31 अक्टूबर: सरदार पटेल की जयंती, इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि और लोकतांत्रिक मर्यादा का संदेश।
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राष्ट्रीय एकता दिवस पर विशेष लेख
By ACGN – 7647981711, 9303948009
संवाददाता :- प्रदीप मिश्रा
महापुरुषों पर राजनीति क्यों? सत्ता आती-जाती है, देश और लोकतंत्र हमेशा रहना चाहिए!
इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि और सरदार पटेल की जयंती पर देश के सामने बड़ा सवाल – क्या राजनीतिक दलों से ऊपर उठकर हम अपनी आने वाली पीढ़ी को सभी राष्ट्रनिर्माताओं के योगदान से परिचित करा पा रहे हैं? राष्ट्रीय एकता केवल आयोजन और नारों से नहीं, बल्कि आपसी सम्मान, विचारों की स्वीकार्यता और एकजुटता से मजबूत होगी।
ACGN:- 31 अक्टूबर भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण दिन है। इस दिन भारत के लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती और देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि मनाई जाती है। दोनों नेताओं ने अपने-अपने समय में देश के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया, जिसे भारतीय इतिहास से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
एक ओर कांग्रेस नेता राहुल गांधी और अन्य नेताओं ने शक्ति स्थल पहुंचकर इंदिरा गांधी को श्रद्धांजलि दी, वहीं दूसरी ओर भाजपा और केंद्र सरकार राष्ट्रीय एकता दिवस के अवसर पर सरदार वल्लभभाई पटेल को याद करते हुए एकता परेड सहित विभिन्न कार्यक्रम आयोजित कर रही है।
दोनों आयोजनों का अपना ऐतिहासिक महत्व है, लेकिन इसी बीच एक बड़ा सवाल भी सामने आता है। क्या एक ही दिन देश के दो महत्वपूर्ण ऐतिहासिक व्यक्तित्वों को एक साथ सम्मानपूर्वक याद नहीं किया जा सकता? क्या किसी एक नेता को सम्मान देने के लिए दूसरे नेता को भुलाना जरूरी है?
आज कई जगह देखने को मिलता है कि कहीं केवल सरदार पटेल की तस्वीर लगाकर उन्हें याद किया जा रहा है, तो कहीं केवल इंदिरा गांधी की तस्वीर के साथ उनकी पुण्यतिथि मनाई जा रही है। सवाल यह है कि क्या देश की ऐतिहासिक विरासत को राजनीतिक विचारधाराओं के आधार पर अलग-अलग खांचों में बांटना उचित है?
सरदार पटेल: अखंड भारत के शिल्पकार

31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नडियाद में जन्मे सरदार वल्लभभाई पटेल स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से एक थे। आजादी के बाद देश के पहले उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री के रूप में उन्होंने 560 से अधिक रियासतों के भारतीय संघ में एकीकरण में ऐतिहासिक भूमिका निभाई।
उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति, नेतृत्व क्षमता और दूरदर्शिता ने देश की एकता को मजबूत आधार दिया। इसी योगदान के कारण उन्हें लौह पुरुष के नाम से जाना जाता है। भारत की एकता और अखंडता के इतिहास में उनका योगदान सदैव याद किया जाएगा।
इंदिरा गांधी: देश की पहली महिला प्रधानमंत्री

19 नवंबर 1917 को जन्मीं इंदिरा गांधी भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री थीं। उनके कार्यकाल में बैंकों का राष्ट्रीयकरण, हरित क्रांति को प्रोत्साहन और 1971 के युद्ध के दौरान भारत का नेतृत्व जैसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम हुए। उनके नेतृत्व में बांग्लादेश के निर्माण में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
हालांकि, उनके कार्यकाल में वर्ष 1975 से 1977 तक लगाया गया आपातकाल भारतीय लोकतंत्र का एक विवादास्पद अध्याय भी रहा। इसलिए उनके राजनीतिक जीवन का मूल्यांकन करते समय उपलब्धियों के साथ विवादित निर्णयों की भी निष्पक्ष समीक्षा जरूरी है। 31 अक्टूबर 1984 को उनकी हत्या कर दी गई।
महापुरुषों को राजनीतिक दलों में क्यों बांटा जा रहा है?
आज कांग्रेस इंदिरा गांधी को याद कर रही है और भाजपा सरदार पटेल की जयंती मना रही है। लेकिन क्या सरदार पटेल केवल भाजपा के हैं और इंदिरा गांधी केवल कांग्रेस की?
बिल्कुल नहीं! दोनों पूरे देश की ऐतिहासिक धरोहर हैं। किसी नेता का योगदान केवल इसलिए छोटा नहीं हो जाता कि वह किसी दूसरी राजनीतिक विचारधारा या दल से जुड़ा रहा हो।
लोकतंत्र में राजनीतिक दलों के बीच विचारों का अंतर स्वाभाविक है। हर दल को अपने नेताओं के योगदान को याद करने और उनके विचारों को आगे बढ़ाने का अधिकार है। लेकिन देश के इतिहास और राष्ट्रनिर्माताओं को किसी एक राजनीतिक दल की संपत्ति मान लेना उचित नहीं होगा।
राजनीतिक दलों को एक-दूसरे के नेताओं की उपलब्धियों और ऐतिहासिक योगदान को भी स्वीकार करना चाहिए। इतिहास किसी पार्टी की निजी संपत्ति नहीं है, जिसे राजनीतिक सुविधा के अनुसार प्रस्तुत किया जाए।
स्कूलों में भव्य आयोजन क्यों नहीं? बच्चों को इतिहास से जोड़ना जरूरी
सबसे बड़ा सवाल देश के भविष्य यानी आज के बच्चों और युवाओं को लेकर है। क्या प्राथमिक कक्षाओं से लेकर 12वीं तक पढ़ने वाले विद्यार्थियों को वास्तव में मालूम है कि इंदिरा गांधी और सरदार वल्लभभाई पटेल ने देश के लिए क्या किया था?
क्या केवल पाठ्यपुस्तकों के कुछ अध्याय पढ़ लेना और मोबलपर जानकारी जुटा लेना, समाचारों में तस्वीरें देख लेना पर्याप्त है?
31 अक्टूबर को देश के सभी सरकारी और निजी स्कूलों में विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए। बच्चों को दोनों नेताओं के जीवन, संघर्ष, उपलब्धियों और ऐतिहासिक निर्णयों की जानकारी दी जानी चाहिए।
स्कूलों में भाषण, निबंध, चित्र प्रदर्शनी, प्रश्नोत्तरी, डॉक्यूमेंट्री और नाट्य मंचन जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं। बच्चों को नेताओं की उपलब्धियों के साथ उनके कार्यकाल के विवादित पहलुओं और लोकतांत्रिक मूल्यों की भी निष्पक्ष जानकारी दी जानी चाहिए।
आखिर यही बच्चे कल देश का नेतृत्व करेंगे। यदि उन्हें अपने राष्ट्रनिर्माताओं और ऐतिहासिक व्यक्तित्वों के योगदान की जानकारी ही नहीं होगी, तो वे देश के इतिहास, संघर्ष और विरासत को कैसे समझेंगे?
स्कूलों में केवल 15 मिनट का प्रयास, भविष्य पर डाल सकता है गहरा असर
इस दिशा में एक सरल और व्यावहारिक पहल की जा सकती है। विद्यालयों में पढ़ाई के के साथ साथ में देश के प्रमुख राष्ट्रीय महापुरुषों की जयंती और पुण्यतिथि पर कम से कम 15 मिनट का विशेष परिचय सत्र आयोजित किया जाए।
इन 15 मिनटों में विद्यार्थियों को संबंधित महापुरुष के जीवन, संघर्ष, देश के लिए किए गए कार्यों, उपलब्धियों और उनसे मिलने वाली सीख के बारे में बताया जाए।
यह जरूरी नहीं कि बड़ा आयोजन या भारी खर्च किया जाए। विद्यालय के शिक्षक, प्राचार्य या आमंत्रित वक्ता भी बच्चों को सरल भाषा में उनके योगदान की जानकारी दे सकते हैं। धीरे-धीरे यह प्रयास विद्यार्थियों के भीतर इतिहास के प्रति रुचि, देश के प्रति जिम्मेदारी और सभी महापुरुषों के प्रति सम्मान की भावना विकसित कर सकता है।
यदि वर्षभर अलग-अलग राष्ट्रीय महापुरुषों की जयंती और पुण्यतिथि पर इस प्रकार के छोटे-छोटे सत्र आयोजित किए जाएं, तो बच्चों को भारत के इतिहास और राष्ट्र निर्माण की यात्रा को समझने का अवसर मिलेगा।
अटल जी की सीख आज के नेताओं के लिए भी प्रासंगिक
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के सार्वजनिक जीवन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण संदेश आज भी प्रासंगिक है – सत्ता स्थायी नहीं होती, सरकारें आती-जाती हैं, लेकिन देश और लोकतंत्र सर्वोपरि रहते हैं।
सभी जनप्रतिनिधियों, नेताओं और संगठनों को सत्ता के अहंकार और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से ऊपर उठकर देश की एकता, अखंडता और जनता के हित को प्राथमिकता देनी चाहिए।
जनप्रतिनिधि बनने के बाद व्यक्ति केवल अपनी पार्टी का प्रतिनिधि नहीं रह जाता, बल्कि पूरे क्षेत्र की जनता का प्रतिनिधि होता है। उसके लिए जाति, धर्म, समुदाय और राजनीतिक विचारधारा से ऊपर उठकर सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार करना जरूरी है।
आलोचना दुश्मनी नहीं, सुधार का अवसर है
लोकतंत्र में पक्ष और विपक्ष दोनों की अपनी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। पक्ष का काम सरकार और नीतियों को आगे बढ़ाना है, जबकि विपक्ष का दायित्व सरकार के कामकाज पर सवाल उठाना, कमियों को सामने लाना और जनहित के मुद्दों पर जवाबदेही तय करना है।
लेकिन आलोचना का उद्देश्य केवल किसी को नीचा दिखाना या विरोध करना नहीं होना चाहिए। आलोचना ऐसी होनी चाहिए, जिससे गलतियों का पता चले, कमियों में सुधार हो और व्यवस्था बेहतर बने।
कबीरदास जी ने भी इसी भावना को अपने प्रसिद्ध दोहे में व्यक्त किया है
निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय। बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय॥
इसका अर्थ है कि आलोचना करने वाले व्यक्ति को भी अपने आसपास स्थान देना चाहिए, क्योंकि वह हमारी कमियां बताकर हमें स्वयं को सुधारने का अवसर देता है।
इसलिए आलोचना को व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं समझना चाहिए। चाहे कोई व्यक्ति सत्ता पक्ष में हो या विपक्ष में, उसे सही सुझाव और सकारात्मक आलोचना को स्वीकार करने की क्षमता रखनी चाहिए। जो अपनी गलतियों को पहचानकर सुधार करता है, वही आगे बेहतर काम कर सकता है।
दो सवाल, जिन पर देश को विचार करना चाहिए
पहला सवाल: जब राजनीतिक दल अपने नेताओं की जयंती और पुण्यतिथि पर बड़े-बड़े आयोजन कर सकते हैं, तो क्या देश के सभी सरकारी और निजी स्कूलों में राष्ट्रीय महापुरुषों के योगदान पर विशेष कार्यक्रम आयोजित नहीं किए जा सकते?
दूसरा सवाल: क्या कांग्रेस, भाजपा और अन्य राजनीतिक दल अपनी आपसी प्रतिस्पर्धा से ऊपर उठकर देश के बच्चों को सभी राष्ट्रनिर्माताओं के योगदान से परिचित कराने के लिए साझा पहल नहीं कर सकते?
यह किसी एक दल की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज, शिक्षण संस्थानों, राजनीतिक संगठनों और शासन-प्रशासन सभी की सामूहिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।
देश पहले, राजनीति बाद में!
इंदिरा गांधी हों, सरदार वल्लभभाई पटेल हों, अटल बिहारी वाजपेयी हों या देश के अन्य महान नेता – सभी के योगदान को उनके कार्यों के आधार पर याद किया जाना चाहिए। उपलब्धियों की सराहना और गलत निर्णयों की आलोचना, दोनों लोकतंत्र का हिस्सा हैं।
महापुरुष किसी एक पार्टी, जाति, धर्म या संगठन की संपत्ति नहीं होते, वे पूरे राष्ट्र की धरोहर होते हैं। इसलिए उनके जन्मदिवस, जयंती और पुण्यतिथि पर उन्हें सम्मानपूर्वक याद करना और आने वाली पीढ़ी को उनके कार्यों तथा योगदान की जानकारी देना हम सभी का दायित्व है।
राष्ट्रीय एकता दिवस केवल नाम से नहीं मनाया जा सकता, बल्कि इसके वास्तविक अर्थ को आपसी एकजुटता, सम्मान और सहयोग के माध्यम से जीवन में उतारना होगा। देश के लिए एकजुट रहना होगा। राजनीतिक मतभेद हो सकते हैं, विचार अलग हो सकते हैं, लेकिन राष्ट्रीय हित और देश की एकता के मामले में हम सबको साथ खड़ा होना चाहिए।
आज जरूरत है कि राजनीतिक दल एक-दूसरे को नीचा दिखाने की प्रतिस्पर्धा के बजाय देश के निर्माण और आने वाली पीढ़ी को शिक्षित करने की प्रतिस्पर्धा करें। स्कूलों से इसकी शुरुआत हो सकती है। यदि हर वर्ष विद्यालयों में राष्ट्रीय महापुरुषों की जयंती और पुण्यतिथि पर केवल 15 मिनट उनके जीवन और योगदान को समझने के लिए दिए जाएं, तो यह छोटी-सी पहल बच्चों की सोच, समझ और देश के इतिहास के प्रति सम्मान पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकती है।
सत्ता का घमंड स्थायी नहीं होता, सरकारें बदलती हैं, नेता बदलते हैं और राजनीतिक दलों की भूमिकाएं भी बदलती रहती हैं, लेकिन भारत की एकता, अखंडता और लोकतंत्र की गरिमा हमेशा सर्वोपरि रहनी चाहिए।
आज की राजनीति में एक चिंताजनक प्रवृत्ति बढ़ रही है। जनप्रतिनिधि एक-दूसरे के कामकाज और नीतियों की आलोचना करने के बजाय माता-पिता, परिवार और निजी जीवन पर तंज कसते हुए ऊटपटांग बयानबाजी करने लगे हैं। यह लोकतांत्रिक मर्यादा के अनुकूल नहीं है। आलोचना जरूर होनी चाहिए, लेकिन कामों की कमियां खोजकर, गलतियों को तथ्यों के साथ उजागर करके और जनहित के मुद्दों पर सवाल उठाकर। किसी की निजता और परिवार को निशाना बनाना उचित नहीं है। याद रखें, स्वस्थ आलोचना सुधार का रास्ता दिखाती है, जबकि निजी तंज राजनीति का स्तर गिराते हैं।
31 अक्टूबर: सरदार पटेल की जयंती, इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि और लोकतांत्रिक मर्यादा का संदेश।
एक ओर देश की एकता के शिल्पकार सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती, तो दूसरी ओर पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि। दोनों का देश के इतिहास में अपना महत्वपूर्ण स्थान है।
इस अवसर पर सवाल सिर्फ इतिहास को याद करने का नहीं, बल्कि आज की राजनीति से सीख लेने का भी है। नेताओं के कामकाज और नीतियों की आलोचना जरूर हो, गलतियां उजागर हों, लेकिन माता-पिता, परिवार और निजी जीवन पर तंज नहीं। आलोचना सुधार के लिए होनी चाहिए, अपमान के लिए नहीं।
राजनीतिक मतभेद रहें, लेकिन राष्ट्रीय एकता, आपसी सम्मान और लोकतांत्रिक मर्यादा कभी कमजोर न हो।
महापुरुषों की तस्वीरों पर फूल चढ़ाने से अधिक जरूरी है उनके विचारों और योगदान को बच्चों के दिल और दिमाग तक पहुंचाना। 31 अक्टूबर को यदि कहीं सरदार पटेल की तस्वीर के साथ इंदिरा गांधी की तस्वीर भी सम्मानपूर्वक लगाई जाए और कहीं इंदिरा गांधी के साथ सरदार पटेल को भी याद किया जाए, तो यह किसी राजनीतिक दल की हार नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र और राष्ट्रीय एकता की जीत होगी।
देश पहले, राजनीतिक दल बाद में; सत्ता से बड़ा राष्ट्र और राजनीति से बड़ी राष्ट्रीय एकता!
प्रदीप मिश्रा
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