भारत खेल महाशक्ति क्यों नहीं बन पा रहा? भारत में खेलों के प्रसार और विकास की आवश्यकता
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गंजाम, ओडिशा
By ACGN 7647981711, 9303948009
संवाददाता:- अनिल कुमार चौधरी
आलेख – श्री विजय चंद्र मिश्रा अधिवक्ता (गंजाम )
क्रिकेट की लोकप्रियता के बीच ओलंपिक में कमजोर प्रदर्शन ने देश की खेल व्यवस्था और सामाजिक सोच पर खड़े किए बड़े सवाल
भारत देश में खेलों के प्रसार और विकास को लेकर पिछले कुछ वर्षों में केंद्र सरकार तथा विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा किए जा रहे प्रयास निश्चित रूप से सराहनीय हैं। देशभर में आधुनिक खेल मैदान, स्टेडियम, प्रशिक्षण केंद्र और खेल अवसंरचना के निर्माण पर लगातार कार्य किया जा रहा है। विशेष रूप से ओडिशा राज्य में खेलों को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयास राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बने हुए हैं। ओडिशा सरकार सभी जिलों में खेल सुविधाओं के विस्तार के साथ-साथ विद्यालयों और महाविद्यालयों में खेल गतिविधियों को प्रोत्साहित करने के लिए निरंतर प्रयास कर रही है।

भारत में क्रिकेट खेल की लोकप्रियता किसी से छिपी नहीं है। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट प्रतियोगिताओं में भारतीय क्रिकेट टीम और खिलाड़ियों के उत्कृष्ट प्रदर्शन ने पूरे देश को गौरवान्वित किया है। विश्वभर के क्रिकेट प्रेमी भारतीय खिलाड़ियों की प्रतिभा और उपलब्धियों से परिचित हैं। लेकिन इसके साथ यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि क्रिकेट की अपार लोकप्रियता के बावजूद ओलंपिक और अन्य अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में भारत का प्रदर्शन अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहा है।
लगभग एक सौ छियालिस करोड़ की विशाल जनसंख्या और तेजी से मजबूत होती अर्थव्यवस्था वाले भारत का ओलंपिक पदक तालिका में पीछे रहना यह दर्शाता है कि देश में खेलों के विकास और खिलाड़ियों को आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने के प्रति अब भी गंभीर कमी बनी हुई है। पेरिस ओलंपिक दो हजार चौबीस में भारत केवल छह पदक जीत पाया। इनमें एक रजत और पांच कांस्य पदक शामिल रहे। दो सौ छह देशों की पदक तालिका में भारत को इकहत्तरवां स्थान मिला। इससे पहले टोक्यो ओलंपिक दो हजार बीस में भारत ने कुल सात पदक हासिल किए थे।
पेरिस ओलंपिक दो हजार चौबीस में भारत की पुरुष हॉकी टीम ने कांस्य पदक जीतकर देश का सम्मान बढ़ाया। यह ओलंपिक इतिहास में भारतीय हॉकी टीम का तेरहवां पदक रहा। वर्ष उन्नीस सौ अट्ठाईस से अब तक भारत ने हॉकी में आठ स्वर्ण, एक रजत और तीन कांस्य पदक जीतकर विश्व की सर्वश्रेष्ठ टीमों में अपनी पहचान बनाई है। इसके बावजूद देश में हॉकी और अन्य खेलों को वह लोकप्रियता और आर्थिक समर्थन नहीं मिल पाया जो क्रिकेट को प्राप्त है।
यदि पेरिस ओलंपिक की पदक तालिका पर नजर डालें तो संयुक्त राज्य अमेरिका एक सौ छब्बीस पदकों के साथ पहले स्थान पर रहा, जबकि चीन इक्यानवे पदकों के साथ दूसरे और जापान पैंतालीस पदकों के साथ तीसरे स्थान पर रहा। अमेरिका की जनसंख्या लगभग चौंतीस करोड़, चीन की लगभग एक सौ बयालीस करोड़ और जापान की लगभग बारह करोड़ है। इसके बावजूद इन देशों ने भारत की तुलना में कहीं बेहतर प्रदर्शन किया। ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, इटली और ग्रेट ब्रिटेन जैसे कम आबादी वाले देशों ने भी भारत से अधिक पदक जीतकर यह साबित किया कि मजबूत खेल नीति और खिलाड़ियों को बेहतर सुविधाएं मिलने पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता प्राप्त की जा सकती है।
सामान्य रूप से देखा जाए तो विकसित और मजबूत अर्थव्यवस्था वाले देशों का प्रदर्शन अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में बेहतर रहता है। कारण यह है कि वहां खेलों को केवल मनोरंजन नहीं बल्कि राष्ट्रीय गौरव और मानव संसाधन विकास का महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है। खिलाड़ियों को शुरुआती स्तर से ही आधुनिक प्रशिक्षण, पौष्टिक भोजन, खेल मनोवैज्ञानिक, चिकित्सकीय सहायता और अंतरराष्ट्रीय सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं।
भारत में स्थिति इसके विपरीत दिखाई देती है। क्रिकेट को छोड़कर हॉकी, फुटबॉल, टेनिस, टेबल टेनिस, बैडमिंटन, शतरंज, एथलेटिक्स, जिम्नास्टिक और तैराकी जैसे खेलों के प्रति आम जनता का रवैया अपेक्षाकृत उदासीन बना हुआ है। अधिकांश विद्यार्थी पढ़ाई को प्राथमिकता देते हैं जबकि खेल और व्यायाम को गौण समझा जाता है। माता-पिता भी बच्चों को खेलों में करियर बनाने के लिए बहुत कम प्रोत्साहित करते हैं।
देश में खेलों के प्रति यह कमजोर मानसिकता इसलिए भी विकसित हुई क्योंकि क्रिकेट को छोड़कर अधिकांश खेलों में खिलाड़ियों को आर्थिक सुरक्षा और सम्मानजनक भविष्य नहीं मिल पाता। कई प्रतिभाशाली खिलाड़ी आर्थिक कठिनाइयों के कारण बीच में ही खेल छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं। केवल वही खिलाड़ी समाज में पहचान बना पाते हैं जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने में सफल हो जाते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत को खेल महाशक्ति बनना है तो पूरे देश में आधुनिक खेल अकादमियों की स्थापना करनी होगी। खिलाड़ियों को प्रशिक्षित कोच, पौष्टिक भोजन, खेल चिकित्सा सुविधा, मानसिक स्वास्थ्य सहायता और वैज्ञानिक प्रशिक्षण उपलब्ध कराना होगा। खेलों के विकास के लिए राष्ट्रीय बजट में पर्याप्त धनराशि निर्धारित करनी होगी। बताया जाता है कि चीन का वार्षिक खेल बजट भारत की तुलना में सात से आठ गुना अधिक है।
खेल जगत में व्याप्त पक्षपातपूर्ण मानसिकता और राजनीतिक हस्तक्षेप को समाप्त करना भी अत्यंत आवश्यक है। कई खेल संस्थाओं का संचालन ऐसे लोगों के हाथों में है जिनका खेल क्षेत्र से प्रत्यक्ष अनुभव नहीं होता। इससे प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को उचित अवसर नहीं मिल पाते।
विशेष लेख में यह भी सुझाव दिया गया है कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता प्राप्त करने वाले खिलाड़ियों के लिए आर्थिक पुरस्कार, नौकरी और पेंशन की व्यवस्था की जानी चाहिए। रक्षा बलों, अर्द्धसैनिक बलों, पुलिस सेवा और शिक्षण संस्थानों में खिलाड़ियों के लिए आरक्षण और सम्मानजनक अवसर उपलब्ध कराने से अधिक युवा खेलों की ओर आकर्षित होंगे।
लेख में कहा गया है कि खेल और व्यायाम केवल पदक जीतने का माध्यम नहीं बल्कि स्वस्थ समाज निर्माण की आधारशिला हैं। बचपन से खेलों को बढ़ावा देने से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य बेहतर होता है। महात्मा गांधी ने भी कहा था कि स्वास्थ्य ही सबसे बड़ी संपत्ति है। स्वस्थ नागरिक ही किसी राष्ट्र को मजबूत, समृद्ध और प्रगतिशील बना सकते हैं।
यदि केंद्र और राज्य सरकारें ईमानदारी और दूरदृष्टि के साथ खेलों को प्राथमिकता दें, तो आने वाले वर्षों में भारत अंतरराष्ट्रीय खेल मंच पर बड़ी ताकत बन सकता है। देश में प्रतिभाओं की कमी नहीं है, आवश्यकता केवल सही दिशा, मजबूत नीति और खिलाड़ियों को निरंतर प्रोत्साहन देने की है।

(इं) विजय चंद्र मिश्र अधिवक्ता,
ब्रह्मपुर – गंजाम जिला (ओडिशा)
प्रदीप मिश्रा (संपादक)
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