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सच की तह तक

“मोबाइल की चमक और शराब का जहर: खोता बचपन, भटकती युवा पीढ़ी और टूटते संस्कार”

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संपादकीय

अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ साप्ताहिक विशेषांक

✍️ ‘कलम की धार’ ✍️

By ACGN 7647981711, 9303948009

अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ का साप्ताहिक विशेषांक “कलम की धार” पाठकों की मांग पर हर सप्ताह प्रकाशित किया जाता है। यह केवल एक कॉलम नहीं, बल्कि समाज की जमीनी सच्चाइयों को उजागर करने, जनहित के मुद्दों को प्रमुखता से उठाने और शासन-प्रशासन को आईना दिखाने का सशक्त मंच है। “कलम की धार” का उद्देश्य है—उन विषयों पर खुलकर लिखना, जिन पर अक्सर चर्चा तो होती है, लेकिन समाधान की दिशा में ठोस पहल कम दिखाई देती है। आज का विषय भी एक ऐसी ही गंभीर सच्चाई को सामने लाता है, जो हर घर, हर गांव और हर परिवार से जुड़ी हुई है।

जनहित, तथ्य और साहस का साप्ताहिक मंच-जहाँ सच कहा जाता है, सवाल पूछे जाते हैं, और कीमत जानकर भी कलम नहीं रुकती।

कलम की धार’ कोई औपचारिक कॉलम नहीं, बल्कि व्यवस्था के मौन को तोड़ने वाली आवाज़ है।आज जब “कलम की धार” समाज के आईने को साफ करने का प्रयास करती है, तो एक सच्चाई बार-बार सामने आती है हमारी युवा पीढ़ी, हमारे अपने बच्चे, धीरे-धीरे एक ऐसे दलदल में फंसते जा रहे हैं, जिसे हमने खुद अपने हाथों से तैयार किया है। यह केवल शराब या नशे की बात नहीं है, बल्कि यह उस बदलती जीवनशैली, संस्कारों के क्षरण और डिजिटल दुनिया के अंधे आकर्षण की कहानी है, जो गांव से लेकर शहर तक हर घर में प्रवेश कर चुकी है

आज का विषय -:-संस्कार खो रहे हैं… संस्कृति बदल रही है… और युवा पीढ़ी एक खतरनाक मोड़ पर खड़ी है।

गांव से शहर तक नशे का फैलता जाल—लड़के ही नहीं, लड़कियां भी गिरफ्त में; सोशल मीडिया, महंगे मोबाइल और शराब की आसान उपलब्धता ने बदली समाज की तस्वीर

एक समय था जब गांव की चौपालों में बुजुर्गों की बातें, बच्चों की किलकारियां और संस्कारों की छांव हुआ करती थी। आज वही चौपाल कई जगह शराब की बोतलों और नशे की गिरफ्त में दिखाई देने लगी है। छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में शासकीय शराब दुकानों की बढ़ती संख्या और उसके साथ-साथ अवैध शराब का फैलता कारोबार इस समस्या को और गहरा बना रहा है। स्थिति यह है कि अब शराब केवल किसी बंद जगह तक सीमित नहीं रही, बल्कि चौक-चौराहों पर भी इसकी उपलब्धता इतनी आसान हो चुकी है कि नाबालिग बच्चे भी इसके संपर्क में आ रहे हैं।

यह सबसे चिंताजनक पहलू है कि नशे की इस लहर में अब केवल लड़के ही नहीं, बल्कि लड़कियां भी तेजी से शामिल होती जा रही हैं। पहले जहां लड़कियों को इन चीजों से दूर माना जाता था, वहीं अब बदलती सामाजिक परिस्थितियों और गलत आधुनिकता की परिभाषा ने उन्हें भी इस रास्ते की ओर धकेल दिया है। यह बदलाव केवल व्यवहार में नहीं, बल्कि सोच में भी दिख रहा है, जहां स्वतंत्रता और उन्मुक्तता के नाम पर कई बार गलत दिशा को भी स्वीकार किया जा रहा है।, इसी के समानांतर एक और नशा तेजी से पनप रहा है मोबाइल और सोशल मीडिया का नशा

डिजिटल खिलौनों में कैद बचपन: जब रोते बच्चे को मोबाइल से चुप कराया जाता है

आज का सबसे बड़ा और कड़वा सच यही है कि बचपन अब मिट्टी में नहीं, मोबाइल स्क्रीन में पल रहा है। जब एक छोटा बच्चा रोता है, तो उसे गोद में लेकर समझाने के बजाय मोबाइल थमा दिया जाता है। धीरे-धीरे यही आदत उसकी जरूरत बन जाती है और वही मोबाइल उसके जीवन का केंद्र बन जाता है। खेल के मैदान सूने हो रहे हैं, बच्चों की हंसी स्क्रीन के भीतर कैद हो रही है और उनका मानसिक विकास भी प्रभावित हो रहा है। यह एक ऐसा शुरुआती नशा है, जो आगे चलकर बड़े संकट का रूप ले लेता है।

शराब का बढ़ता जाल: चौक-चौराहों तक पहुंचा नशा, नाबालिग भी चपेट में

छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में शासकीय शराब दुकानों की बढ़ती संख्या और अवैध शराब कारोबार ने हालात को और गंभीर बना दिया है। आज स्थिति यह है कि गांव के चौक-चौराहों पर भी शराब आसानी से उपलब्ध हो जाती है। नाबालिग बच्चे तक इसकी चपेट में आ रहे हैं, जो समाज के लिए एक खतरनाक संकेत है। यह केवल एक आदत नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी को बर्बादी की ओर धकेलने वाला रास्ता बन चुका है।

बदलती तस्वीर: अब नशे की गिरफ्त में लड़कियां भी

समाज का एक और चिंताजनक पहलू यह है कि अब नशे की इस लहर में केवल लड़के ही नहीं, बल्कि लड़कियां भी तेजी से शामिल हो रही हैं। आधुनिकता और स्वतंत्रता के नाम पर कई बार गलत दिशा को अपनाया जा रहा है। सोशल मीडिया का प्रभाव और बदलती जीवनशैली ने लड़कियों को भी इस दलदल की ओर खींच लिया है, जिससे समाज की संरचना पर गहरा असर पड़ रहा है।

रील और रीयलिटी का फर्क: इंस्टाग्राम की दुनिया में फंसती जिंदगी

आज का युवा “वायरल” होने की होड़ में अपनी असली पहचान खोता जा रहा है। इंस्टाग्राम पर रील बनाने का जुनून इस कदर हावी है कि कई बार बच्चे अपनी निजी सीमाओं को भूल जाते हैं। खासकर लड़कियां बिना सुरक्षा समझ के अपने वीडियो और फोटो साझा कर रही हैं, जो आगे चलकर ब्लैकमेलिंग और मानसिक उत्पीड़न का कारण बन सकते हैं। यह डिजिटल दुनिया जितनी आकर्षक दिखती है, उतनी ही खतरनाक भी है।

आईफोन का जुनून: स्टेटस के नाम पर बढ़ता पारिवारिक दबाव

ग्रामीण अंचलों में भी अब आईफोन और महंगे मोबाइल का क्रेज तेजी से बढ़ रहा है। बच्चे इसे अपनी पहचान और स्टेटस से जोड़कर देखने लगे हैं। जब परिवार इस मांग को पूरा नहीं कर पाता, तो घर में तनाव पैदा होता है। कई बार माता-पिता कर्ज लेकर, जमीन बेचकर या पशुधन गिरवी रखकर बच्चों की मांग पूरी करते हैं। यह केवल आर्थिक बोझ नहीं, बल्कि पारिवारिक मूल्यों के कमजोर होने का संकेत है।

संस्कारों का क्षरण: सोशल मीडिया ने बदल दी जीवन की दिशा

एक समय था जब समाज में संस्कार, मर्यादा और परंपराएं जीवन का आधार होती थीं। लेकिन आज सोशल मीडिया के प्रभाव ने इन मूल्यों को पीछे धकेल दिया है। दिखावे की संस्कृति ने सादगी और संयम को कमजोर कर दिया है। अब युवा असली जीवन से ज्यादा आभासी दुनिया में जीने लगे हैं, जिससे संस्कार और संस्कृति धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है।

नशे के पीछे छिपे कारण: बेरोजगारी, अकेलापन और समाज की चुप्पी

इस समस्या के पीछे कई गहरे कारण हैं, बेरोजगारी, परिवार का टूटता संवाद, शिक्षा में नैतिक मूल्यों की कमी और समाज की अनदेखी। जब युवा के पास कोई स्पष्ट लक्ष्य नहीं होता, तो वह गलत रास्तों की ओर आकर्षित हो जाता है। वहीं परिवार और समाज की चुप्पी इस समस्या को और बढ़ावा देती है।

समाधान की राह: जागरूकता, सख्ती और सामूहिक जिम्मेदारी जरूरी

इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए शासन, प्रशासन, परिवार और समाज सभी को मिलकर काम करना होगा। अवैध शराब पर सख्त कार्रवाई, नाबालिगों को नशे से दूर रखने के उपाय, डिजिटल जागरूकता अभियान और शिक्षा में नैतिक मूल्यों को शामिल करना जरूरी है। परिवार को भी बच्चों के साथ समय बिताना होगा और समाज को जागरूक होकर गलत गतिविधियों का विरोध करना होगा।

सवाल: क्या हम अपने ही बच्चों को खोते हुए देख रहे हैं?

यह लेख केवल एक मुद्दा नहीं उठाता, बल्कि हर उस व्यक्ति से सवाल करता है जो इस समाज का हिस्सा है। क्या हम अपने बच्चों को सही दिशा दे रहे हैं? क्या हम उनकी जरूरत और जिद में फर्क समझ पा रहे हैं? या हम भी अनजाने में उन्हें उस रास्ते पर धकेल रहे हैं, जहां से लौटना मुश्किल हो जाता है?क्या हम उन्हें एक बेहतर भविष्य दे पा रहे हैं? या हम भी इस समस्या का हिस्सा बन चुके हैं?

यदि आज हमने इस पर ध्यान नहीं दिया, तो आने वाला समय और भी गंभीर हो सकता है। लेकिन अगर हम अभी जाग जाएं, तो बदलाव संभव है।आज जरूरत है जागने की, सोचने की और कदम उठाने की—क्योंकि अगर अब नहीं संभले, तो आने वाला समय और भी खतरनाक हो सकता है।

प्रदीप मिश्रा

निष्पक्ष • निर्भीक • जनहित के लिए समर्पित अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ 

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