मोबाइल गेम की लत गाँव-गाँव तक पहुँची, बच्चों के भविष्य के लिए बन रही गंभीर चुनौती
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कोरबा, छत्तीसगढ़
By ACGN 7647981711, 9303948009
संवाददाता :- दीपक पटेल
डिजिटल युग में शिक्षा का माध्यम बना मोबाइल अब कई बच्चों के लिए पढ़ाई से दूरी और ऑनलाइन गेम की लत का कारण बनता जा रहा है
कोरबा ACGN:- एक समय था जब गांव की गलियों में बच्चों की किलकारियां, कबड्डी, खो-खो, गिल्ली-डंडा और क्रिकेट की आवाजें सुनाई देती थीं। आज वही गलियां धीरे-धीरे मोबाइल गेम की दुनिया में खोती नजर आ रही हैं। गांवों में भी अब बड़ी संख्या में बच्चे खाली समय का अधिकांश हिस्सा मोबाइल पर ऑनलाइन गेम खेलने में बिता रहे हैं। यह बदलती तस्वीर केवल मनोरंजन का विषय नहीं, बल्कि बच्चों के भविष्य के लिए गंभीर चिंता का कारण बनती जा रही है।
हाल ही में ग्राम जवाली के बरगद के पेड़ के नीचे विद्यालय की आधी छुट्टी में कुछ बच्चे मोबाइल पर ऑनलाइन गेम खेलते दिखाई दिए। खेल के दौरान उनके बीच लगातार गाली-गलौज और “मारो… बचाओ…” जैसी आवाजें सुनाई दे रही थीं। यह कोई अकेली घटना नहीं है। अब गांव की लगभग हर गली में दो-चार बच्चे हाथ में मोबाइल लेकर ऑनलाइन गेम में डूबे हुए आसानी से देखे जा सकते हैं।

कोरोना महामारी के दौरान सरकार ने बच्चों की पढ़ाई बाधित न हो, इसके लिए ऑनलाइन शिक्षा की व्यवस्था शुरू की थी। उस समय मोबाइल और इंटरनेट शिक्षा का महत्वपूर्ण माध्यम बने। लेकिन समय के साथ इसका दूसरा पहलू भी सामने आया। अनेक बच्चे पढ़ाई की अपेक्षा घंटों तक पबजी, फ्री फायर, रील्स और अन्य ऑनलाइन गेम तथा मनोरंजन सामग्री में समय बिताने लगे। इसका असर उनकी पढ़ाई, व्यवहार, स्वास्थ्य और पारिवारिक वातावरण पर भी दिखाई देने लगा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अत्यधिक मोबाइल गेम खेलने से बच्चों की एकाग्रता कम होती है, पढ़ाई में रुचि घटती है, आंखों पर दुष्प्रभाव पड़ता है तथा स्वभाव में चिड़चिड़ापन और आक्रामकता भी बढ़ सकती है। कई परिवारों में माता-पिता और बच्चों के बीच तनाव की स्थिति भी देखने को मिल रही है।

समस्या का समाधान केवल मोबाइल छीन लेना या बच्चों को डांटना नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि अभिभावक बच्चों के साथ अधिक समय बिताएं, उनके मित्र बनें, उनकी दिनचर्या पर ध्यान दें तथा उन्हें पुस्तक पठन, खेलकूद, संगीत, चित्रकला और अन्य रचनात्मक गतिविधियों के लिए प्रेरित करें। बच्चों को यह समझाना भी आवश्यक है कि मोबाइल ज्ञान और सीखने का माध्यम है, जीवन का केंद्र नहीं।
विद्यालयों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। शिक्षकों को समय-समय पर डिजिटल साक्षरता, मोबाइल के संतुलित उपयोग और ऑनलाइन गेम की लत से होने वाले नुकसान के बारे में विद्यार्थियों को जागरूक करना चाहिए। समाज और अभिभावकों के संयुक्त प्रयास से ही इस बढ़ती चुनौती का प्रभावी समाधान संभव है।
लेख में कही गई ये पंक्तियां आज की स्थिति पर सटीक व्यंग्य करती हैं—
“पबजी के शेर अधिकतर पढ़ाई-लिखाई में हो जाते हैं ढेर।”
“जिसके कारण करते रहते हैं वो हरदम माता-पिता से बैर।”
“जो पबजी, फ्री फायर और रील्स का ज्यादा हुआ, वह किसी और का नहीं हुआ।”
ये पंक्तियां केवल व्यंग्य नहीं, बल्कि समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी हैं। तकनीक स्वयं समस्या नहीं है, बल्कि उसका असंतुलित उपयोग समस्या बनता है। यदि मोबाइल का उपयोग शिक्षा, ज्ञान और सकारात्मक उद्देश्य के लिए किया जाए तो यह बच्चों के भविष्य को संवार सकता है, लेकिन यदि वही मोबाइल उनकी दिनचर्या और सोच पर हावी हो जाए, तो यह उनके उज्ज्वल भविष्य के सामने बड़ी चुनौती बन सकता है।
प्रदीप मिश्रा
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