कलम के कसाई और चीखता बाज़ार: लोकतंत्र का चौथा स्तंभ या प्रायोजित तमाशा?
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कोरबा, छत्तीसगढ़
By ACGN 7647981711, 9303948009
सवालों की धार कुंद, स्क्रीन पर शोर तेज, पत्रकारिता पर सत्ता, टीआरपी और एल्गोरिदम के शिकंजे को लेकर गंभीर सवाल
आलेख :- सौरभसाहू
कभी पत्रकारिता लोकतंत्र का प्रहरी थी—सत्ता से सवाल करने वाली, जनता की आवाज़ बनने वाली और सच को निर्भीकता से सामने रखने वाली। लेकिन आज हालात बदलते नजर आ रहे हैं। न्यूज़ रूम की प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं और सच की जगह ‘प्रबंधन’ ने ले ली है। सवाल उठता है कि क्या पत्रकारिता अब भी जनहित का माध्यम है या फिर सत्ता, बाजार और तकनीक के दबाव में अपना मूल चरित्र खोती जा रही है।
आज के दौर में खबरों की प्रस्तुति से लेकर चयन तक, हर स्तर पर बदलाव दिखाई देता है। एंकरिंग अब संवाद नहीं, बल्कि प्रदर्शन बनती जा रही है। स्टूडियो में शोर है, लेकिन समाज के असली मुद्दों पर सन्नाटा पसरा हुआ है। डिजिटल माध्यमों ने सूचना का विस्तार किया है, लेकिन इसके साथ भ्रम और प्रोपेगेंडा का खतरा भी बढ़ा है।
इन्हीं बदलते परिदृश्यों के बीच पत्रकारिता की वर्तमान स्थिति पर कुछ प्रमुख बिंदु उभरकर सामने आते हैं
दलाली और चापलूसी का बढ़ता प्रभाव
पत्रकारिता का एक बड़ा वर्ग अब सत्ता के साथ खड़ा नजर आता है। तीखे और असहज सवालों की जगह अब सुविधाजनक प्रश्न पूछे जा रहे हैं। सत्ता से निकटता बनाए रखने के लिए पत्रकारिता की निष्पक्षता प्रभावित हो रही है। इससे जनता के भरोसे पर सीधा असर पड़ रहा है।
टीआरपी के लिए नफरत का बाजार
न्यूज़ चैनलों में बहस के नाम पर समाज को बांटने का सिलसिला बढ़ा है। धर्म, जाति और भावनाओं से जुड़े मुद्दों को उछालकर दर्शकों को बांधे रखने की कोशिश होती है, जबकि महंगाई, बेरोजगारी और शिक्षा जैसे जमीनी मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। इससे समाज में तनाव और विभाजन की स्थिति बनती है।
स्टूडियो की बहस बनाम जमीनी सच्चाई
टीवी स्टूडियो में दिखने वाली बहसें अक्सर वास्तविकता से दूर होती हैं। जहां देश की सड़कों पर आम नागरिक अपनी समस्याओं से जूझ रहा है, वहीं स्क्रीन पर कृत्रिम मुद्दों का शोर सुनाई देता है। इससे पत्रकारिता का जनसरोकार कमजोर होता है।
एल्गोरिदम और वायरल संस्कृति का प्रभाव
डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अब वही खबर चलती है जो ज्यादा वायरल होती है। एल्गोरिदम तय करता है कि क्या दिखेगा और क्या नहीं। इस प्रक्रिया में कई महत्वपूर्ण मुद्दे दब जाते हैं, जबकि सनसनीखेज सामग्री को बढ़ावा मिलता है। ‘डीपफेक’ और एडिटेड कंटेंट ने सच्चाई को और चुनौतीपूर्ण बना दिया है।
प्रेस कॉन्फ्रेंस का बदलता स्वरूप
जहां पहले प्रेस कॉन्फ्रेंस जवाबदेही का मंच होती थी, अब वह ‘मैनेज्ड इवेंट’ में बदलती जा रही है। सवाल पहले से तय होते हैं, असहज प्रश्नों से बचा जाता है और पत्रकारों की भूमिका सीमित कर दी जाती है। इससे लोकतंत्र की पारदर्शिता पर असर पड़ता है।
स्वतंत्र पत्रकारिता का उभार
मुख्यधारा मीडिया के बीच कुछ स्वतंत्र पत्रकार और छोटे डिजिटल प्लेटफॉर्म अब भी सच को सामने लाने का प्रयास कर रहे हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद ये लोग जमीनी रिपोर्टिंग और निष्पक्षता को बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। सोशल मीडिया उनके लिए एक प्रभावी मंच बनकर उभरा है।
पत्रकार की जिम्मेदारी और स्वाभिमान
पत्रकारिता केवल पेशा नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है। सवाल पूछना, सच को सामने लाना और सत्ता को जवाबदेह बनाना इसका मूल धर्म है। जब पत्रकार अपने स्वाभिमान से समझौता करता है, तो लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ कमजोर हो जाता है।
आगे की राह क्या हो
समय की मांग है कि पत्रकारिता अपने मूल मूल्यों,सत्य, निष्पक्षता और जनहित की ओर लौटे। मीडिया संस्थानों को पारदर्शिता और जिम्मेदारी को प्राथमिकता देनी होगी। साथ ही, पत्रकारों को भी अपने कर्तव्य के प्रति सजग रहना होगा, ताकि समाज को सही और संतुलित जानकारी मिल सके।
आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पत्रकारिता फिर से अपनी खोई हुई विश्वसनीयता हासिल कर पाएगी या यह शोर और प्रबंधन के बीच ही उलझकर रह जाएगी। जवाब समय के साथ मिलेगा, लेकिन पहल आज ही करनी होगी।
प्रदीप मिश्रा
निष्पक्ष, निर्भीक और सच्ची खबरों और जनहित के प्रति समर्पित पत्रकारिता के साथ देश में तेजी से बढ़ता विश्वसनीय वेब पोर्टल अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़

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