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मेडिकल छात्रों की एकजुटता के आगे बदली पीजी सीट नीति, सरकार को करना पड़ा संशोधन

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बिलासपुर, छत्तीसगढ़

By ACGN 7647981711, 9303948009

हाईकोर्ट के आदेश के बाद राजपत्र में बदलाव, स्वास्थ्य विभाग की भूमिका पर उठे सवाल

बिलासपुर – ACGN :- छत्तीसगढ़ के शासकीय मेडिकल कॉलेजों की पीजी सीटों को लेकर चल रहा विवाद अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार माननीय हाई कोर्ट बिलासपुर के आदेश के अनुपालन में राज्य सरकार ने देर शाम राजपत्र में संशोधन प्रकाशित किया है। संशोधन के बाद ऑल इंडिया कोटा की 50 प्रतिशत सीटें छोड़ने के पश्चात शेष 50 प्रतिशत राज्य कोटे की पीजी सीटों को नीट पीजी की मेरिट के आधार पर छत्तीसगढ़ राज्य के शासकीय मेडिकल कॉलेजों से उत्तीर्ण विद्यार्थियों एवं सुदूर आदिवासी अंचलों में सेवा दे रहे इन-सर्विस डॉक्टरों के लिए मेरिट आधारित रूप से सुरक्षित कर दिया गया है।
मेडिकल छात्र संगठनों ने इस फैसले को अपनी एकजुटता, आंदोलन और कानूनी लड़ाई की पहली बड़ी सफलता बताया है। छात्रों का कहना है कि यदि वे सड़क और अदालत दोनों स्तरों पर मजबूती से खड़े नहीं होते, तो छत्तीसगढ़ी छात्रों के अधिकारों पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता था। उनके अनुसार यह निर्णय न्यायालय के हस्तक्षेप और छात्रों के दबाव का परिणाम है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार इस पूरे घटनाक्रम में स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल की भूमिका को लेकर सवाल लगातार उठ रहे हैं। मेडिकल छात्र संगठनों का आरोप है कि जिस नीति को लागू कराने पर सरकार अडिग थी, वह छत्तीसगढ़ी छात्रों के हितों के विपरीत थी और वही नीति न्यायालय की सख्ती के बाद टिक नहीं सकी। छात्रों का कहना है कि अंततः सरकार को नीति में बदलाव करना पड़ा, जिससे स्वास्थ्य विभाग की नीति निर्माण प्रक्रिया और पारदर्शिता पर सवाल खड़े हुए हैं।
हालांकि शासकीय मेडिकल कॉलेजों की राज्य कोटा सीटों को लेकर राहत मिली है, लेकिन विवाद के दो अहम मुद्दे अभी भी शेष बताए जा रहे हैं। छात्र संगठनों के अनुसार राज्य के प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की 50 प्रतिशत पीजी सीटें छत्तीसगढ़ के बाहर के छात्रों के लिए खुली रखी गई हैं, जिससे राज्य के विद्यार्थियों के अवसर प्रभावित हो सकते हैं। वहीं एम्स रायपुर के छात्रों को भी छत्तीसगढ़ राज्य कोटे में पात्रता दिए जाने पर आपत्ति जताई जा रही है। छात्रों का कहना है कि राज्य कोटे का मूल उद्देश्य छत्तीसगढ़ के मेडिकल कॉलेजों से पढ़े छात्रों को प्राथमिकता देना है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार इस विवाद में पर्दे के पीछे निजी मेडिकल कॉलेजों से जुड़ा एक बड़ा पहलू भी सामने आ रहा है। बताया जा रहा है कि प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की पीजी सीटें जो पहले पूरी तरह छत्तीसगढ़ी छात्रों के लिए मानी जाती थीं, उन्हें प्रभावशाली लॉबी के दबाव में बाहरी छात्रों के लिए आंशिक रूप से खोल दिया गया। विरोध तेज होने के बाद सरकार को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में पुनः रिवीजन एडमिशन प्रक्रिया दाखिल करनी पड़ी।
छात्र संगठनों का यह भी आरोप है कि निजी मेडिकल कॉलेजों द्वारा निर्धारित फीस से अधिक राशि वसूली जा रही है और प्रशिक्षण के नाम पर अतिरिक्त शुल्क, शपथ पत्र तथा ग्रामीण चिकित्सा बॉन्ड जैसी शर्तें कथित रूप से छात्रों पर थोपी जा रही हैं। छात्रों का कहना है कि यह पूरे सिस्टम में व्याप्त अव्यवस्था और दबाव की ओर इशारा करता है, जिससे स्वास्थ्य विभाग की भूमिका पर संदेह गहराता जा रहा है।
इस पूरे प्रकरण ने स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली को भी सवालों के घेरे में ला दिया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार छत्तीसगढ़ के 25 वर्षों के इतिहास में पहली बार पीजी प्रवेश के लिए तीसरी बार काउंसलिंग करानी पड़ेगी, जिसे विभागीय योजना की कमजोरी और प्रशासनिक अव्यवस्था से जोड़ा जा रहा है। छात्रों का कहना है कि हाई कोर्ट में कभी भी कोटा निर्धारण का प्रतिशत स्पष्ट रूप से तय नहीं किया गया, इसके बावजूद प्रवेश प्रक्रिया में लगातार बाहरी छात्रों के लिए रास्ते खोले जाते रहे।
प्रदेशभर के जूनियर डॉक्टरों और मेडिकल छात्रों ने स्पष्ट किया है कि यह आंदोलन यहीं समाप्त नहीं होगा। उनका कहना है कि जब तक प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में छत्तीसगढ़ी छात्रों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित नहीं होती और एम्स रायपुर की पात्रता को लेकर स्पष्ट नीति नहीं बनती, तब तक आंदोलन और कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। छात्रों ने कहा है कि यह मामला केवल सीटों का नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के मेडिकल विद्यार्थियों के भविष्य और अधिकारों से जुड़ा हुआ है।

प्रदीप मिश्रा
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