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सच की तह तक

झीरम का सच दबाने वालों पर बरसे जयसिंह! भाजपा से सीधा सवाल – आखिर किसे बचाया जा रहा है?

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कोरबा, छत्तीसगढ़

By ACGN – 7647981711, 9303948009

“झीरम का पूरा सच सामने आने से किसे डर? 13 साल बाद भी अधूरा न्याय क्यों? बड़े नक्सली नेताओं के नाम जांच से बाहर होने पर जयसिंह ने उठाए गंभीर सवाल, भाजपा पर सीधा और तीखा हमला”

कोरबा ACGN:- झीरम घाटी हत्याकांड को लेकर एक बार फिर सियासत गरमा गई है। एनआईए कोर्ट के फैसले के बाद पूर्व मंत्री एवं कांग्रेस नेता जयसिंह अग्रवाल ने भाजपा पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने फैसले को “आधा-अधूरा न्याय” बताते हुए कहा कि झीरम नरसंहार के पीछे की पूरी साजिश आज भी सामने नहीं आई है।
कोरबा कांग्रेस कार्यालय में पत्रकारों से चर्चा करते हुए जयसिंह अग्रवाल ने कहा कि कांग्रेस न्यायालय के फैसले का सम्मान करती है, लेकिन सिर्फ दोषियों को सजा मिलना ही झीरम का पूरा न्याय नहीं है। उनका कहना था कि जब तक हत्याकांड की पूरी साजिश, उसके योजनाकार और इसके पीछे मौजूद बड़े चेहरों का सच सामने नहीं आता, तब तक शहीद परिवारों के मन में उठ रहे सवाल खत्म नहीं होंगे।


   32 हत्याओं का सच सिर्फ 10 दोषियों तक सीमित क्यों?
जयसिंह अग्रवाल ने कहा कि 23 मई 2013 को झीरम घाटी में कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं सहित 32 लोगों की हत्या हुई थी। उन्होंने सवाल उठाया कि इतनी बड़ी वारदात को केवल छोटे स्तर के नक्सलियों की कार्रवाई मानकर जांच पूरी कैसे हो सकती है?
उन्होंने कहा कि एनआईए द्वारा गिरफ्तार किए गए 10 लोगों को अदालत ने दोषी माना है, लेकिन उनके मुताबिक इतने बड़े नरसंहार के पीछे बड़े नक्सली नेतृत्व की भूमिका की भी पड़ताल जरूरी थी।
      गणपति और रमन्ना के नाम हटे तो जवाब कौन देगा?
जयसिंह अग्रवाल ने एनआईए की शुरुआती जांच का हवाला देते हुए कहा कि प्रारंभिक एफआईआर में माओवादी नेता गणपति उर्फ मुपल्ला लक्ष्मण राव और रमन्ना सहित कई नाम सामने आए थे।
उन्होंने कहा कि 21 मार्च 2014 को गणपति और रमन्ना समेत 26 फरार आरोपियों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किए गए थे। इसके बावजूद बाद में चार्जशीट से इन नामों के हटने पर उन्होंने सवाल खड़ा किया।
उन्होंने पूछा “जब ये नाम जांच के दायरे में थे, गिरफ्तारी वारंट तक जारी हुए, तो बाद में इनका नाम चार्जशीट से क्यों हटाया गया? किस आधार पर जांच की दिशा बदली गई?”
जयसिंह के इन सवालों ने झीरम जांच को लेकर राजनीतिक बहस को एक बार फिर तेज कर दिया है।
         आत्मसमर्पण करने वालों से पूछताछ क्यों नहीं?
कांग्रेस नेता ने उन नक्सलियों का भी उल्लेख किया, जिनके बारे में झीरम मामले में वांछित होने की बात कही गई थी और जिन्होंने बाद में आत्मसमर्पण किया। उन्होंने सवाल किया कि यदि ऐसे लोगों के पास झीरम की साजिश से जुड़ी जानकारी हो सकती थी तो उनसे पूछताछ क्यों नहीं की गई?
उन्होंने चैतू उर्फ श्याम दादा, रुपेश उर्फ मोल्ला राजिरेड्डी, निर्मला उर्फ सुमित्रा, भूपति उर्फ सोनू दादा और केंद्रीय समिति सदस्य सुजाता का नाम लेते हुए जांच की प्रक्रिया पर सवाल उठाए।
           परिवर्तन यात्रा की सुरक्षा किसने हटाई?
जयसिंह अग्रवाल ने झीरम हमले से पहले परिवर्तन यात्रा की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी तीखे सवाल किए। उन्होंने पूछा कि सुरक्षा क्यों हटाई गई थी? यात्रा का मार्ग किसके निर्देश पर बदला गया? आखिर हमले की योजना किसने बनाई थी?
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि हमले में घायल होकर बचने वाले प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों को जांच में पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया।
भाजपा पर सीधा आरोप “पूरा सच सामने नहीं आने देना चाहती”
जयसिंह अग्रवाल ने भाजपा पर सीधा राजनीतिक हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि भाजपा नहीं चाहती कि झीरम हत्याकांड का पूरा सच जनता के सामने आए।
उन्होंने मांग की कि झीरम मामले की जांच में केवल हमले को अंजाम देने वालों तक सीमित न रहकर राजनीतिक षड्यंत्र, बड़े नक्सली नेताओं की भूमिका, सुरक्षा व्यवस्था में बदलाव, यात्रा का मार्ग बदलने और हमले की पूरी योजना जैसे सभी पहलुओं की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि झीरम के शहीदों के परिवारों को केवल अदालत के फैसले से नहीं, बल्कि पूरे सच के सामने आने से पूर्ण न्याय मिलेगा।
         “सवाल आज भी खड़े हैं, जवाब देना ही होगा”
जयसिंह अग्रवाल के बयान के बाद झीरम हत्याकांड एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में है। कांग्रेस नेता ने जिस तरह जांच की दिशा, बड़े नक्सली नेताओं के नाम हटने और परिवर्तन यात्रा की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल उठाए हैं, उससे आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर सियासी टकराव और तेज होने के संकेत हैं।
झीरम नरसंहार को वर्षों बीत चुके हैं, लेकिन शहीद परिवारों और प्रदेश की जनता के सामने उठे कई सवाल आज भी चर्चा में हैं। अब कांग्रेस नेता के इन आरोपों पर भाजपा और जांच एजेंसियों की प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।

प्रदीप मिश्रा
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