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सच की तह तक

फाइलों में प्रशासन का गुलाल, राजनीति में भाषणों की पिचकारी – कोरबा की होली निराली

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अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ का होली विशेषांक

By ACGN 7647981711, 9303948009 

संपादकीय

फागुन में कोरबा — रंग, भांग और व्यवस्था का व्यंग्य

फागुन की मस्ती, रंगों की बरसात और भांग की तरंग के बीच कोरबा में होली का माहौल अलग ही रंग दिखा रहा है, जहां राजनीति, प्रशासन और जनता अपने-अपने अंदाज़ में फाग खेलते नजर आ रहे हैं। फागुन की हवा चली तो कोरबा में भी रंगों का मौसम आ गया। ढोल, नगाडा बजा, गुलाल उड़ा और चौक-चौराहों पर फाग गूंजने लगी। किसी ने ठीक ही कहा है “कोरबा की गलियों में रंग भी उड़ते हैं और वादे भी, कभी पिचकारी चलती है, कभी बैठकों में फाइलें भी।” 

जिले का प्रशासनिक अमला भी इस बार होली के रंग में कुछ ऐसा डूबा है कि हर विभाग अपनी-अपनी पिचकारी लेकर मैदान में खड़ा दिखाई देता है।

फागुन में कोरबा का फाइल पर्व जब मीटिंगों में उड़ता गुलाल

फागुन का महीना है, रंग उड़ रहे हैं, ढोलक बज रही है और कोरबा की व्यवस्था भी अपने ही अंदाज़ में होली मना रही है, कहते हैं “यहां रंग कम, मीटिंग ज्यादा उड़ती है, और फाइलों में ही विकास की पिचकारी चलती है।”

कलेक्टर साहब के दफ्तर में योजनाओं का गुलाल उड़ रहा है,

जिला पंचायत के सीईओ विकास की रंगोली सजाने में लगे हैं।

महिला एवं बाल विकास विभाग पोषण के रंग घोल रहा है, पर कभी-कभी आंगनबाड़ी की हकीकत ऐसे मुंह बना लेती है जैसे रंग में पानी ज्यादा पड़ गया हो

पीएचई विभाग की पिचकारी से पानी का वादा तो खूब निकलता है,पर कई मोहल्लों में नल ऐसे खामोश हैं जैसे होली खेलने से पहले ही रूठ गए हों

पीडब्ल्यूडी की सड़कें भी इस फागुन में कम रंगीन नहीं, गड्ढे ऐसे मुस्कुरा रहे हैं जैसे किसी ने सड़क पर अबीर की जगह मिट्टी का गुलाल उड़ा दिया हो।

नगर निगम के आयुक्त योजनाओं की बाल्टी लेकर शहर सजाने में लगे हैं, लेकिन कचरे के ढेर और नालों की बदबू कभी-कभी इस रंग में भंग डाल देती है।

जिला प्रशासन 

कोरबा जिले का प्रशासनिक अमला भी कम व्यस्त नहीं।सोमवार आते ही सबसे पहले जनदर्शन का रंग चढ़ता है। जनता अपनी समस्याओं की पोटली लेकर आती है और उम्मीद करती है कि इस बार उनकी समस्या का रंग भी बदलेगा। मंगलवार को टीएल बैठक की पिचकारी चलती है। फाइलों का गुलाल उड़ता है, निर्देशों की बारिश होती है और अधिकारी नोटबुक में रंग भरते रहते हैं। बुधवार और गुरुवार तक आते-आते ऑनलाइन मीटिंग का दौर शुरू हो जाता है। कभी वीडियो कॉन्फ्रेंस, कभी विभागीय समीक्षा- स्क्रीन पर चेहरे भी ऐसे लगते हैं जैसे सबने डिजिटल गुलाल लगा रखा हो। फिर शुक्रवार तक आते-आते पूरा हफ्ता मीटिंगों में ही रंग जाता है।किसी ने मज़ाक में कहा भी “सोमवार जनदर्शन में गया, मंगलवार टीएल में खो गया, बुध-गुरु ऑनलाइन में निकल गया, और शुक्रवार फाइलों में सो गया।” अब बचा शनिवार और रविवार…पर वहां भी आराम कहां, कभी कोई मंत्री आ जाते हैं, कभी कोई बड़ा अधिकारी, कभी कोई विशेष कार्यक्रम वीआईपी दौरे की तैयारी में पूरा अमला फिर से ड्यूटी में लग जाता है।तब कोई हल्की मुस्कान के साथ कह देता है “जब मीटिंग, ड्यूटी और दौरे खत्म हो जाएं, तो शायद थोड़ा समय विकास भी हो जाए।”फिर भी उम्मीद का रंग बना हुआ है। क्योंकि होली का यही संदेश है  रंगों में थोड़ा हंसी-मजाक भी हो,और काम का रंग भी शहर पर चढ़े।

पुलिस प्रशासन

होली के रंग में कोरबा का पुलिस प्रशासन भी पूरी तरह मुस्तैद है।कहीं रंग ज्यादा न चढ़ जाए और कहीं भांग का असर विवाद में न बदल जाए, इसी चिंता में पुलिस की गाड़ियां शहर में चक्कर लगा रही हैं। एसपी साहब की पिचकारी कानून-व्यवस्था पर टिकी है,और थानों में निर्देशों का गुलाल उड़ रहा है।

किसी ने मजाक में कहा भी “शहर में रंग उड़ रहा है, ढोलक बज रही है, और पुलिस की नजर हर गली पर सज रही है।” 

ताकि होली का रंग खुशियों में ही घुला रहे… और किसी की शरारत कानून की धार से ज्यादा रंगीन न हो जाए। 

पुलिस प्रशासन भी होली की चौकसी में लगा है,

एसपी साहब की पिचकारी कानून-व्यवस्था पर टिकी है ताकि रंगों का त्योहार विवाद का रंग न बन जाए।बुरा ना मानो होली है!

राजनीतिक गलियारे

 गोपाल मोदी — संगठन की ढोलक और राजनीति की फाग

भाजपा जिला अध्यक्ष गोपाल मोदी इन दिनों कोरबा की राजनीति में ऐसे दिखाई देते हैं जैसे फाग मंडली के मुख्य गायक। ढोलक की थाप उनके पास है और कार्यकर्ताओं की टोली पीछे-पीछे।

बैठकों में विकास का गुलाल उड़ता है और मंचों पर जोश का रंग चढ़ता है।

पर विपक्ष हल्की मुस्कान के साथ कहता है “मोदी जी रंग तो खूब उड़ाते हैं, बस जनता की झोली में थोड़ा और रंग गिरा दें तो होली पूरी हो जाए।”

जोगेश लांबा – तंज की पिचकारी के उस्ताद

कांग्रेस के पूर्व महापौर जोगेश लांबा कोरबा की राजनीति के ऐसे खिलाड़ी हैं जिनकी पिचकारी में हमेशा तंज का रंग भरा रहता है। वे जब बोलते हैं तो ऐसा लगता है जैसे फाग गाई जा रही हो 

“रंग उड़ रहे हैं मंचों पर, विकास के ढोल बज रहे,

पर शहर की गलियों में लोग अब भी गड्ढों से लड़ रहे।”उनके समर्थक कहते हैं कि लांबा की फाग में मिठास भी है और मिर्च भी।

महापौर संजू देवी राजपूत – विकास की रंगोली

नगर निगम की कमान संभाल रही महापौर संजू देवी राजपूत इन दिनों शहर को सजाने में जुटी हैं।

उनके समर्थक कहते हैं  “महापौर जी रंगों से शहर सजाने निकली हैं,बस कुछ गली-मोहल्लों तक रंग पहुंचना बाकी है।”

विपक्ष तंज करता है “रंग की बाल्टी तो बड़ी है, पर पिचकारी थोड़ी तेज चलनी चाहिए।” फिर भी महापौर की टोली का कहना है कि कोरबा की तस्वीर बदलने का रंग धीरे-धीरे चढ़ रहा है।

हितानंद अग्रवाल 

वहीं हितानंद अग्रवाल भी कोरबा की राजनीति में फागुन की इस हलचल में अपने अंदाज़ से चर्चा में रहते हैं।कभी बयान से, कभी उपस्थिति से  उनका रंग भी इस राजनीतिक होली में अलग ही नजर आता है।

जय सिंह अग्रवाल – अनुभव की पुरानी फाग

कोरबा की राजनीति में पूर्व राजस्व मंत्री और पूर्व विधायक जय सिंह अग्रवाल का नाम किसी पुराने फाग गीत की तरह है  जो सालों बाद भी गूंजता रहता है।उनके समर्थक कहते हैं “राजनीति की इस होली में रंग बदलते रहते हैं,पर जय सिंह का रंग अब भी गहरा दिखाई देता है।”वहीं विरोधी मुस्कुराकर कहते हैं “फागुन हर साल आता है,देखना है इस बार रंग किस पर ज्यादा चढ़ता है।”

पूर्व महापौर रेनू अग्रवाल 

कांग्रेस की पूर्व महापौर रेणु अग्रवाल भी राजनीति की इस फाग मंडली में अपने रंग के साथ मौजूद हैं। समर्थक कहते हैं कि उनके कार्यकाल की यादें अभी भी शहर की गलियों में रंग की तरह दिख जाती हैं।

पूर्व महापौर राजकिशोर प्रसाद 

कांग्रेस के पूर्व महापौर राजकिशोर प्रसाद की फाग भी अपने अलग अंदाज़ में चलती है। अनुभव की थाप पर वे कभी याद दिलाते हैं कि शहर की होली सिर्फ रंगों से नहीं, विकास से भी चमकनी चाहिए।

मुकेश राठौर जिलाध्यक्ष कांग्रेस

कांग्रेस जिला अध्यक्ष मुकेश राठौर भी फागुन की राजनीति में पीछे नहीं, उनकी पिचकारी में सवालों का रंग भरा रहता है और मंच से अक्सर सत्ता के रंग पर हल्का सा तंज भी उड़ जाता है।

बाकी रंगों की टोली नगर निगम के 67 पार्षद भी इस फागुन की टोली में पीछे नहीं।

कोई विकास का गुलाल उड़ा रहा है, कोई वादों की पिचकारी चला रहा है। कोई अपना जुगाड़ लगा रहा है जनता चौपाल में बैठकर मुस्कुरा कर कहती है “नेताओं की होली हर साल रंगीन होती है, बस हमारी गली की होली थोड़ी कम चमकती है।”

 अंत में जनता की फाग

फागुन है, रंग है, भांग है, और राजनीति की मिठास में हल्की मिर्च भी, रंग का नशा है, भांग का नशा है, गुलाल में पूरा शहर डूबा है।कोई वादों से रंग रहा, कोई भाषण से, कोरबा की होली में हर चेहरा रंगा हुआ है। और अंत में बस इतना ही बुरा ना मानो होली है!

रंगों के इस पावन पर्व पर कोरबा जिले के सभी जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों और नागरिकों को होली की हार्दिक शुभकामनाएं। हंसी रहे, रंग रहे, और शहर भी विकास के रंग में सजे  यही कामना।

आखिर में बस इतना ही कि रंग का नशा, भांग का नशा, गुलाल में पूरा माहौल डूबा है… अगर किसी को व्यंग्य में मिर्च लगे तो मुस्कुरा देना क्योंकि… बुरा ना मानो होली है!

यह लेख सिर्फ रंग के नशे और भंग के नशे में लिखा गया हल्की तरंग के साथ का गया एक व्यंग है इसे दिल पर न लें, मुस्कुराकर पढ़ें और हंसी में उड़ा दें… क्योंकि आखिर मैं फिर एक बार बुरा ना मानो होली है जोगीरा सा रा रा

 प्रदीप मिश्रा – संपादक

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