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लोतलोता राखड़ डैम पर टकराव तेज, गांव बनाम प्रबंधन की जंग,विकास या भविष्य का खतरा?, जवाब से ज्यादा सवाल

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कोरबा छत्तीसगढ़

By ACGN 7647981711, 9303948009

लोतलोता राखड़ डैम फिर बना विवाद का केंद्र : ग्रामीणों का विरोध, सीएसईबी की नोटिस, पंचायत का जवाब और कलेक्टर से गुहार

तीन साल बंद रहा डैम, अब अचानक क्यों जागी सीएसईबी? ग्रामीण बोले- पहले सुरक्षा की गारंटी, फिर शुरू हो डैम का संचालन

झाबु डैम हादसे के बाद डरे ग्रामीण, सीएसईबी की मंशा और अनुमति पर उठ रहे सवाल, जवाब तलाश रहे ग्रामीण

कोरबा। छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत उत्पादन कंपनी (सीएसईबी) के कोरबा पश्चिम क्षेत्र अंतर्गत ग्राम पंचायत लोतलोता स्थित बंद पड़े राखड़ डैम को पुनः उपयोग में लाने की तैयारी को लेकर एक बार फिर विवाद गहरा गया है। ग्रामीणों और कंपनी प्रबंधन के बीच शुरू हुई तनातनी अब प्रशासनिक और कानूनी स्तर तक पहुंच गई है। हाल ही में झाबुआखार राखड़ डैम टूटने की घटना और उसमें एक युवक की मौत के बाद ग्रामीणों की आशंकाएं और बढ़ गई हैं।

1985-86 में बना था राखड़ डैम, 2023 में हुआ बंद

ग्रामीणों के अनुसार ग्राम लोतलोता में वर्ष 1985-86 में सीएसईबी द्वारा भूमि अधिग्रहण कर राखड़ डैम का निर्माण कराया गया था। वर्षों तक थर्मल पावर प्लांट से निकलने वाली राख का निस्तारण इसी डैम में किया जाता रहा। वर्ष 2023 में डैम पूरी तरह भर जाने और पर्यावरणीय अनुमति नहीं मिलने के कारण इसे बंद कर दिया गया। इसके बाद डैम क्षेत्र में पौधरोपण किया गया, मिट्टी भराई की गई और राख परिवहन करने वाली पाइपलाइन भी हटा दी गई थी।

झाबु  राखड़ डैम हादसे के बाद बढ़ी चिंता

21 अप्रैल 2026 को झाबुआखार राखड़ डैम टूटने की घटना ने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया। इस हादसे में एक व्यक्ति की मौत हुई तथा बड़ी मात्रा में राख किसानों के खेतों और हसदेव नदी तक पहुंच गई। घटना के बाद उड़ीसा से विशेषज्ञों की टीम ने निरीक्षण किया। इसी दौरान लोतलोता के बंद पड़े राखड़ डैम का भी मुआयना किया गया। हालांकि जांच रिपोर्ट अभी तक सार्वजनिक नहीं हुई है।

ग्रामीणों ने रोका पाइपलाइन बिछाने का कार्य

ग्रामीणों का आरोप है कि हाल ही में सीएसईबी द्वारा लोतलोता के बंद डैम तक नई पाइपलाइन बिछाने और पानी निकासी संरचना को पुनः सक्रिय करने का कार्य शुरू किया गया। ग्रामीणों ने इसका विरोध करते हुए पूछा कि क्या कंपनी के पास पर्यावरण विभाग और शासन की वैध अनुमति है? यदि अनुमति है तो उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा?

अधिवक्ता द्वारा इन लोगों को भेजी गई नोटिस?

विरोध के बाद सीएसईबी की ओर से अधिवक्ता रविन्द्र कुमार पाराशर के माध्यम से नोटिस जारी की गई। यह नोटिस जनपद सदस्य जीवन लाल यादव, ग्रामीण प्रतिनिधि सुदीम यादव तथा पूर्व सरपंच केशव (केसर) भारिया को भेजी गई। नोटिस में आरोप लगाया गया कि ये लोग ग्रामीणों को उकसाकर शासकीय कार्य में बाधा पहुंचा रहे हैं तथा कंपनी को आर्थिक नुकसान पहुंचा रहे हैं। साथ ही भविष्य में कार्य में व्यवधान होने पर कानूनी कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई।

नोटिस के जवाब में ग्राम पंचायत और ग्रामीणों का पलटवार

नोटिस के जवाब में ग्राम पंचायत लोतलोता की ओर से सरपंच रामेश्वरी मंडावार के माध्यम से विस्तृत जवाब भेजा गया। जवाब में कहा गया कि जिन व्यक्तियों को नोटिस दी गई है, उनका कोई व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं है बल्कि वे गांव और किसानों के हित में आवाज उठा रहे हैं। पंचायत ने यह भी दावा किया कि डैम को पुनः शुरू करने के लिए आवश्यक पर्यावरणीय स्वीकृतियों की जानकारी ग्रामीणों को उपलब्ध नहीं कराई गई है।
जवाब में यह भी कहा गया कि यदि भविष्य में डैम से किसी प्रकार की जनहानि, पर्यावरणीय क्षति या कृषि भूमि को नुकसान होता है तो उसकी पूरी जिम्मेदारी कंपनी की होगी।

जनदर्शन में पहुंचे ग्रामीण, कलेक्टर से लगाई गुहार

मामले को लेकर ग्रामीणों ने कलेक्टर कार्यालय पहुंचकर जनदर्शन में शिकायत प्रस्तुत की। ग्रामीणों ने मांग की कि लोतलोता राखड़ डैम की तकनीकी एवं पर्यावरणीय जांच कराई जाए, सभी अनुमतियों को सार्वजनिक किया जाए तथा जब तक जांच पूरी न हो जाए, तब तक डैम को पुनः चालू करने की प्रक्रिया पर रोक लगाई जाए।
प्राप्त जानकारी के अनुसार शिकायत के बाद राजस्व विभाग के अधिकारियों द्वारा क्षेत्र का निरीक्षण भी किया गया है।

सबसे बड़ा सवाल : जब डैम बंद था तो राख क्यों नहीं निकाली गई?

इस मामले में कई महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े हो रहे हैं

फाइल फोटो


यदि लोतलोता डैम को भविष्य में पुनः उपयोग में लाना था तो वर्ष 2023 से अब तक इसकी नियमित मरम्मत और रखरखाव क्यों नहीं किया गया?


जब संचालित झाबु राखड डैम से राख निकालकर परिवहन किया जा रहा था तो लोतलोता के पुराने डैम से राख निकालकर उसका उपयोग सड़क निर्माण, गड्ढा भराई और अन्य विकास कार्यों में क्यों नहीं किया गया?


यदि ऐसा किया जाता तो क्या डैम दें में राख डालनेकी क्षमता बढ़ सकती थी?

तीन वर्षों तक बंद पड़े डैम को अचानक पुनः सक्रिय करने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई?

वर्तमान मेंक्या डैम की वर्तमान संरचनात्मक स्थिति सुरक्षित है?

पर्यावरणीय अनुमति नहीं मिलने के कारण डैम का उपयोग बंद कर दिया गया था पुनः चालू करने के लिए प्रबंधन के पास क्या पर्यावरणीय स्वीकृति प्राप्त हो चुकी है? यदि हां, तो उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा?

झाबु राखड़ डैम के बार-बार फूटने का कारण एवं एक युवक की मृत्यु होने के बाद जांच में आई टीम की जांच रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक क्यों नहीं हुई?

ग्रामीणों की आशंका बनाम कंपनी की जरूरत

एक पक्ष का कहना है कि बिजली उत्पादन के लिए राख निस्तारण की व्यवस्था जरूरी है और आवश्यक मरम्मत कार्य किए जा रहे हैं। वहीं लोतलोता के ग्रामीणों का कहना है कि उनका विरोध किसी विकास कार्य के खिलाफ नहीं है। उनका मुख्य उद्देश्य भविष्य में किसी संभावित दुर्घटना को रोकना है। झाबु राखड़ डैम हादसे के बाद लोगों के मन में यह सवाल और गहरा गया है कि कहीं लोतलोता में भी ऐसी स्थिति उत्पन्न न हो जाए। उनका मानना है कि जब तक तकनीकी जांच रिपोर्ट, पर्यावरणीय स्वीकृतियां और सुरक्षा संबंधी दस्तावेज सार्वजनिक नहीं किए जाते, तब तक किसी भी पुनः संचालन की प्रक्रिया पारदर्शिता के दायरे में नहीं मानी जा सकती।

यही कारण है कि यह विवाद अब केवल एक पाइपलाइन या राखड़ डैम का नहीं, बल्कि जनसुरक्षा, पर्यावरणीय जवाबदेही, प्रशासनिक पारदर्शिता और ग्रामीणों के विश्वास का विषय बन चुका है। आने वाले दिनों में प्रशासन, कंपनी प्रबंधन और विशेषज्ञों की रिपोर्ट इस पूरे मामले की दिशा तय करेगी।

वर्तमान में प्रशासन द्वारा मामले की प्रारंभिक समीक्षा और राजस्व अमले के माध्यम से स्थल निरीक्षण कराया जा रहा है। हालांकि ग्रामीणों का मानना है कि केवल निरीक्षण पर्याप्त नहीं होगा। इस विवाद के समाधान के लिए सबसे पहले लोतलोता राखड़ डैम की स्वतंत्र तकनीकी एवं संरचनात्मक जांच कराई जानी चाहिए, जिसकी रिपोर्ट सार्वजनिक हो। इसके साथ ही पर्यावरण विभाग, भू-वैज्ञानिक विशेषज्ञों, जल संसाधन विभाग, जिला प्रशासन, सीएसपीजीसीएल प्रबंधन तथा ग्रामीण प्रतिनिधियों की संयुक्त समिति बनाकर पूरे मामले की समीक्षा की जानी चाहिए। यदि डैम को पुनः उपयोग में लाने की कोई योजना है तो उसके पूर्व पर्यावरणीय स्वीकृति, जनसुनवाई और सुरक्षा ऑडिट अनिवार्य रूप से कराया जाना चाहिए। वहीं यदि डैम में संग्रहित राख का सुरक्षित उपयोग सड़क निर्माण, गड्ढों के भराव, औद्योगिक कार्यों अथवा अन्य स्वीकृत परियोजनाओं में संभव हो तो चरणबद्ध तरीके से उसका निष्पादन भी एक व्यवहारिक विकल्प हो सकता है। इससे डैम पर दबाव कम होगा और भविष्य में संभावित जोखिम भी घटेंगे।

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रशासन और कंपनी ग्रामीणों की आशंकाओं को दूर करने के लिए सभी तथ्य सार्वजनिक करेंगे, या फिर यह मामला भी जांच और आश्वासनों के बीच उलझा रहेगा? क्या झाबु राखड़ डैम हादसे से सबक लेते हुए सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी? क्या पर्यावरणीय अनुमति और तकनीकी परीक्षण की रिपोर्ट सार्वजनिक होगी? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या विकास और जनसुरक्षा के बीच संतुलन बनाते हुए ऐसा समाधान निकलेगा जिस पर ग्रामीणों, प्रशासन और कंपनीतीनों की सहमति हो?

यही वे प्रश्न हैं जिनके उत्तर अब केवल लोतलोता ही नहीं, बल्कि पूरे हसदेव अंचल के लोग जानना चाहते हैं।

फिलहाल लोतलोता का राखड़ डैम केवल एक तकनीकी परियोजना नहीं, बल्कि पर्यावरणीय सुरक्षा, ग्रामीण अधिकारों और औद्योगिक जवाबदेही का बड़ा मुद्दा बन चुका है। अब सभी की निगाहें प्रशासनिक जांच और आगामी निर्णयों पर टिकी हैं कि आखिर इस विवाद का समाधान किस दिशा में जाता है।

प्रदीप मिश्रा
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