‘मुक्तांचल’ के स्वर्णिम 50वें अंक का लोकार्पण, कोलकाता की साहित्यिक विरासत पर हुआ गंभीर मंथन
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हावड़ा, पश्चिम बंगाल
By ACGN 7647981711, 9303948009
संवाददाता :- विनोद यादव
‘कलकत्ता से कोलकाता’ विशेषांक का विमोचन, साहित्य, संस्कृति और सामाजिक बदलाव पर विद्वानों ने रखे विचार
हावड़ा ACGN:- विद्यार्थी मंच एवं मुक्तांचल के संयुक्त तत्वावधान में हावड़ा में मुक्तांचल पत्रिका के स्वर्णिम 50वें विशेषांक ‘कलकत्ता से कोलकाता’ का लोकार्पण एवं साहित्यिक अड्डा का आयोजन गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ। कार्यक्रम में देश के प्रतिष्ठित साहित्यकारों, आलोचकों, शिक्षाविदों, पत्रकारों, रंगकर्मियों, शोधार्थियों और युवा रचनाकारों ने कोलकाता की समृद्ध साहित्यिक एवं सांस्कृतिक विरासत पर गंभीर विचार-विमर्श किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ मुक्तांचल की संपादक एवं विद्यार्थी मंच की अध्यक्ष डॉ. मीरा सिन्हा के स्वागत उद्बोधन से हुआ। उन्होंने कहा कि ‘कलकत्ता से कोलकाता’ केवल एक विशेषांक नहीं, बल्कि बदलते समय, समाज, संस्कृति और साहित्य की दो सदियों की यात्रा का महत्वपूर्ण दस्तावेज है। उन्होंने बताया कि इस अंक में शहर के इतिहास, संस्कृति, साहित्य और अनेक महत्वपूर्ण व्यक्तित्वों के योगदान को समाहित करने का प्रयास किया गया है।

प्रख्यात आलोचक एवं विचारक डॉ. शंभुनाथ ने मुक्तांचल की 50 अंकों की सतत प्रकाशन यात्रा को हिंदी साहित्य की उल्लेखनीय उपलब्धि बताते हुए कहा कि साहित्यिक पत्रिकाएं समाज की वैचारिक चेतना को जीवंत बनाए रखने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। उन्होंने कहा कि डिजिटल युग में साहित्यिक संवाद और आत्मीयता को बनाए रखने के लिए ऐसे आयोजनों की आवश्यकता पहले से अधिक बढ़ गई है।
वरिष्ठ आलोचक डॉ. अमरनाथ ने कोलकाता की सांस्कृतिक यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि समय के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों में परिवर्तन अवश्य आया है, लेकिन साहित्य आज भी समाज को दिशा देने का सबसे प्रभावी माध्यम बना हुआ है। उन्होंने मुक्तांचल के संपादकीय स्तर और उसकी गंभीरता की सराहना करते हुए इसे संग्रहणीय पत्रिका बताया।
डॉ. अमित कुमार ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति का अपना एक ‘कलकत्ता’ होता है। उनके अनुसार यह शहर केवल भौगोलिक पहचान नहीं, बल्कि संघर्ष, संस्कृति, विचार और मानवीय संवेदनाओं का जीवंत प्रतीक है। वहीं प्रसिद्ध कथाकार शर्मीला जालान ने कहा कि मुक्तांचल, भारतीय भाषा परिषद और अन्य साहित्यिक मंच समाज में सकारात्मक वैचारिक वातावरण तैयार कर रहे हैं, जहां साहित्य और संस्कृति पर गंभीर संवाद संभव हो पा रहा है।

कार्यक्रम में डॉ. पंकज साहा, महेश जायसवाल, मृत्युंजय श्रीवास्तव, डॉ. चित्रा माली, सुरेश शॉ, प्रकाश अग्रवाल, डॉ. विजया सिंह, जितेंद्र जितांशु, मीनाक्षी सांगनेरिया, विनय जायसवाल और दिव्या प्रसाद सहित अनेक साहित्यकारों ने कोलकाता के साहित्यिक इतिहास, स्त्री-विमर्श, रंगमंच, पत्रकारिता, सामाजिक परिवर्तन और समकालीन हिंदी साहित्य की चुनौतियों पर अपने विचार रखे।
साहित्यिक सत्र में वरिष्ठ ग़ज़लकार सेराज ख़ान बातिश ने अपनी नई ग़ज़लों का प्रभावशाली पाठ किया। विद्यार्थी मंच के सचिव विवेक लाल ने अरुण कमल की चर्चित कविता “जाऊँगा मैं जाऊँगा, कोलकाता जाऊँगा” का सस्वर पाठ किया। वहीं रागिनी पांडेय, स्वराज पांडेय, सुकन्या तिवारी, राव्या श्रीवास्तव और रोहित शर्मा ने अपनी कविताओं का पाठ कर उपस्थित साहित्यप्रेमियों की सराहना प्राप्त की।
इस अवसर पर गाथा प्रकाशन से प्रकाशित वरिष्ठ कवि राजकुमार कुंभज के नवीन कविता संग्रह ‘अंत नहीं, अंतिम नहीं, कुछ भी’ का भी लोकार्पण किया गया। वक्ताओं ने इसे समकालीन हिंदी कविता में मानवीय संवेदना और जनपक्षधर चेतना का महत्वपूर्ण काव्य-संग्रह बताया।
वरिष्ठ समाजसेवी रामनिवास द्विवेदी ने मुक्तांचल की सतत साहित्यिक यात्रा की सराहना करते हुए इसे हिंदी साहित्य की महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। कार्यक्रम का संचालन विनोद यादव ने किया, जबकि अंत में मुक्तांचल के प्रबंध संपादक सुशील कुमार पांडेय ने सभी अतिथियों, वक्ताओं, विद्यार्थियों और साहित्यप्रेमियों के प्रति आभार व्यक्त किया।
समारोह में बड़ी संख्या में साहित्यकार, शोधार्थी, पत्रकार, रंगकर्मी तथा साहित्यप्रेमियों की उपस्थिति रही, जिससे आयोजन एक महत्वपूर्ण साहित्यिक संगम के रूप में यादगार बन गया।
प्रदीप मिश्रा
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