोलनों को सहज रूप से स्वीकार करने के बजाय पहले उन्हें कमजोर करने, अनदेखा करने अथवा कठोर रवैया अपनाने की नीति पर चलती रही है। किसानों के आंदोलन, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के संघर्ष और विभिन्न सामाजिक आंदोलनों का उल्लेख करते हुए लेखक ने कहा कि सरकारें कई बार संवाद की जगह टकराव का रास्ता अपनाती दिखाई देती हैं।
आलेख में महात्मा गांधी के विचारों का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि गांधी अनशन को अहिंसा के शस्त्रागार का अंतिम अस्त्र मानते थे। उनका मानना था कि इसका प्रयोग तभी होना चाहिए, जब सभी शांतिपूर्ण प्रयास समाप्त हो जाएं। गांधी के अनुसार अनशन का उद्देश्य किसी की हार-जीत नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, सत्य और नैतिकता की स्थापना होना चाहिए।
लेख में स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारियों जतिन दास, महावीर सिंह और मनिंद्रनाथ बनर्जी के बलिदानों का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि उनके अनशन केवल विरोध नहीं थे, बल्कि अन्याय के विरुद्ध अंतिम संघर्ष थे।
स्वतंत्र भारत के कई चर्चित अनशनों का उल्लेख करते हुए लेखक ने इरोम शर्मिला, गुरुशरण छाबड़ा, स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद (प्रो. जी.डी. अग्रवाल), संत गोपालदास, स्वामी निगमानंद और स्वामी गोकुलानंद जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं और संतों के संघर्षों को याद किया है। लेख के अनुसार इनमें से कई लोगों ने लंबा अनशन किया, लेकिन उनकी मांगें पूरी नहीं हुईं और कुछ को अपने प्राणों की आहुति तक देनी पड़ी।
लेख में यह भी उल्लेख किया गया है कि प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेंद्र मोदी ने शांतिपूर्ण आंदोलनों और अनशनकारियों के समर्थन में कई बयान दिए थे। लेकिन लेखक का दावा है कि सत्ता में आने के बाद सरकारों के रवैये में बदलाव दिखाई दिया और कई आंदोलनों को अपेक्षित संवाद नहीं मिला।
लेख में सरकारों के रवैये को “सगे और सौतेले” दृष्टिकोण से जोड़ते हुए कहा गया है कि कुछ आंदोलनों को प्राथमिकता मिलती है, जबकि कई शांतिपूर्ण आंदोलनों को लंबे समय तक अनदेखा किया जाता है। लेखक का कहना है कि इससे लोकतांत्रिक मूल्यों और अहिंसक संघर्षों की प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न लगने लगे हैं।
आलेख के अंत में लेखक ने प्रसिद्ध लेखक जॉर्ज ऑरवेल की टिप्पणी का उल्लेख करते हुए कहा है कि गांधी की अहिंसा उस दौर में इसलिए प्रभावी रही क्योंकि ब्रिटिश शासन को जनमत, प्रेस और नैतिक आलोचना की परवाह करनी पड़ती थी। लेखक ने प्रश्न उठाया है कि क्या आज के लोकतंत्र में भी वैसी ही संवेदनशीलता और नैतिक जवाबदेही बची है, या फिर अहिंसा और सत्याग्रह की शक्ति धीरे-धीरे कमजोर पड़ती जा रही है।
यह लेख केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि लोकतंत्र, जनआंदोलनों और अहिंसक संघर्षों की वर्तमान प्रासंगिकता पर गंभीर बहस छेड़ता है। यह सवाल छोड़ता है कि यदि शांतिपूर्ण संघर्षों की आवाज़ लगातार अनसुनी होती रही, तो भविष्य में लोकतांत्रिक आंदोलनों की दिशा क्या होगी?

(यह समाचार वरिष्ठ पत्रकार कृष्ण प्रताप सिंह के प्रकाशित आलेख पर आधारित है। इसमें व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं।)
प्रदीप मिश्रा
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