मलमास आत्मशुद्धि, भक्ति और दान-पुण्य का पवित्र काल : पंडित हिमांशु जोशी
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कोरबा छत्तीसगढ़
By ACGN 7647981711, 9303948009
पुरुषोत्तम मास में भगवान विष्णु की आराधना, जप-तप और सेवा कार्यों का बताया विशेष महत्व
कोरबा, ACGN:- कोरबा जिले के दर्री क्षेत्र निवासी भागवताचार्य पंडित हिमांशु जोशी ने मलमास के धार्मिक महत्व की जानकारी देते हुए बताया कि सनातन धर्म में मलमास को अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी समय माना गया है। इसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है, जो भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है। इस माह में पूजा-पाठ, जप-तप, दान-पुण्य, कथा श्रवण, भजन-कीर्तन और सेवा कार्य करने से विशेष पुण्य फल प्राप्त होता है।
पंडित हिमांशु जोशी ने बताया कि हिंदू पंचांग के अनुसार जब सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश नहीं करता और चंद्र मास का संतुलन बिगड़ता है तब अतिरिक्त माह जुड़ता है, जिसे मलमास या अधिक मास कहा जाता है। यह लगभग हर तीन वर्ष में एक बार आता है। उन्होंने कहा कि खगोलीय गणना और धार्मिक परंपराओं के अनुसार पंचांग के संतुलन को बनाए रखने के लिए इस अतिरिक्त माह का महत्व बहुत बड़ा माना गया है।
उन्होंने बताया कि पहले इस मास को अन्य महीनों की तुलना में कम महत्व का माना जाता था, लेकिन भगवान विष्णु ने इसे अपने नाम “पुरुषोत्तम” से जोड़कर इसे श्रेष्ठ स्थान प्रदान किया। तभी से इसे पुरुषोत्तम मास कहा जाने लगा और यह भगवान विष्णु की भक्ति के लिए सबसे उत्तम समय माना जाता है।
पंडित जोशी ने कहा कि मलमास में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, नया व्यवसाय शुरू करना और अन्य मांगलिक कार्य सामान्यतः नहीं किए जाते, क्योंकि यह समय भौतिक सुख-सुविधाओं से अधिक आध्यात्मिक साधना और आत्मचिंतन का माना गया है। इस दौरान व्यक्ति को अपने जीवन में संयम, सादगी और धर्म के मार्ग पर चलने का प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने लोगों को सलाह देते हुए कहा कि मलमास में भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की पूजा-अर्चना, गीता पाठ, रामायण श्रवण, तुलसी पूजा, गरीबों को भोजन कराना, गौ सेवा, जल सेवा, जरूरतमंदों को वस्त्र दान और धार्मिक अनुष्ठान करना अत्यंत फलदायी माना जाता है। इस माह में किए गए अच्छे कार्यों का कई गुना पुण्य प्राप्त होता है तथा जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और मानसिक शांति आती है।
पंडित हिमांशु जोशी ने आगे कहा कि वर्तमान समय में बढ़ती भागदौड़ और तनावपूर्ण जीवन के बीच मलमास लोगों को आत्मिक शांति, धैर्य और भक्ति की ओर प्रेरित करता है। यह केवल धार्मिक परंपरा नहीं बल्कि व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाने और समाज में सेवा भावना बढ़ाने का भी संदेश देता है। उन्होंने लोगों से अपील की कि इस पवित्र माह में नकारात्मकता से दूर रहकर अधिक से अधिक समय पूजा-पाठ, सत्संग और जनसेवा में लगाएं।
प्रदीप मिश्रा [संपादक]
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