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सच की तह तक

जंगल के रक्षक ही बने भक्षक ग्रामीणों में उबाल महुआ पेड़ कटने पर उग्र आंदोलन की चेतावनी

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सूरजपुर, छत्तीसगढ़

By ACGN 7647981711, 9303948009

संवाददाता सौरभ साहू

वन विभाग की लापरवाही और अवैध कटाई ने ग्रामीणों के विश्वास को झकझोर दिया, तीन दिनों में कार्रवाई न होने पर उग्र आंदोलन की चेतावनी

सूरजपुर जिले के ओडगी ब्लॉक में ग्राम पंचायत खोड रेंज खोड इकाई क्रमांक 01 में वन विभाग की लापरवाही ने ग्रामीणों में गहरी नाराजगी पैदा कर दी है। मामला महुआ पेड़ की अवैध कटाई का है, जिसे देखकर स्थानीय लोग हैरान और आक्रोशित हैं। महुआ पेड़ के मालिक देवमन यादव जब जंगल में महुआ बीनने गए, तो उन्होंने देखा कि चार-पाँच महुआ के पेड़ नीचे से काट दिए गए हैं। पेड़ इस तरह काटे गए कि वे अपने आप सूखकर गिर सकते हैं। इस कटाई से केवल पेड़ों को नुकसान ही नहीं हुआ बल्कि जंगल की सुरक्षा के प्रतीक वन विभाग की छवि भी धूमिल हो गई है।


ग्रामीणों के अनुसार, यह कोई साधारण घटना नहीं है। पेड़ों की कटाई बिना किसी सूचना या कागजात के की गई, और जिम्मेदार कर्मचारियों ने इस गंभीर कार्रवाई को छुपाने की कोशिश की। पेड़ के मालिक देवमन यादव ने तुरंत ग्राम पंचायत में इस घटना की सूचना दी। पंचायत में जब ग्रामीणों ने दोषियों का पता लगाया, तो महुआ कटाई में शामिल गार्ड परमात्मा सिंह और फडवाचर रामपति सिंह ने अपनी गलती स्वीकार की।


पंचायत में दरोगा नवलदिन तिर्की, गार्ड अमित कुमार और अन्य ग्रामवासी उपस्थित थे। लेकिन सवाल यह उठता है कि इतने स्पष्ट और ठोस सबूत होने के बावजूद विभागीय अधिकारी चुप क्यों हैं। क्या यह सिर्फ़ एक तात्कालिक घटना है, या वन विभाग की प्रणाली में गहरी लापरवाही और अनदेखी की परंपरा मौजूद है?
ग्रामीणों ने स्पष्ट किया है कि अगर तीन दिनों के भीतर दोषियों के खिलाफ ठोस कार्रवाई नहीं की गई, तो वे उग्र आंदोलन की राह अपनाएंगे। इस आंदोलन की चेतावनी से यह स्पष्ट होता है कि वन विभाग के कर्मचारियों द्वारा की गई लापरवाही सिर्फ़ पेड़ों का ही नहीं, बल्कि ग्रामीणों के विश्वास का भी अपमान है।


विश्लेषक मानते हैं कि वन विभाग का यह रवैया केवल नियमों और कागजी कार्रवाई तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जंगल और स्थानीय जीवन पर भी गंभीर असर पड़ता है। महुआ जैसे पेड़ केवल जंगल का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि ग्रामीण जीवन, अर्थव्यवस्था और स्थानीय संस्कृति से जुड़े हैं। इनके नुकसान से ग्रामीणों की आजीविका, पारंपरिक उत्सव और स्थानीय पर्यावरणीय संतुलन प्रभावित होता है।
इस पूरे मामले में एक और गंभीर पहलू यह है कि पेड़ काटने की प्रक्रिया इतनी चालाकी से की गई कि पेड़ तुरंत गिर नहीं रहे। यह साफ़ संकेत है कि इसे जानबूझकर काटा गया ताकि जिम्मेदारी टाली जा सके। यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या जंगल के रक्षक ही अब अपनी जिम्मेदारी से भाग रहे हैं और पेड़ों को मारकर अपने कर्तव्य का उल्लंघन कर रहे हैं।
स्थानीय लोग अब विभाग और प्रशासन से सवाल कर रहे हैं कि क्या इन कर्मचारियों के खिलाफ वास्तविक कार्रवाई होगी या मामला कागजी लिपापोती के तहत दबा दिया जाएगा। ग्रामीणों का कहना है कि सिर्फ़ पेड़ों की कटाई नहीं, बल्कि भरोसा और सुरक्षा की भावना भी खतरे में है।
यह घटना वन विभाग के संचालन में पारदर्शिता, जवाबदेही और जिम्मेदारी के सवाल को सामने लाती है। अगर इस तरह की लापरवाही पर कोई कार्रवाई नहीं होती, तो यह संदेश जाएगा कि जंगल और उसके संसाधनों की सुरक्षा केवल एक दिखावटी प्रक्रिया है।
और सवाल यही है कि, इतने स्पष्ट और ठोस सबूतों के बावजूद क्या वन विभाग अपने “रक्षक” कर्मचारियों की सजा करने की हिम्मत करेगा या सच भी महुआ पेड़ों की तरह धीरे-धीरे सूखकर गिर जाएगा?

प्रदीप मिश्रा
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