योजनाओ की भीड़ में खोता नागरिक, सुविधा मिली या भविष्य गिरवी? विश्व गुरु की राह या मुफ्तखोरी का जाल?
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संपादकीय
अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ साप्ताहिक विशेषांक
✍️ ‘कलम की धार’ ✍️
By ACGN 7647981711, 9303948009
जनहित, तथ्य और साहस का साप्ताहिक मंच-जहाँ सच कहा जाता है, सवाल पूछे जाते हैं, और कीमत जानकर भी कलम नहीं रुकती।
‘कलम की धार’ कोई औपचारिक कॉलम नहीं, बल्कि व्यवस्था के मौन को तोड़ने वाली आवाज़ है। यह उन सवालों की चोट है, जिन्हें फाइलों में दबा दिया जाता है;
उन सच्चाइयों का आईना है, जिन्हें विकास की चमक में छुपा दिया जाता है।
यह सत्ता से टकराव नहीं, पर चुप्पी से समझौता भी नहीं करता, यह आम आदमी की थकान, आक्रोश और अधूरी उम्मीदों को शब्द देता है,
ताकि शासन पढ़े, प्रशासन देखे और व्यवस्था अपने ही आईने से नज़र न चुराए।
आज का विषय – भाषणों से आत्मनिर्भरता नहीं आती—जब योजनाओं की चमक के पीछे छिपी सच्चाई से आम आदमी का जीवन टकराता है
लेखक : प्रदीप मिश्रा
देश में आत्मनिर्भरता और विश्वगुरु बनने के नारों के बीच जब ज़मीनी हकीकत सवाल खड़े करती है, तब पत्रकारिता का दायित्व और भी बढ़ जाता है। इस सप्ताह “कलम की धार” में एक बार फिर योजनाओं, मुफ्तखोरी की राजनीति, करदाता के बोझ और प्रशासनिक पारदर्शिता पर तीखा लेकिन तथ्याधारित विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं। यह लेख किसी विचारधारा का विरोध नहीं, बल्कि व्यवस्था के आईने में सच दिखाने का प्रयास है ताकि विकास के दावों और आम नागरिक के जीवन के बीच की दूरी को समझा जा सके।
देश के मंचों से एक स्वर बार-बार गूंजता है भारत विश्व गुरु बनेगा, आत्मनिर्भर बनेगा, महाशक्ति बनेगा। सभाओं में तालियां बजती हैं, सोशल मीडिया पर नारे ट्रेंड करते हैं, योजनाओं की सूची पढ़ी जाती है। पर ज़रा ठहरकर एक साधारण नागरिक से पूछिए क्या उसके जीवन में स्थायी बदलाव आया है? क्या उसकी आय बढ़ी? क्या उसके बच्चों की शिक्षा की गुणवत्ता सुधरी? क्या इलाज सुलभ और सम्मानजनक हुआ? जवाब अक्सर उलझा हुआ मिलता है। मुद्दा योजनाओं का विरोध नहीं है। मुद्दा यह है कि योजनाएँ किसलिए हैं, कैसे लागू हो रही हैं, उनका लाभ किसे मिल रहा है, और उनकी असली कीमत कौन चुका रहा है।
हाल ही में Supreme Court of India ने मुफ्त योजनाओं पर गंभीर टिप्पणी की। अदालत ने स्पष्ट कहा कि राज्य पहले से वित्तीय दबाव में हैं, फिर भी मुफ्त बांटने की होड़ लगी है। “पैसा आएगा कहाँ से?” यह सवाल अदालत ने उठाया। विशेष रूप से Tamil Nadu Electricity Distribution Corporation से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान बिना आर्थिक स्थिति देखे मुफ्त बिजली देने के वादों पर भी प्रश्नचिह्न लगा। यह प्रश्न केवल अदालत का नहीं हर करदाता का है।
मुफ्त राशन: राहत या घुमावदार कारोबार?
पूर्व में हमारे देश कोरोना काल में मुफ्त राशन ने करोड़ों परिवारों का चूल्हा जलाए रखा। इसमें कोई संशय नहीं यह आम जन के हित में उठाया गया अच्छा कदम था, सरकार किसानों से ऊंचे दाम पर धान खरीदती है, उस पर मिलिंग, भंडारण, परिवहन का खर्च जोड़ती है और फिर लगभग 60 रुपये किलो लागत वाला चावल मुफ्त या बेहद कम कीमत पर देती है। गरीब परिवार के लिए यह बड़ी राहत है।
पर ज़मीनी सच्चाई भी उतनी ही कठोर है। कई क्षेत्रों में यही चावल उपभोक्ताओ द्वारा 20–25 रुपये किलो में व्यापारी को बेच दिया जाता है। व्यापारी उसे साफ कर, पैक कर, खुशबू डालकर 60–70 रुपये किलो में बेचता है। सरकार खर्च करती है, गरीब मजबूरी में बेचता है, और बीच का तंत्र लाभ कमाता है।
सवाल: क्या यह व्यवस्था गरीबी कम कर रही है, या एक समानांतर कारोबार खड़ा कर रही है?
बीपीएल कार्ड: सहारा या पहचान की राजनीति?
हमारे देश में लोगो उचित दर पर राशन उपलब्ध करने के लिए शाश्कीय उचित मूल्य की दुकानों की व्यवस्था है पर उसमे भी आज दो भागो में बात दिया गया है APL और BPL ए पी एल कार्ड सामान्य माध्यम वर्ग के लिए जिसमे 10 रू प्रति किलो के दर से सिर्फ चावल दिया जाता है दूसरा बी पी एल इस कार्ड का उद्देश्य था गरीबी रेखा में जीवन यापन करने वालो को सस्ते दर में राशन उपलब्ध करना जिसमे चावल, गेहूं,चना,शक्कर,नमक,मिटटी का तेल उचित दर पर उपलब्ध कराना आज इसमें चावल मुफ्त में दिया जा रहा है इसमें और भी काफी कुछ जोड़ दिया गया ताकि बी पी एल कार्ड धारी को गरीबी की श्रेणी में पहचान मिल सके जिससे सबसे गरीब तक योजनाओं का लाभ पहुंचे। राशन, स्वास्थ्य, छात्रवृत्ति, आवास सब कुछ इससे जुड़ गया। पर जैसे ही इस कार्ड से अनेक लाभ जुड़े, “गरीब बनने” की दौड़ शुरू हो गई। स्थानीय जनप्रतिनिधि यो दवार वोट के लालच में अपात्र लोगो को भी इस सुविधा का लाभ दिलाया जाने लगा , कई जगह कार्ड बनाने के नाम पर हजारों रुपये लिए जाते हैं। असली जरूरतमंद लाइन में रह जाता है, और जुगाड़ जानने वाला लाभ उठा लेता है।
सवाल: क्या हम गरीबी हटा रहे हैं, या गरीबों की संख्या बढ़ा रहे हैं? गरीबी कार्ड से दूर होगी या रोजगार से ?
आयुष्मान योजना: कार्ड है, पर इलाज?
Ayushman Bharat ( PMJAY) का उद्देश्य था—गरीब और कमजोर परिवार को 5 लाख तक का मुफ्त इलाज उपलब्ध करना ताकि गंभीर बीमारी आर्थिक तबाही का कारण ना बन सके।इसके जरिये सरकारी व सूचीबद्ध निजी अस्पतालों लोगो को मुफ्त इलाज मिल सके, इससे कई लोगों को लाभ मिला, यह स्वीकार करना होगा।
पर कई जगह लाभार्थियों को पूरा फायदा नहीं मिल पाता जब गंभीर बीमारी लेकर अस्पताल पहुंचते हैं, तो सुनने को मिलता है—“यह जांच पैकेज में नहीं”, “यह बीमारी सूची में नहीं”, “पहले टेस्ट अपने पैसे से कराइए।” शासकीय अस्पतालों में विशेश्गा डाक्टर,उपकरण,दवाइयों और बीएड की कमी, जाँच की मशीने या तो उपलब्ध नहीं या ख़राब पड़ी है मरीजो को कई बार दवा बाहर से खरीदनी पड़ती है जाँच भी बाहर करना पड़ता है भुगतान में देरी की वजह से कुछ निजी अस्पताल में सिमित सेवाए देते है और काफी अस्पतालों में सुविधा ही बंद हो गई है कागजी प्रक्रिया इतनी जटिल होती है शासकीय अस्पतालों में लापरवाही और प्रक्रियाओ के कारण ग्रामीण व्यक्ति घबरा जाता है। अंततः वह उधार लेता है।और आर्थिक बोझ तले दबता जाता है योजना का उद्देश्य सराहनीय है ,लेकिन जब तक शासकीय अस्पतालों में संसाधन ,स्टाफ,और व्यवस्थाये मजबूत नहीं होंगी तब तक इसका लाभ कागजो से आगे बढ़कर हर जरुरत मंद तक पूरी तरह नहीं पहुच पायेगा
सवाल: क्या कार्ड हाथ में होने से इलाज की गारंटी मिल जाती है?
आंगनवाड़ी और पोषण: भविष्य की नींव या कागजी उपस्थिति?
आंगनबाड़ी केंद्र देश में मातृ एवं शिशु कल्याण की आधारशिला हैं। यह व्यवस्था समेकित बाल विकास सेवा कार्यक्रम के अंतर्गत संचालित होती है। इसका मुख्य उद्देश्य है 0 से 6 वर्ष तक के बच्चों का पोषण और समुचित विकास, गर्भवती और धात्री माताओं की देखभाल,कुपोषण की रोकथाम, प्रारंभिक बाल शिक्षा की व्यवस्था, टीकाकरण और स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता बढ़ाना, आंगनबाड़ी का लक्ष्य केवल भोजन देना नहीं, बल्कि स्वस्थ और शिक्षित पीढ़ी तैयार करना है।प्रमुख योजनाएँ और सेवाएँ : पूरक पोषण आहार वितरण, घर ले जाने योग्य राशन, तीन से छह वर्ष के बच्चों के लिए प्रारंभिक शिक्षा गतिविधियाँ, गर्भवती महिलाओं की नियमित जांच और परामर्श, बच्चों का वजन और स्वास्थ्य निगरानी, टीकाकरण अभियान में सहयोग, पोषण और स्वच्छता के प्रति जागरूकता कार्यक्रम
जमीनी हकीकत
कई केंद्रों में पक्के भवन, शौचालय, पेयजल और बैठने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। पोषण सामग्री समय पर और पूरी मात्रा में नहीं दी जाती । कार्यकर्ताओं पर अतिरिक्त शासकीय कार्यों का दबाव रहता है। बच्चों की नियमित उपस्थिति नहीं बन पाती। उपस्थिति रजिस्टर भरे जाते हैं, पर बच्चे घर पर रहते हैं। कई स्थानों पर केवल कागजी कार्यवाही अधिक और वास्तविक गतिविधियाँ सीमित रहती हैं।आगनबाडी के कार्यकर्त्ता और सहायिका भारती प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी पक्षपात और निष्पक्षता की शिकायते भी आये दिन मिलती रहती हैं ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में गुणवत्ता का अंतर स्पष्ट दिखाई देता है। हालांकि कुछ स्थानों पर निगरानी व्यवस्था और पोषण अभियानों के माध्यम से सुधार के प्रयास भी किए जा रहे हैं।सरकार बच्चों और गर्भवती महिलाओं के लिए आंगनवाड़ी और पोषण योजनाएं चलाती है। उद्देश्य नेक है—कुपोषण खत्म हो, स्वस्थ पीढ़ी बने।यदि बुनियादी सुविधाएँ सुदृढ़ हों, पोषण सामग्री की गुणवत्ता सुनिश्चित हो और कार्यकर्ताओं को पर्याप्त सहयोग मिले, तो आंगनबाड़ी वास्तव में कुपोषण और अशिक्षा के खिलाफ एक प्रभावी माध्यम बन सकती है। आंगनबाड़ी केंद्र देश के भविष्य की नींव हैं। यदि प्रारंभिक अवस्था में ही बच्चों को सही पोषण, शिक्षा और स्वास्थ्य देखभाल मिले, तो समाज की दिशा बदल सकती है। उद्देश्य स्पष्ट और आवश्यक है, परंतु संसाधनों की कमी, निगरानी की कमजोरी और व्यवस्थागत बाधाओं के कारण अपेक्षित परिणाम हर जगह नहीं मिल पा रहे।
सरकार बच्चों और गर्भवती महिलाओं के लिए आंगनवाड़ी और पोषण योजनाएं चलाती है। उद्देश्य नेक है कुपोषण खत्म हो, स्वस्थ पीढ़ी बने।यदि बुनियादी सुविधाएँ सुदृढ़ हों, पोषण सामग्री की गुणवत्ता सुनिश्चित हो और कार्यकर्ताओं को पर्याप्त सहयोग मिले, तो आंगनबाड़ी वास्तव में कुपोषण और अशिक्षा के खिलाफ एक प्रभावी माध्यम बन सकती है।
सवाल: क्या भविष्य की नींव कागजों पर रखी जा सकती है?
मध्यान्ह भोजन: पेट भरा, पर क्या शिक्षा मजबूत?
मध्यान्ह भोजन योजना का उद्देश्य विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना, कुपोषण कम करना और स्कूलों में नामांकन व उपस्थिति बढ़ाना है। इसका लक्ष्य यह भी है कि भूखे पेट पढ़ाई की बाधा दूर हो और गरीब परिवारों के बच्चों को शिक्षा से जोड़े रखा जाए। योजना से लाखों बच्चों को प्रतिदिन भोजन मिल रहा है और कई क्षेत्रों में नामांकन बढ़ा है। फिर भी कुछ स्थानों पर भोजन की गुणवत्ता, स्वच्छता और पोषण स्तर को लेकर शिकायतें सामने आती हैं। रसोईघर, भंडारण और साफ पानी की व्यवस्था कई विद्यालयों में पर्याप्त नहीं है। कभी-कभी खाद्यान्न आपूर्ति में देरी भी होती है। मध्यान्ह भोजन योजना बच्चों के स्वास्थ्य और शिक्षा से जुड़ी महत्वपूर्ण पहल है। इसका उद्देश्य सकारात्मक है, परंतु गुणवत्ता, निगरानी और बुनियादी सुविधाओं में सुधार आवश्यक है, ताकि यह योजना केवल पेट भरने तक सीमित न रहकर बच्चों के समग्र विकास में सहायक बन सके। स्कूलों में मध्यान्ह भोजन से नामांकन बढ़ा। भूखे पेट पढ़ाई कठिन है—यह सत्य है। पर क्या केवल भोजन से शिक्षा का स्तर सुधरेगा? क्या प्रयोगशालाएं, प्रशिक्षित शिक्षक, डिजिटल सुविधा, कौशल शिक्षा उसी गंभीरता से मिल रही है?
सवाल: क्या हम बच्चों को पढ़ा रहे हैं या केवल उनका पेट भर रहे हैं?
महिलाओं के खाते में नकद सहायता: सशक्तिकरण या अस्थायी सहारा?
महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए विभिन्न राज्यों में “महिला बंधन” जैसी योजनाओं के तहत महिलाओं के बैंक खातों में प्रतिमाह निश्चित राशि हस्तांतरित की जाती है। इसका मुख्य उद्देश्य है महिलाओं को आर्थिक सहारा देना, परिवार के दैनिक खर्च में सहयोग, महिला के हाथ में सीधा पैसा देकर निर्णय क्षमता बढ़ाना, गरीबी और आर्थिक निर्भरता कम करना है
वर्तमान स्थिति में इस योजना से कई महिलाओं को प्रत्यक्ष लाभ मिल रहा है और घरेलू खर्च में सहायता हो रही है। बैंक खाते और आधार आधारित व्यवस्था से पारदर्शिता बढ़ी है।परंतु कई स्थानों पर पात्रता विवाद, सूची में नाम जुड़ने-कटने की समस्या और तकनीकी अड़चनें सामने आती हैं। यह राशि अक्सर केवल दैनिक उपभोग में खर्च हो जाती है, दीर्घकालिक आय सृजन से नहीं जुड़ पाती।
संभावित सामाजिक नुकसान या चुनौतियाँ : यदि योजना को कौशल, स्वरोजगार या आय सृजन से नहीं जोड़ा गया, तो यह स्थायी आत्मनिर्भरता नहीं दे पाती। कुछ मामलों में काम करने की प्रेरणा कम होने की आशंका जताई जाती है।परिवार में आर्थिक जिम्मेदारी को लेकर विवाद भी उत्पन्न हो सकते हैं। सरकार पर वित्तीय बोझ बढ़ता है, जिसका असर अन्य विकास कार्यों पर पड़ सकता है।यदि यह राशि केवल रोजमर्रा की जरूरत में समाप्त हो जाए और उसके साथ कौशल, स्वरोजगार, सूक्ष्म उद्यम की योजना न जुड़ी हो, तो क्या यह स्थायी सशक्तिकरण है? महिलाओं को आर्थिक सहायता देना सकारात्मक और आवश्यक कदम है, परंतु केवल नकद हस्तांतरण से स्थायी सशक्तिकरण संभव नहीं। यदि इसे कौशल विकास, लघु उद्योग, स्वयं सहायता समूह और रोजगार से जोड़ा जाए, तो यह योजना समाज में वास्तविक बदलाव ला सकती है।
सवाल: क्या यह आर्थिक स्वतंत्रता है या चुनावी भरोसा?
प्रधानमंत्री आवास योजना: घर या कर्ज?
प्रधानमंत्री आवास योजना का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर और गरीब परिवारों को पक्का घर उपलब्ध कराना है। इस योजना से मुख्य रूप से ग्रामीण और शहरी गरीबों को आवास निर्माण के लिए आर्थिक सहायता मिली किश्तों में राशि सीधे बैंक खाते में हस्तांतरण हुई , शौचालय, बिजली, पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं को जोड़ने का प्रयास किया गया , कच्चे घर से पक्के घर की ओर बदलाव हुए , इस योजना से लाखों परिवारों को छत मिली है और जीवन स्तर में सुधार हुआ है।
जमीनी हकीकत : कई स्थानों पर लाभार्थियों को पूरी राशि समय पर नहीं मिलती। निर्माण सामग्री की बढ़ती कीमतों के कारण स्वीकृत राशि से घर पूरा बनाना कठिन हो जाता है। तकनीकी स्वीकृति और निरीक्षण प्रक्रिया में देरी होती है।
कई गरीब परिवारों को किश्त आने तक उधार लेकर निर्माण शुरू करना पड़ता है। बिचौलियों की भूमिका की भूमिका बढ़ी , कुछ क्षेत्रों में बिचौलिए लाभार्थियों से “काम करवाने” या “नाम जोड़ने” के नाम पर कमीशन लेते हैं। हितग्राहियों के एटीएम कार्ड या बैंक पासबुक अपने पास रखकर राशि का हिस्सा निकाल लेने की शिकायतें भी सामने आती हैं। 1 लाख की सहायता में 20 से 50 हजार तक अवैध वसूली की चर्चा आम है।
इससे गरीब परिवार कर्ज में फँस जाता है और घर अधूरा रह जाता है।
प्रधानमंत्री आवास योजना का उद्देश्य सराहनीय है और इससे लाखों लोगों को लाभ मिला है। परंतु यदि पारदर्शिता, निगरानी और स्थानीय स्तर पर सख्त कार्रवाई नहीं होगी, तो बिचौलियों के कारण गरीबों का शोषण जारी रहेगा। योजना की सफलता केवल स्वीकृति पत्र से नहीं, बल्कि ईमानदारी से पूर्ण बने घर से मापी जानी चाहिए।
सवाल: क्या घर मिला, या एक नया कर्ज?
जल जीवन मिशन: टंकी बनी, पर पानी?
जल जीवन मिशन का लक्ष्य हर ग्रामीण घर तक नल के माध्यम से स्वच्छ पेयजल पहुँचाना है, ताकि महिलाओं को दूर से पानी न लाना पड़े और गांवों में स्वास्थ्य स्थिति सुधरे।
जमीनी हकीकत : कई गांवों में पानी की टंकियां बन गईं, पाइपलाइन बिछा दी गई, उद्घाटन भी हो गया, लेकिन नलों में पानी नहीं आ रहा। पाइपलाइन बिछाने के नाम पर सड़कों को उखाड़ दिया गया, पर मरम्मत अधूरी है। करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद नियमित जल आपूर्ति दिखाई नहीं दे रही। कारण हैं कि ठेके राजनैतिक प्रभाव वाले लोगों को दिए गए, काम अधूरा या घटिया हुआ। अधिकारी राजनीतिक दबाव के कारण ठोस कार्रवाई नहीं कर पा रहे। जल जीवन मिशन का उद्देश्य सराहनीय है, पर यदि टंकियां खड़ी रहें और नल सूखे रहें तो योजना का लाभ कागजों तक सीमित रह जाता है। पारदर्शिता, गुणवत्ता नियंत्रण और जवाबदेही के बिना खर्च किया गया धन गांवों की प्यास नहीं बुझा सकता।
सवाल: क्या ढांचा ही उपलब्धि है, या पानी का बहना?
योजनाओ के लिए पैसा आता कहां से है?
शासन की मुफ्त या सहायता आधारित योजनाओं का पैसा सरकार अपने निजी स्रोत से नहीं देती। यह धन मुख्य रूप से इन माध्यमों से आता है कर (टैक्स): वस्तु एवं सेवा कर, आयकर, पेट्रोल-डीजल पर कर, बिजली बिल, संपत्ति कर आदि। यानी जो आम नागरिक और मध्यम वर्ग नियमित रूप से कर देता है, वही सरकारी योजनाओं का मुख्य स्रोत है। कर्ज (उधार): सरकारें बाजार से ऋण लेती हैं या बॉन्ड जारी करती हैं। इसका अर्थ है कि आज की योजना का बोझ आने वाली पीढ़ियों पर भी पड़ सकता है। उपकर और शुल्क: विभिन्न सेवाओं पर लगाए गए अतिरिक्त शुल्क भी राजस्व का हिस्सा होते हैं। सार्वजनिक उपक्रमों से आय:
सरकारी कंपनियों के लाभांश या विनिवेश से प्राप्त धन।
दुरुपयोग कैसे होता है?
योजनाएँ जनहित में बनती हैं, लेकिन क्रियान्वयन में कई स्तरों पर गड़बड़ियाँ देखने को मिलती हैं सरकार का राजस्व टैक्स से आता है जीएसटी, पेट्रोल, बिजली बिल, आयकर। मध्यम वर्ग न बीपीएल है, न मुफ्त राशन पाता है। वही टैक्स देता है और चुप रहता है।
पैसा जनता का है। सत्ता केवल संरक्षक है, मालिक नहीं।
यदि पारदर्शिता, सामाजिक निगरानी और कठोर जवाबदेही सुनिश्चित हो, तो वही धन वास्तविक विकास की नींव बन सकता है अन्यथा वह केवल घोषणा और प्रचार तक सीमित रह जाएगा।
सवाल: क्या करदाता के पैसे का उपयोग पूरी पारदर्शिता से हो रहा है?
प्रचार, फोटो और राजनीति और राजस्व
शासन द्वारा योजनाओ से अधिक उसका विज्ञापन, होर्डिंग, समारोह और छवि निर्माण पर पैसा खर्च हो जाता है।सरकार बदलते ही पुनः ब्रांडिंग: केवल नाम या फोटो बदलने में करोड़ों खर्च, जबकि योजना की मूल संरचना वही रहती है। योजनाओं के नाम पर प्रचार में करोड़ों खर्च होते हैं। राशन कार्ड बदला तो फोटो बदली, पोस्टर बदले, विज्ञापन छपे। नेताओं के दौरे, सुरक्षा, काफिले प्रतिदिन लाखों का खर्च।पूर्व और वर्तमान जनप्रतिनिधियों की पेंशन, मानदेय और सुविधाएं अलग। आम आदमी जब अपने काम से जाता है तो “चमचों” के जरिए वसूली की शिकायतें सुनता है।
राजनैतिक लोगो द्वारा लाभार्थी चयन में पक्षपात: योजनाओ का राजनीतिक प्रभाव वाले लोगों को प्राथमिकता, जबकि वास्तविक जरूरतमंद पीछे रह जाते हैं। बिचौलियों का हस्तक्षेप: “नाम जोड़ने”, “फाइल पास कराने” या “किश्त दिलाने” के नाम पर अवैध वसूली। घटिया कार्य और कमीशन प्रथा: निर्माण या आपूर्ति कार्यों में लागत कम दिखाकर गुणवत्ता घटा दी जाती है, और बीच में कमीशन का खेल चलता है।
सरकार बदलते ही पुनः ब्रांडिंग: केवल नाम या फोटो बदलने में करोड़ों खर्च, जबकि योजना की मूल संरचना वही रहती है।
सवाल: क्या राजनीति सेवा है या कमाई का जरिया?
अर्थव्यवस्था और राजस्व, शराब और नशा मुक्ति सामाजिक प्रभाव
छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में शराब से मिलने वाला आबकारी राजस्व सरकार की आय का बड़ा हिस्सा होता है। पर इसके साथ सामाजिक दुष्परिणाम भी जुड़े हैं परिवार की आय का बड़ा हिस्सा नशे में खर्च होना
घरेलू हिंसा और विवाद में वृद्धि, स्वास्थ्य समस्याएँ और इलाज का बढ़ता खर्च, सड़क दुर्घटनाएँ, युवाओं में लत की बढ़ती प्रवृत्ति यदि युवा पीढ़ी तेजी से नशे की ओर बढ़ती है, तो शिक्षा, रोजगार, उत्पादकता और सामाजिक और पारिवारिक संतुलन सभी प्रभावित होते हैं।
नीति और व्यवहार में विरोधाभास?
जब एक ओर सरकार नशामुक्ति के बड़े-बड़े पोस्टर लगाती है, बहनों के नाम पर अभियान चलाती है, और दूसरी ओर ड्राई डे घटाती है तथा शराब बिक्री से राजस्व बढ़ाने पर जोर देती हैतो यह स्वाभाविक प्रश्न उठता है: क्या यह सामाजिक सुधार की नीति है या राजस्व बढ़ाने की रणनीति?, क्या नशामुक्ति केवल प्रचार तक सीमित है?, क्या आर्थिक लाभ सामाजिक हानि से बड़ा माना जा रहा है?, क्या युवाओं के भविष्य से अधिक महत्व तात्कालिक आय को दिया जा रहा है?
पैसा जनता का है चाहे वह योजनाओं में लगे या शराब से राजस्व के रूप में आए। सरकार की जिम्मेदारी है कि वह आर्थिक आवश्यकताओं और सामाजिक दायित्व के बीच संतुलन बनाए। यदि नशामुक्ति के नारे और नीतियाँ एक दिशा में हों, तभी विश्वास बनेगा।
अन्यथा जनता के मन में यह प्रश्न उठता रहेगा नीति में गंभीरता है, या केवल घोषणा और प्रचार?कई राज्यों की आय का बड़ा हिस्सा शराब से आता है। राजस्व बढ़ाने के लिए नीतियां ढीली होती हैं। ड्राई डे कम किए जाते हैं। पर शराब से सामाजिक और स्वास्थ्य समस्याएं भी बढ़ती हैं।
सवाल: क्या यह स्थायी आर्थिक मॉडल है?
देश में अनेक योजनाएँ बड़े उद्देश्य और आकर्षक घोषणाओं के साथ शुरू होती हैं। कागज़ों पर लक्ष्य पूरे दिखते हैं, रिपोर्टों में प्रगति संतोषजनक बताई जाती है, उद्घाटन और शिलान्यास के फोटो प्रचारित होते हैं—पर कई स्थानों पर धरातल की तस्वीर अलग नजर आती है। ग्रामीण क्षेत्रों में अधूरे भवन, बंद पड़ी सुविधाएँ, सूखी टंकियाँ, अधूरी सड़कें और लाभार्थियों की लंबी प्रतीक्षा यह संकेत देती है कि योजना की मंशा और क्रियान्वयन के बीच दूरी अभी भी बनी हुई है।
सबसे गंभीर चिंता यह है कि अनेक योजनाओं में कहीं न कहीं बिचौलियों की भूमिका सामने आती है। राजनीतिक संरक्षण प्राप्त कुछ लोग लाभार्थी चयन, स्वीकृति, भुगतान या सामग्री आपूर्ति की प्रक्रिया में हस्तक्षेप कर आर्थिक लाभ उठाते हैं। गरीब और जरूरतमंद व्यक्ति, जिसे सीधा लाभ मिलना चाहिए, वही सबसे अधिक चक्कर काटता है।
जनता हर चुनाव में विकास और बदलाव की उम्मीद से मतदान करती है। वह आशा करती है कि घोषित योजनाएँ उसके जीवन में वास्तविक सुधार लाएँगी। पर जब लाभ बीच रास्ते में ही रुक जाए, तो भरोसा कमजोर होने लगता है।
योजनाएँ बुरी नहीं होतीं उनका उद्देश्य प्रायः जनहित में ही होता है। समस्या तब पैदा होती है जब पारदर्शिता, निगरानी और जवाबदेही कमजोर पड़ जाती है। यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक ईमानदारी और सामाजिक निगरानी मजबूत हो, तो यही योजनाएँ कागज़ से निकलकर वास्तव में जनता के जीवन को बदल सकती हैं।
असली सवाल: ये योजनाएं बनी किसके लिए?
जनता के लिए? वोट के लिए? या बिचौलियों के लिए? जब लाभ का हिस्सा रास्ते में ही गायब हो जाए, तो जिम्मेदार कौन?
सहायता आवश्यक है, पर स्थायी सहारा नहीं हो सकती। मुफ्त की आदत बढ़ेगी तो श्रम की कीमत घटेगी। आत्मनिर्भरता भाषण से नहीं—रोजगार, उद्योग, कौशल और ईमानदार प्रशासन से आती है।
मुफ्त योजनाएँ पूरी तरह गलत नहीं हैं आपदा, गरीबी या विशेष परिस्थितियों में सहायता आवश्यक होती है। परंतु यदि राजस्व का बड़ा हिस्सा स्थायी विकास (रोजगार, उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य ढांचा) के बजाय अल्पकालिक लाभ और राजनीतिक छवि निर्माण में खर्च हो, तो अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ता है। जब करदाता का पैसा पारदर्शिता से खर्च नहीं होता, तो विश्वास कमजोर होता है। और जब योजनाएँ आत्मनिर्भरता के बजाय निर्भरता बढ़ाने लगें, तब विमर्श आवश्यक हो जाता है।
समाधान: दिशा बदलने का समय
हर योजना का खर्च और स्रोत सार्वजनिक पोर्टल पर अनिवार्य हो • सामाजिक ऑडिट और स्वतंत्र मूल्यांकन अनिवार्य हो • लाभार्थी चयन डिजिटल सत्यापन आधारित हो • बिचौलियों पर त्वरित कानूनी कार्रवाई हो • योजनाओं को कौशल और रोजगार से जोड़ा जाए • प्रचार खर्च की सीमा तय हो • नेताओं के वेतन-पेंशन की स्वतंत्र समीक्षा हो • शिक्षा और स्वास्थ्य ढांचे पर प्राथमिक निवेश • संसद और विधानसभाओं में मुफ्त योजनाओं पर विस्तृत वित्तीय बहस हो • करदाता के पैसे की वार्षिक सार्वजनिक रिपोर्ट जारी हो • श्रम संस्कृति और कर्तव्य बोध का राष्ट्रीय अभियान चलाया जाए
सवाल पूछना देश विरोध नहीं है। सच लिखना विद्रोह नहीं है। “कलम की धार” किसी का विरोध नहीं करता सिर्फ सच्चाई सामने रखता है ताकि शासन जागे।
विश्व गुरु बनने का सपना तभी साकार होगा जब योजनाएं वोट नहीं, भविष्य बनाएंगी। जब मुफ्त की जगह अवसर मिलेंगे। जब करदाता का पैसा ईमानदारी से खर्च होगा। जब सहायता के साथ आत्मनिर्भरता की राह खुलेगी। भारत को विश्व गुरु बनना है तो पहले उसे अपने गांव, अपने शहर, अपने स्कूल, अपने अस्पताल, अपनी व्यवस्था को ईमानदार बनाना होगा। तभी नारा नहीं, वास्तविकता बदलेगी।
जरा विचार करे
अंग्रेजों की पराधीनता, मुगलों की पराधीनता… और अब?
हमने इतिहास में विदेशी शासन झेला पहले मुगलों की सत्ता, फिर British East India Company और अंततः United Kingdom के अधीन ब्रिटिश राज। उस दौर में हमारी भूमि पर उनका शासन था, आज हम स्वतंत्र है हमारी भूमि पर हमारा शासन है। लेकिन प्रश्न यह है क्या मानसिक और आर्थिक स्वतंत्रता भी उतनी ही मजबूत है?
जब सरकारें “मुफ्त” योजनाओं की झड़ी लगाती हैं, तो क्या वह सशक्तिकरण है या निर्भरता का बीजारोपण? क्या अधिकार और आत्मनिर्भरता के बीच की रेखा धुंधली नहीं हो रही?
इतिहास में पराधीनता बाहरी थी, आज कहीं पराधीनता अंदरूनी तो नहीं बन रही जहाँ नागरिक परिश्रम से अधिक योजनाओं पर आश्रित हो जाए?
राष्ट्र निर्माण केवल सहायता से नहीं, बल्कि स्वाभिमान, श्रम और आत्मनिर्भरता से होता है।
यह प्रश्न किसी सरकार या दल के विरोध में नहीं, बल्कि समाज के आत्ममंथन के लिए है कि कहीं हम स्वतंत्र होकर भी निर्भरता की नई जंजीरों में तो नहीं जकड़ रहे?
यह लेख किसी दल या सरकार के विरोध में नहीं, बल्कि जनहित में लाभ-हानि के संतुलित विश्लेषण का प्रयास है
कलम की धार।”
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