गैस सिलेंडर महंगा और किताबों पर विवाद, ‘नागरिक परिक्रमा’ में सरकार और न्यायपालिका पर तीखी टिप्पणी
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‘नागरिक परिक्रमा’
रायपुर, छत्तीसगढ़
By ACGN 7647981711, 9303948009
राजनीतिक टिप्पणी में महंगाई, गैस कीमतों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मुद्दों को उठाया गया
आलेख संजय पराते
रायपुर ACGN:- ‘नागरिक परिक्रमा’ शीर्षक से प्रकाशित अपनी राजनीतिक टिप्पणियों में वरिष्ठ किसान नेता और लेखक संजय पराते ने देश की मौजूदा आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों पर तीखी टिप्पणी की है। उन्होंने घरेलू और व्यावसायिक गैस सिलेंडरों की कीमतों में हुई हालिया वृद्धि और पुस्तकों पर लगाए जा रहे प्रतिबंधों के मुद्दे को उठाते हुए सरकार और संस्थाओं की नीतियों पर सवाल खड़े किए हैं।

लेख में कहा गया है कि केंद्र की भारत सरकार द्वारा घरेलू और व्यावसायिक गैस सिलेंडरों की कीमतों में हाल ही में वृद्धि की गई है। इसके अनुसार गैर सब्सिडी घरेलू गैस सिलेंडर की कीमत 924 रुपये से बढ़ाकर 984 रुपये कर दी गई है, वहीं व्यावसायिक गैस सिलेंडर 1923.50 रुपये से बढ़कर 2085.50 रुपये तक पहुंच गया है। उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों को मिलने वाला सिलेंडर भी 553 रुपये से बढ़कर 613 रुपये हो गया है। लेख में यह दावा किया गया है कि पिछले वर्षों में गैस की कीमतों में लगातार वृद्धि हुई है और इससे आम उपभोक्ताओं पर आर्थिक बोझ बढ़ा है।
टिप्पणी में यह भी कहा गया है कि बढ़ती महंगाई के बीच गैस की कीमतों में हुई बढ़ोतरी से मध्यम वर्ग और कामकाजी वर्ग पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा। लेखक का तर्क है कि यदि सरकार करों से प्राप्त होने वाले राजस्व का कुछ हिस्सा छोड़ देती तो कीमतों में इतनी वृद्धि से बचा जा सकता था।
अपने दूसरे हिस्से में लेखक ने पुस्तकों पर प्रतिबंध और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मुद्दे को उठाया है। लेख में कहा गया है कि विभिन्न समयों में कई किताबों पर प्रतिबंध लगाए गए हैं और इस तरह की कार्रवाइयों से बौद्धिक स्वतंत्रता और विचारों के आदान-प्रदान पर असर पड़ता है। उन्होंने कुछ चर्चित लेखकों की पुस्तकों के उदाहरण देते हुए कहा कि प्रतिबंधों के बावजूद लोगों की पढ़ने की रुचि समाप्त नहीं होती।

लेख में Supreme Court of India से जुड़े एक हालिया विवाद का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें शैक्षणिक पुस्तकों में न्यायपालिका के संदर्भों को लेकर बहस छिड़ी थी। लेखक का मत है कि संस्थाओं की विश्वसनीयता और पारदर्शिता को मजबूत करने के लिए खुली बहस और आलोचना को स्वीकार करना आवश्यक है।
‘नागरिक परिक्रमा’ के इस लेख में लेखक ने महंगाई, लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे विषयों पर अपने विचार प्रस्तुत करते हुए व्यापक सार्वजनिक विमर्श की आवश्यकता पर बल दिया है।

लेखक संजय पराते अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650
(यह एक राजनीतिक टिप्पणी है, जिसमें व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं।)
प्रदीप मिश्रा
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