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बस्तर में बदला माहौल, कैंप बने सेवा डेरा

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बस्तर, छत्तीसगढ़

By ACGN – 7647981711, 9303948009
संवाददाता :- अभिजीत सिंह ठाकुर

जहां कभी खौफ था, वहीं अब सरकारी योजनाओं और रोजगार का रास्ता खुल रहा

बस्तर ACGN:- कभी नक्सल हिंसा और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण बुनियादी सुविधाओं से दूर रहे बस्तर के गांवों में अब बदलाव की नई तस्वीर दिखाई दे रही है। जिन इलाकों में कभी डर का माहौल हुआ करता था, वहां सुरक्षा कैंपों को अब ग्रामीणों के लिए सेवा और सुविधा के केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है। शासन की योजना के तहत नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में स्थापित करीब 200 सुरक्षा कैंपों को वीर शहीद गुंडाधुर सेवा डेरा के रूप में विकसित करने की दिशा में काम चल रहा है। पहले चरण में 70 कैंपों को सेवा डेरा के रूप में तैयार किया जा रहा है।
इन सेवा डेरों का उद्देश्य दूरदराज के ग्रामीणों को सरकारी योजनाओं और जरूरी सुविधाओं से उनके आसपास ही जोड़ना है। डिजिटल सेवाओं से लेकर बैंकिंग, स्वास्थ्य, शिक्षा, कौशल प्रशिक्षण और स्वरोजगार तक की सुविधाएं एक ही जगह उपलब्ध कराने की कोशिश की जा रही है। इससे ग्रामीणों को छोटे-छोटे सरकारी कामों के लिए लंबी दूरी तय करने की मजबूरी कम हो रही है।


मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में सरकार बस्तर को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने पर जोर दे रही है। सरकार के अनुसार ‘नियद नेल्ला नार’ योजना के माध्यम से सुदूर गांवों में सड़क, बिजली, पेयजल, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं का विस्तार किया जा रहा है। कृषि, पशुपालन और सिंचाई से जुड़ी योजनाओं के जरिए ग्रामीणों की आय बढ़ाने पर भी ध्यान दिया जा रहा है।


वीर शहीद गुंडाधुर सेवा डेरा इसी बदलाव की एक महत्वपूर्ण कड़ी माना जा रहा है। 18 मई 2026 को केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने बस्तर जिले के नेतानार स्थित सीआरपीएफ कैंप परिसर में देश के पहले शहीद वीर गुंडाधुर सेवा डेरा जन सुविधा केंद्र का उद्घाटन किया था। नेतानार बस्तर के महान जननायक शहीद वीर गुंडाधुर की जन्मभूमि है। वर्ष 1910 के भूमकाल विद्रोह में गुंडाधुर ने आदिवासी अस्मिता, स्वाभिमान और जल-जंगल-जमीन के अधिकारों के लिए अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ संघर्ष का नेतृत्व किया था।


आज उसी धरती पर सेवा डेरा ग्रामीणों के लिए सरकारी सुविधाओं तक पहुंच का नया माध्यम बन रहा है। पहले आधार कार्ड, बैंक खाता, केवाईसी, मोबाइल नंबर लिंक कराने अथवा जन्म, मृत्यु, आय और जाति प्रमाण पत्र जैसे कामों के लिए ग्रामीणों को दूर जाना पड़ता था। अब ऐसी डिजिटल सेवाएं स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जा रही है।
बैंकिंग सेवाओं में भी महिलाओं की भूमिका बढ़ाई जा रही है। ग्रामीण महिलाओं को बैंक सखी के रूप में प्रशिक्षण देकर गांव के स्तर पर पैसे निकालने, जमा करने और खाते से जुड़े कामों में सहायता उपलब्ध कराई जा रही है। स्वास्थ्य परामर्श, आंगनबाड़ी और प्राथमिक शिक्षा जैसी सुविधाओं को भी सेवा डेरा से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
महिला स्व-सहायता समूहों के जरिए स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में भी काम हो रहा है। नेतानार में गुंडाधुर महिला स्व-सहायता समूह की महिलाएं इमली का प्रसंस्करण कर इमली पल्प तैयार कर रही हैं। समूह की सदस्य लंबी नाग के अनुसार इस काम से जुड़कर महिलाएं सालाना करीब एक लाख रुपये तक की आय अर्जित करने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं।
स्थानीय परंपराओं को रोजगार से जोड़ने की कोशिश भी दिखाई दे रही है। पारंपरिक ढेंकी से चावल तैयार कर उसकी बिक्री की जा रही है। इससे महिलाओं को अतिरिक्त आमदनी मिल रही है, वहीं धान की भूसी का उपयोग पशु आहार के तौर पर किया जा रहा है। सिलाई प्रशिक्षण के जरिए भी महिलाओं को हुनर देकर आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास जारी है।


बस्तर के स्थानीय उत्पादों को बड़े बाजार तक पहुंचाने के लिए पैकेजिंग और ब्रांडिंग पर भी ध्यान दिया जा रहा है। हाल ही में अहमदाबाद के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन की टीम ने नेतानार पहुंचकर सिलाई, इमली प्रसंस्करण और पारंपरिक ढेंकी से जुड़े कार्यों का जायजा लिया। टीम ने उत्पादों की बेहतर पैकेजिंग और ब्रांडिंग को लेकर चर्चा की। इससे स्थानीय उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
सुरक्षा कैंपों से सेवा डेरों तक का यह बदलाव बस्तर में विकास और जनसेवा की नई तस्वीर पेश कर रहा है। हालांकि इस बदलाव की वास्तविक सफलता इस बात से तय होगी कि योजनाओं का लाभ कितनी निरंतरता और प्रभावी तरीके से अंतिम व्यक्ति तक पहुंचता है। फिलहाल सेवा डेरा ग्रामीणों के लिए सरकारी सुविधाओं, रोजगार और स्वरोजगार से जुड़ने का एक नया रास्ता जरूर खोल रहा है।


प्रदीप मिश्रा
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