निगम-बोर्डों में नियुक्ति की लंबी प्रतीक्षा, भाजपा के भीतर बढ़ती बेचैनी पर विपक्ष का हमला
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भुवनेश्वर, ओड़िशा
By ACGN – 7647981711, 9303948009
संवाददाता :- ओड़िशा ब्यूरो – स्वामी बिजयानंद जी महाराज
ढाई साल बाद भी अध्यक्षों की कुर्सियां खाली, दावेदारों का धैर्य जवाब देने लगा; पंचायत और नगर निकाय चुनाव से पहले भाजपा के सामने संगठनात्मक चुनौती
भुवनेश्वर ACGN:- ओड़िशा में भाजपा सरकार के गठन के बाद निगमों, बोर्डों और विकास परिषदों के अध्यक्ष पदों पर नियुक्ति का इंतजार अब राजनीतिक चर्चा का बड़ा विषय बनता जा रहा है। सरकार के करीब ढाई वर्ष पूरे होने के बावजूद कई महत्वपूर्ण संस्थाओं में अध्यक्ष पदों पर नियुक्तियां नहीं होने से जहां पद के दावेदार नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच बेचैनी की चर्चा है, वहीं विपक्षी कांग्रेस ने इसे सरकार और संगठन के बीच समन्वय की कमी बताते हुए सवाल उठाना शुरू कर दिया है। राजनीतिक गलियारों में अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर इन महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति में इतनी लंबी देरी क्यों हो रही है और सरकार का अंतिम निर्णय कब सामने आएगा।

भाजपा सरकार बनने के बाद पूर्ववर्ती सरकार के कई निगमों और बोर्डों को भंग किए जाने के बाद यह उम्मीद थी कि जल्द ही नए अध्यक्षों की नियुक्ति कर इन संस्थाओं को सक्रिय किया जाएगा। लेकिन समय बीतता गया और नियुक्तियों की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी। प्रदेश भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की ओर से समय-समय पर नियुक्तियां जल्द किए जाने के संकेत जरूर दिए जाते रहे हैं, लेकिन अब तक औपचारिक घोषणा नहीं होने से दावेदारों की प्रतीक्षा लगातार लंबी होती जा रही है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि निगम, बोर्ड और विकास परिषद केवल औपचारिक पद नहीं हैं, बल्कि सरकार की नीतियों को जमीन तक पहुंचाने और संगठन तथा समाज के विभिन्न वर्गों के बीच समन्वय स्थापित करने में इन संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ऐसे में लंबे समय तक इन पदों पर नियुक्तियां नहीं होने से प्रशासनिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर प्रभाव पड़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

इस बीच विपक्षी कांग्रेस भाजपा पर राजनीतिक नियुक्तियों को लेकर निशाना साध रही है। विपक्ष का तर्क है कि यदि सरकार और संगठन के स्तर पर दावेदारों के नामों को लेकर सहमति नहीं बन पा रही है तो इसका असर आने वाले पंचायत और नगर निकाय चुनावों में दिखाई दे सकता है। हालांकि भाजपा के भीतर किसी बड़े असंतोष की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक चर्चाओं में कार्यकर्ताओं की नाराजगी और पदों को लेकर बढ़ती प्रतीक्षा को लेकर तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं।

इसी बीच हाल ही में केन्दुझर जिला योजना बोर्ड के सदस्यों के चुनाव परिणाम को लेकर भी राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हुई है। उपलब्ध दावों के अनुसार योजना बोर्ड के 14 सदस्यों में भाजपा को एक भी सफलता नहीं मिली। इस परिणाम को कुछ राजनीतिक विश्लेषक संगठन और स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय की चुनौती से जोड़कर देख रहे हैं। हालांकि किसी चुनावी परिणाम के लिए केवल निगम और बोर्डों में अध्यक्षों की नियुक्ति न होने को ही कारण मानना राजनीतिक रूप से अंतिम निष्कर्ष नहीं हो सकता।
भाजपा के लिए सबसे संवेदनशील मुद्दा उन नेताओं और सामाजिक समूहों की अपेक्षाएं भी हैं, जिन्होंने वर्ष 2024 के विधानसभा चुनाव में पार्टी के पक्ष में सक्रिय भूमिका निभाने का दावा किया है। सूत्रों के हवाले से यह भी चर्चा है कि कुछ संत समाज और उनसे जुड़े सामाजिक संगठनों के लोगों में सरकार और संगठन द्वारा अपेक्षित राजनीतिक सहभागिता नहीं मिलने को लेकर असंतोष है। हालांकि इन दावों और विभिन्न संगठनों की संख्या से संबंधित आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है, इसलिए इन दावों को फिलहाल राजनीतिक चर्चाओं के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
वर्ष 2024 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को ओड़िशा में सत्ता हासिल हुई और यह परिणाम राज्य की राजनीति में बड़ा परिवर्तन माना गया। भाजपा के लिए यह सफलता केवल चुनावी जीत नहीं थी, बल्कि लंबे समय से राज्य की सत्ता पर काबिज राजनीतिक व्यवस्था में बड़ा बदलाव भी था। ऐसे में पार्टी के सामने अब सरकार चलाने के साथ-साथ संगठन को लगातार मजबूत बनाए रखने की चुनौती भी है। यही कारण है कि निगमों, बोर्डों और परिषदों में नियुक्तियों का मुद्दा सामान्य प्रशासनिक निर्णय से आगे बढ़कर राजनीतिक महत्व हासिल करता दिखाई दे रहा है।
दावेदारों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर नियुक्ति का निर्णय कब होगा। राजनीतिक सूत्रों के अनुसार कई वरिष्ठ कार्यकर्ता चुनाव के बाद इन पदों पर जिम्मेदारी मिलने की उम्मीद लगाए बैठे थे। समय बीतने के साथ अब उनकी प्रतीक्षा बेचैनी में बदलने की चर्चा है। हालांकि किसी प्रमुख दावेदार ने सार्वजनिक रूप से पार्टी नेतृत्व के खिलाफ खुलकर बयान नहीं दिया है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जरूर है कि यदि लंबे समय तक निर्णय टलता रहा तो कार्यकर्ताओं के बीच निराशा बढ़ सकती है।
दूसरी ओर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष मनमोहन सामल ने 16 अगस्त को जल्द ही निगमों में नियुक्तियों की घोषणा किए जाने की बात कही है। ऐसे में अब राजनीतिक नजरें इस बात पर टिकी हैं कि यह घोषणा वास्तव में कब होती है और किन चेहरों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलती हैं। नियुक्तियों में क्षेत्रीय संतुलन, संगठन में सक्रियता, सामाजिक प्रतिनिधित्व और चुनावी समीकरण जैसे पहलुओं को कितना महत्व दिया जाता है, यह भी आने वाले समय में स्पष्ट होगा।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या निगमों और बोर्डों के अध्यक्ष पदों पर नियुक्ति केवल लंबे समय से प्रतीक्षा कर रहे नेताओं को पद देने की कवायद होगी, या सरकार इसे संगठन को मजबूत करने और जनता से जुड़ी संस्थाओं को प्रभावी बनाने के अवसर के रूप में देखेगी? क्योंकि पंचायत और नगर निकाय चुनाव अब बहुत दूर नहीं हैं और चुनाव से पहले कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं को नजरअंदाज करना किसी भी राजनीतिक दल के लिए आसान नहीं होता।
फिलहाल भाजपा नेतृत्व के सामने दोहरी चुनौती दिखाई दे रही है। एक ओर सरकार की योजनाओं और विकास कार्यों को आगे बढ़ाना है, तो दूसरी ओर लंबे समय से जिम्मेदारी की प्रतीक्षा कर रहे संगठन के नेताओं और कार्यकर्ताओं की उम्मीदों को भी संभालना है। अब देखना यह होगा कि सरकार और संगठन इस मामले में कितनी जल्दी निर्णय लेते हैं और किन चेहरों को निगमों, बोर्डों तथा विकास परिषदों की जिम्मेदारी सौंपी जाती है। कुर्सियां खाली हैं, दावेदार इंतजार में हैं और राजनीतिक गलियारों में सवाल लगातार गूंज रहा है, आखिर नियुक्तियों की घोषणा कब?

प्रदीप मिश्रा
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