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सच की तह तक

‘ज्ञानभारतम’ से छत्तीसगढ़ गढ़ रहा नई सांस्कृतिक पहचान

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अम्बिकापुर, छत्तीसगढ़

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संवाददाता – सौरभ साहू
पांडुलिपियों के संरक्षण और डिजिटलीकरण से विरासत को वैश्विक मंच देने की पहल
अम्बिकापुर सहित पूरे छत्तीसगढ़ में “ज्ञानभारतम राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण” अभियान के जरिए राज्य अपनी सांस्कृतिक विरासत को नई पहचान देने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। प्रदेश के कैबिनेट मंत्री राजेश अग्रवाल ने बताया कि भारत की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा विश्व में अपनी अलग पहचान रखती है और हमारे पूर्वजों द्वारा संरक्षित पांडुलिपियां, ताम्रपत्र और हस्तलिखित ग्रंथ हमारी सभ्यता की जीवंत धरोहर हैं।
उन्होंने कहा कि इस अभियान के माध्यम से इन अमूल्य दस्तावेजों को खोजने, संरक्षित करने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का व्यापक प्रयास किया जा रहा है। छत्तीसगढ़ में इसे जन आंदोलन का रूप देने के लिए गांव-गांव और घर-घर तक पहुंचकर पांडुलिपियों की खोज की जा रही है, जिससे आम नागरिकों की सहभागिता भी बढ़ रही है।
इस पहल के सकारात्मक परिणाम भी सामने आने लगे हैं। हाल ही में दामाखेड़ा क्षेत्र में 326 वर्ष पुरानी दुर्लभ हस्तलिखित पांडुलिपियां प्राप्त हुई हैं, जिनमें उस समय के समाज, धर्म और इतिहास की महत्वपूर्ण जानकारी दर्ज है। वहीं बिलासपुर जिले के ऐतिहासिक स्थल मल्हार से करीब 2000 वर्ष पुराना ताम्रपत्र भी मिला है, जो प्राचीन शासन व्यवस्था और सामाजिक ढांचे की झलक प्रस्तुत करता है।
अम्बिकापुर सहित अन्य क्षेत्रों में भी विभिन्न कालखंडों की पांडुलिपियों की खोज की गई है, जिनका “ज्ञानभारतम ऐप” के माध्यम से डिजिटलीकरण किया जा रहा है। इससे इन धरोहरों का सुरक्षित संरक्षण सुनिश्चित होगा और शोधार्थियों तथा विद्यार्थियों के लिए यह सामग्री आसानी से उपलब्ध हो सकेगी।
मंत्री ने कहा कि पांडुलिपियां केवल इतिहास की स्मृति नहीं हैं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए मार्गदर्शक हैं। इस अभियान का उद्देश्य न केवल संरक्षण करना है, बल्कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना भी है।
उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे अपनी जड़ों को समझें और इस अभियान से जुड़कर अपनी संस्कृति के संरक्षण में भागीदारी निभाएं। “ज्ञानभारतम” एक ऐसा प्रयास है जो आने वाली पीढ़ियों के लिए ज्ञान, प्रेरणा और गर्व का स्थायी आधार बनेगा।

प्रदीप मिश्रा
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