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नक्सल भय का अंत, अबूझमाड़ में फिर गूंजने लगी घोटुल की मांदर थाप

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नारायणपुर, छत्तीसगढ़

By ACGN – 7647981711, 9303948009

सुरक्षा का भरोसा बढ़ा तो लौटने लगी आदिवासी संस्कृति की रौनक, चेलिक-मोटियारिन के लोकगीतों से जीवंत हो रहे गांव

नारायणपुर, 27 अगस्त 2026। कभी नक्सली हिंसा और भय के साये में रहने वाला बस्तर का अबूझमाड़ क्षेत्र अब धीरे-धीरे अपनी पुरानी सांस्कृतिक पहचान की ओर लौट रहा है। नारायणपुर जिले के अंदरूनी गांवों में घोटुल की गौरवशाली परंपरा फिर जीवंत होने लगी है। ग्रामीण स्थानीय लकड़ियों और प्राकृतिक सामग्रियों से पारंपरिक घोटुल तैयार कर रहे हैं, जहां नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक मूल्यों से जोड़ा जा रहा है।


         भय की जगह अब गूंज रही मांदर की थाप
अबूझमाड़ की शामों में बदलाव साफ दिखाई देने लगा है। जहां कभी गोलियों की आवाज और सन्नाटे का भय ग्रामीण जीवन को प्रभावित करता था, वहीं अब सूर्य ढलने के बाद मांदर की थाप और चेलिक-मोटियारिन के लोकगीत वातावरण में नई ऊर्जा भर रहे हैं। सुरक्षा के माहौल में सुधार के साथ आदिवासी समाज की ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहर घोटुल की रौनक भी लौट रही है।
   घोटुल बना संस्कृति और सामाजिक शिक्षा की पाठशाला
आदिवासी समाज में घोटुल केवल मिलने-जुलने या मनोरंजन का स्थान नहीं रहा है, बल्कि यह सामाजिक अनुशासन, लोककला, सामुदायिक जीवन और परंपराओं की महत्वपूर्ण पाठशाला के रूप में जाना जाता है। यहां बुजुर्ग नई पीढ़ी को समाज के नियमों, लोकगीतों, नृत्य, परंपराओं और जीवन से जुड़े दायित्वों की जानकारी देते हैं।
नक्सली हिंसा और असुरक्षा के दौर में शाम होते ही ग्रामीणों का घरों से निकलना मुश्किल हो जाता था। इसका सीधा असर घोटुल जैसी सामुदायिक परंपराओं पर पड़ा और कई स्थानों पर इनकी गतिविधियां लगभग समाप्त हो गई थीं।
              अब बेझिझक घोटुल पहुंच रहे युवा
सुरक्षा वातावरण में आए बदलाव के बाद ग्रामीणों में भरोसा बढ़ा है। अब युवा बेझिझक घोटुल पहुंच रहे हैं और अपने बुजुर्गों से लोकगीत, पारंपरिक नृत्य और सामाजिक परंपराएं सीख रहे हैं। यह बदलाव केवल सांस्कृतिक गतिविधियों की वापसी नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने की प्रक्रिया भी है।
   घोटुल की वापसी, लौटते सामूहिक उल्लास की तस्वीर
अबूझमाड़ में घोटुलों का पुनर्जीवन आदिवासी समाज के सांस्कृतिक अस्तित्व और आत्मसम्मान की वापसी का प्रतीक बनता दिखाई दे रहा है। सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होने के साथ ग्रामीण जीवन में खेती-किसानी, हाट-बाजार, आवागमन और त्योहारों की रौनक भी धीरे-धीरे बढ़ रही है।
ग्रामीणों का मानना है कि इस बदले हुए वातावरण को स्थायी बनाने के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, रोजगार और संचार जैसी बुनियादी सुविधाओं का विस्तार भी जरूरी है। क्योंकि विकास की राह केवल सड़कों और भवनों से नहीं, बल्कि लोगों के भीतर से भय समाप्त होने और अपनी संस्कृति को खुले मन से जीने के अधिकार से भी होकर गुजरती है।
        मांदर की थाप दे रही नए अबूझमाड़ का संदेश
अबूझमाड़ के गांवों में घोटुलों से उठती मांदर की थाप और लोकगीतों की गूंज एक बड़े बदलाव की कहानी कह रही है। यह आवाज बता रही है कि जब भय का अंधेरा छंटता है, तो संस्कृति फिर सांस लेने लगती है और सामूहिक जीवन में उल्लास लौट आता है।


प्रदीप मिश्रा
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