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लाठी-डंडे खाएंगे, जेल जाएंगे, लेकिन बिना न्याय के जनसुनवाई नहीं होने देंगे

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कोरबा, छत्तीसगढ़

By ACGN – 7647981711, 9303948009

मानिकपुर विस्तार से पहले न्याय की मांग, जनसुनवाई के विरोध में ग्रामीणों का आक्रोश
पूर्व मंत्री जय सिंह अग्रवाल से मिले प्रभावित ग्रामीण, 62 साल पुराने विस्थापन के दर्द का उठाया मुद्दा

कोरबा ACGN:- एसईसीएल की मानिकपुर विस्तार परियोजना को लेकर प्रभावित आठ गांवों के ग्रामीणों में आक्रोश गहराता जा रहा है। ग्रामीणों ने परियोजना की पर्यावरणीय जनसुनवाई का विरोध करते हुए साफ कहा है कि जब तक पुराने विस्थापन, मुआवजा, पुनर्वास और रोजगार से जुड़े मामलों का समाधान नहीं होता, तब तक वे जनसुनवाई का विरोध करेंगे।

ग्रामीणों का कहना है कि उनकी जमीन का अर्जन वर्ष 1964 में किया गया था, लेकिन छह दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी कई प्रभावित परिवार अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।


मंगलवार को प्रभावित ग्रामीणों ने पूर्व मंत्री एवं पूर्व राजस्व मंत्री जय सिंह अग्रवाल से मुलाकात कर अपनी समस्याएं और वर्षों से चले आ रहे विस्थापन के दर्द को उनके सामने रखा। ग्रामीणों ने बताया कि छह दशक पहले उनकी जमीन बेहद कम मुआवजे में अर्जित कर ली गई थी।

जमीन चली गई, लेकिन उसके बदले कई परिवारों को आज भी स्थायी पुनर्वास, रोजगार और बेहतर जीवनयापन का भरोसेमंद आधार नहीं मिल पाया है। ग्रामीणों का कहना है कि इस पूरे मामले की मार एक नहीं बल्कि दो पीढ़ियां झेल चुकी हैं और अब तीसरी पीढ़ी भी अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने को मजबूर है।


ग्रामीणों के अनुसार कई परिवारों की जमीन पर खनन कार्य शुरू हो चुका है, जबकि कुछ परिवारों की जमीन का हिस्सा अब भी उनके कब्जे में है। अब शेष भूमि को भी करीब साढ़े छह लाख रुपये की राशि में लेने की प्रक्रिया को लेकर ग्रामीणों ने सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि जमीन उनके लिए केवल संपत्ति नहीं, बल्कि परिवार की आजीविका और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का आधार है। खेती की जमीन जाने के बाद यदि परिवार को स्थायी रोजगार, उचित पुनर्वास और जीवनयापन की वैकल्पिक व्यवस्था नहीं मिलती है तो विस्थापन का संकट कई वर्षों तक बना रहता है।


ग्रामीणों ने पूर्व मंत्री के समक्ष अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि पुराने प्रभावित परिवारों के पुनर्वास, मुआवजा और रोजगार से जुड़े मामलों का निराकरण किए बिना नई परियोजना के लिए पर्यावरणीय जनसुनवाई कराना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि पहले पुराने मामलों का समाधान किया जाए, इसके बाद ही मानिकपुर विस्तार को लेकर आगे की प्रक्रिया शुरू होनी चाहिए। ग्रामीणों ने विरोध तेज करने की बात कहते हुए कहा कि जरूरत पड़ी तो वे लाठी-डंडे भी खाएंगे और जेल जाने से भी पीछे नहीं हटेंगे, लेकिन अपने अधिकारों की लड़ाई जारी रखेंगे।


पूर्व मंत्री ने एसईसीएल सीएमडी को लिखा पत्र
ग्रामीणों की समस्याएं सुनने के बाद पूर्व मंत्री जय सिंह अग्रवाल ने एसईसीएल के अध्यक्ष सह प्रबंध निदेशक हरीश दुहन को पत्र भेजकर मानिकपुर विस्तार परियोजना की पर्यावरणीय जनसुनवाई को तत्काल निरस्त करने की मांग की है। उन्होंने पत्र में कहा है कि जनसुनवाई से पहले प्रभावित परिवारों के साथ बैठक कर उनकी समस्याओं को गंभीरता से सुना जाना चाहिए और लंबित मामलों का समाधान किया जाना चाहिए।


श्री अग्रवाल ने कहा कि पुराने पुनर्वास, मुआवजा, रोजगार और मूलभूत सुविधाओं से जुड़े मामलों के निराकरण के बाद ही खदान विस्तार की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि वे विकास कार्यों के विरोध में नहीं हैं, लेकिन विकास की कीमत प्रभावित परिवारों के साथ अन्याय करके नहीं चुकाई जा सकती। जिन लोगों ने अपनी जमीन देकर परियोजना के लिए रास्ता बनाया है, उनके अधिकारों और भविष्य की सुरक्षा को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।


पूर्व मंत्री ने आठों प्रभावित गांवों के पुराने और नए प्रभावित परिवारों की बैठक बुलाकर उनकी समस्याएं सुनने और उनके समाधान के लिए ठोस पहल करने की मांग की है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि ग्रामीणों की समस्याओं के समाधान से पहले पर्यावरणीय जनसुनवाई कराई जाती है तो इसका ग्रामीणों की ओर से और अधिक जोरदार विरोध हो सकता है। ऐसी स्थिति में उत्पन्न होने वाली परिस्थितियों की जिम्मेदारी एसईसीएल प्रबंधन की होगी।


छह दशक बाद भी खत्म नहीं हुआ विस्थापन का दर्द
मानिकपुर विस्तार का मुद्दा प्रभावित परिवारों के लिए केवल खदान विस्तार का मामला नहीं है। ग्रामीणों के लिए यह छह दशक से चले आ रहे विस्थापन और अधिकारों की लड़ाई का सवाल है। वर्ष 1964 में जमीन अर्जित होने के बाद भी यदि आज परिवार पुनर्वास, मुआवजा और रोजगार की मांग को लेकर संघर्ष कर रहे हैं, तो यह मामला उनके लिए बेहद गंभीर है।


ग्रामीणों की मांग है कि नई परियोजना और खदान विस्तार की प्रक्रिया शुरू करने से पहले पुराने प्रभावित परिवारों के लंबित मामलों को प्राथमिकता से सुलझाया जाए। उनका कहना है कि जिन परिवारों ने अपनी जमीन दी है, उन्हें केवल मुआवजा देने तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उनके सम्मानजनक पुनर्वास, रोजगार और आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। अब देखना होगा कि ग्रामीणों के इस विरोध और पूर्व मंत्री द्वारा उठाए गए मुद्दे के बाद एसईसीएल प्रबंधन इस मामले में क्या कदम उठाता है।

प्रदीप मिश्रा
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