उदंती-सीतानदी में दुर्लभ हॉर्नबिल संरक्षण की विशेष पहल
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रायपुर (छत्तीसगढ़)
By ACGN 7647981711, 9303948009
प्राकृतिक “हॉर्नबिल रेस्टोरेंट” विकसित कर जैव विविधता को मिलेगा नया संबल
रायपुर | ACGN:- छत्तीसगढ़ के उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में दुर्लभ मालाबार पाइड हॉर्नबिल के संरक्षण को लेकर एक अनूठी और दूरदर्शी पहल शुरू की गई है। जंगल के इन आकर्षक और विशालकाय पक्षियों के लिए प्राकृतिक उद्यान विकसित किए जा रहे हैं, जिन्हें “हॉर्नबिल रेस्टोरेंट” के रूप में तैयार किया जाएगा। यह पहल न केवल इन पक्षियों के संरक्षण की दिशा में मील का पत्थर साबित होगी, बल्कि राज्य की समृद्ध जैव विविधता को भी नया जीवन देगी।
हॉर्नबिल अपने बड़े आकार, लंबी और मजबूत चोंच, रंगीन पंखों और विशिष्ट आवाज के कारण दूर से ही पहचान में आ जाते हैं। इनकी घोंसला बनाने की अनोखी शैली भी इन्हें अन्य पक्षियों से अलग बनाती है। मादा हॉर्नबिल अंडे देने के बाद पेड़ के खोखले हिस्से में स्वयं को बंद कर लेती है और नर पक्षी बाहर से भोजन पहुंचाता है। इस कारण इनके लिए सुरक्षित और मजबूत पेड़ों की उपलब्धता बेहद जरूरी होती है।

वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री केदार कश्यप के मार्गदर्शन तथा प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) अरुण कुमार पाण्डेय के नेतृत्व में उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में यह संरक्षण अभियान गति पकड़ रहा है। इसके तहत किसी तरह का कृत्रिम ढांचा नहीं बनाया जाएगा, बल्कि जंगल और आसपास के क्षेत्रों में पीपल, बरगद और फाइकस प्रजाति के फलदार वृक्षों का प्राकृतिक समूह विकसित किया जाएगा। ये वृक्ष हॉर्नबिल के प्रमुख आहार स्रोत हैं और वर्ष भर उन्हें पर्याप्त भोजन उपलब्ध कराएंगे।
हॉर्नबिल को “जंगल का किसान” और “फॉरेस्ट इंजीनियर” भी कहा जाता है, क्योंकि ये फल खाने के बाद बीजों को दूर-दूर तक फैलाते हैं, जिससे नए पौधों का अंकुरण होता है और वनों का प्राकृतिक विस्तार होता है। यही कारण है कि इनका संरक्षण पूरे वन तंत्र की सेहत से जुड़ा हुआ है।
उल्लेखनीय है कि सामान्यतः पश्चिमी घाट में पाए जाने वाले मालाबार पाइड हॉर्नबिल अब उदंती-सीतानदी की हरियाली और अनुकूल जलवायु के कारण यहां अधिक संख्या में दिखाई देने लगे हैं। पहले जहां इनका दर्शन कभी-कभार होता था, वहीं अब सप्ताह में दो से तीन बार इनकी उपस्थिति दर्ज की जा रही है। समुद्र तल से लगभग 800 से 1000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह पहाड़ी क्षेत्र इन पक्षियों के लिए उपयुक्त आवास सिद्ध हो रहा है।
इनकी सुरक्षा और निगरानी के लिए विशेष ट्रैकिंग टीमें गठित की गई हैं। वन्यजीव विशेषज्ञों के साथ स्थानीय प्रशिक्षित युवाओं को भी इस अभियान से जोड़ा गया है। घोंसलों की नियमित निगरानी, कृत्रिम घोंसलों की स्थापना, अनुसंधान और “घोंसला गोद लेने” जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से स्थानीय समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित की जा रही है। साथ ही ड्रोन तकनीक के जरिए शिकार गतिविधियों और वनाग्नि पर कड़ी नजर रखी जा रही है।
यह पहल पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ ईको-टूरिज्म को भी बढ़ावा देगी। पर्यटक सुरक्षित दूरी से इन दुर्लभ पक्षियों को प्राकृतिक परिवेश में देख सकेंगे, जिससे क्षेत्र की जैव विविधता के प्रति जागरूकता और संवेदनशीलता बढ़ेगी। उदंती-सीतानदी में विकसित हो रहा यह प्राकृतिक “हॉर्नबिल रेस्टोरेंट” छत्तीसगढ़ की पर्यावरणीय प्रतिबद्धता और वन्यजीव संरक्षण की दिशा में एक प्रेरणादायक कदम माना जा रहा है।
प्रदीप मिश्रा
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