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1500 साल पुराने सिरपुर पर दुनिया की नजर, विश्व धरोहर बनने की राह खुली

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         सिरपुर को मिली वैश्विक पहचान की दस्तक
महासमुंद, छत्तीसगढ़
By ACGN – 7647981711, 9303948009

यूनेस्को की अस्थायी सूची में शामिल हुआ छत्तीसगढ़ का ऐतिहासिक सिरपुर, लक्ष्मण मंदिर से बौद्ध विहारों तक समेटे है प्राचीन दक्षिण कोसल की अद्भुत विरासत।


महासमुंद ACGN:- महानदी के तट पर सदियों से इतिहास की अनमोल परतों को अपने भीतर समेटे सिरपुर ने अब वैश्विक पहचान की दिशा में बड़ा कदम बढ़ाया है। छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में स्थित यह प्राचीन सांस्कृतिक नगरी संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन यानी यूनेस्को की विश्व धरोहर की अस्थायी सूची में शामिल हो गई है। सिरपुर का यह ऐतिहासिक पड़ाव छत्तीसगढ़ की पुरातात्विक, सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
प्राचीन मंदिरों, बौद्ध विहारों, दुर्लभ मूर्तिकला, अद्भुत स्थापत्य और विभिन्न धार्मिक परंपराओं के सहअस्तित्व के लिए प्रसिद्ध सिरपुर अब विश्व धरोहर का दर्जा पाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार ऐतिहासिक और पुरातात्विक धरोहरों के संरक्षण तथा उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर स्थापित करने के प्रयास कर रही है। पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल के मार्गदर्शन में भी प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक पहचान दिलाने और पर्यटन की संभावनाओं को विस्तार देने पर जोर दिया जा रहा है।
सिरपुर की इस उपलब्धि को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह केवल प्राचीन इमारतों का समूह नहीं, बल्कि लगभग डेढ़ हजार वर्षों के राजनीतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और स्थापत्य इतिहास को अपने भीतर समेटे हुए है। प्राचीन काल में श्रीपुर के नाम से प्रसिद्ध सिरपुर पाण्डुवंशी शासनकाल में दक्षिण कोसल की राजधानी रहा। महानदी के किनारे बसे इस नगर ने कभी राजनीतिक, धार्मिक, व्यापारिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के प्रमुख केंद्र के रूप में पहचान बनाई थी।
सिरपुर की प्राचीनता के प्रमाण शरभपुरीय शासकों प्रवरराज और महासुदेवराज के ताम्रपत्रों से भी मिलते हैं। पाण्डुवंशी शासक महाशिवगुप्त बालार्जुन के लगभग 57 वर्षों के शासनकाल में इस क्षेत्र ने स्थापत्य और सांस्कृतिक विकास की नई ऊंचाइयां हासिल कीं। इसी दौर में अनेक मंदिर, बौद्ध विहार, सरोवर और उद्यान बनाए गए।
सातवीं शताब्दी में प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी सिरपुर की यात्रा की थी। उनके यात्रा विवरण में इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म की समृद्ध परंपरा का उल्लेख मिलता है। उस समय यहां बड़ी संख्या में बौद्ध संघाराम और भिक्षुओं की उपस्थिति बताई गई है। सिरपुर की सबसे बड़ी विशेषताओं में शैव, वैष्णव, बौद्ध और जैन परंपराओं का एक साथ विकसित होना शामिल है।
महाशिवगुप्त बालार्जुन स्वयं शैव मत के अनुयायी थे, लेकिन उन्होंने बौद्ध विहारों को भी संरक्षण और दान दिया। यही धार्मिक सहिष्णुता और सांस्कृतिक समन्वय सिरपुर को प्राचीन भारत के विशिष्ट केंद्रों में स्थान देता है।


           लक्ष्मण मंदिर बना स्थापत्य का अमिट प्रमाण
सिरपुर का लक्ष्मण मंदिर यहां की सबसे चर्चित ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल है। लगभग सातवीं शताब्दी में निर्मित यह मंदिर प्राचीन भारतीय ईंट स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। लगभग सात फुट ऊंची पाषाण निर्मित जगती पर बने इस पंचरथ शैली के मंदिर में गर्भगृह, अंतराल और मंडप की संरचना दिखाई देती है।
मंदिर की बाहरी दीवारों पर चैत्य गवाक्ष, गज, कीर्तिमुख, भारवाहक गण और विभिन्न अलंकरणात्मक आकृतियों का बारीक अंकन है। प्रवेश द्वार पर शेषशायी भगवान विष्णु की प्रतिमा और विष्णु के विभिन्न अवतारों तथा कृष्ण लीला से जुड़े प्रसंगों की कलात्मक प्रस्तुति इसे खास बनाती है।
ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार मंदिर का निर्माण महाशिवगुप्त बालार्जुन की माता रानी वासटा ने अपने दिवंगत पति हर्षगुप्त की स्मृति में कराया था। इसका निर्माणकाल लगभग 650 ईस्वी माना जाता है।


          महानदी किनारे आस्था और इतिहास का संगम
सिरपुर का गंधेश्वर महादेव मंदिर भी धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। महानदी के तट पर स्थित यह मंदिर प्राचीन काल में गंधर्वेश्वर के नाम से जाना जाता था। मंदिर परिसर में अनेक कलात्मक प्रतिमाएं और पुरातात्विक अवशेष मौजूद हैं।
मंदिर के निर्माण में पुराने मंदिरों और बौद्ध विहारों से प्राप्त स्थापत्य खंडों के उपयोग के प्रमाण भी मिलते हैं। यहां की प्रतिमाएं और शिल्प तत्कालीन धार्मिक जीवन और कला परंपरा की महत्वपूर्ण झलक प्रस्तुत करते हैं।
               बौद्ध विरासत ने बढ़ाया सिरपुर का महत्व
सिरपुर कभी महायान बौद्ध धर्म का प्रमुख केंद्र रहा। पुरातात्विक उत्खननों में यहां कई बौद्ध विहारों के अवशेष सामने आए हैं। आनंदप्रभु कुटी विहार और स्वास्तिक विहार इनमें विशेष महत्व रखते हैं।
आनंदप्रभु कुटी विहार में भिक्षुओं के निवास के लिए 14 कक्ष होने के प्रमाण मिले हैं। दो मंजिला संरचना वाले इस विहार के मुख्य कक्ष में भूमिस्पर्श मुद्रा में भगवान बुद्ध की लगभग साढ़े छह फुट ऊंची प्रतिमा प्राप्त हुई है। यहां अवलोकितेश्वर सहित अन्य बौद्ध प्रतिमाएं भी मिली हैं।
स्वास्तिक विहार अपनी विशिष्ट तल योजना के लिए जाना जाता है। इन विहारों के अवशेष बताते हैं कि सिरपुर केवल धार्मिक केंद्र ही नहीं था, बल्कि अध्ययन, अध्यापन और आध्यात्मिक गतिविधियों का भी महत्वपूर्ण केंद्र रहा होगा।


तीवरदेव महाविहार ने खोली प्राचीन बौद्ध स्थापत्य की परत
वर्ष 2002-03 में डॉ. अरुण कुमार शर्मा के निर्देशन में हुए उत्खनन में विशाल तीवरदेव महाविहार के अवशेष मिले। लगभग 902 वर्गमीटर क्षेत्र में फैला यह महाविहार दक्षिण कोसल की बौद्ध स्थापत्य परंपरा का महत्वपूर्ण प्रमाण माना जाता है।
महाविहार के प्रवेश द्वार पर पशु आकृतियों, पंचतंत्र की कथाओं और तत्कालीन सामाजिक जीवन से जुड़े दृश्य अंकित हैं। परिसर में भूमिगत जल निकासी व्यवस्था और सुव्यवस्थित कक्षों के अवशेष भी मिले हैं, जो उस समय की निर्माण तकनीक और नगर नियोजन की उन्नत समझ को दर्शाते हैं।
सुरंग टीला और प्राचीन राम मंदिर भी सिरपुर की स्थापत्य विरासत में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। सुरंग टीला की संरचना, सीढ़ियां और मंदिर अवशेष तत्कालीन स्थापत्य परंपरा की जानकारी देते हैं। वहीं राम मंदिर की ताराकृति योजना और ईंटों से निर्मित संरचना इसे पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाती है।
     दो हजार से ज्यादा पुरावशेषों ने खोले इतिहास के राज
सिरपुर में हुए विभिन्न पुरातात्विक उत्खननों से दो हजार से अधिक पुरावशेष प्राप्त होने की जानकारी सामने आई है। इनमें धातु प्रतिमाएं, प्रतिमा फलक, आभूषण निर्माण के उपकरण, लोहे के बर्तन, ताले, जंजीर, दीपक, पूजा पात्र, मिट्टी के घड़े, कांच की चूड़ियां, पकी मिट्टी की मुहरें, खिलौने और प्राचीन सिक्के शामिल हैं।
यहां मिला चीनी सिक्का भी ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके अलावा शरभपुरीय शासक प्रसन्नमात्र और कलचुरी शासक रत्नदेव के काल से जुड़े सिक्कों के मिलने से सिरपुर के प्राचीन व्यापारिक और आर्थिक संपर्कों की जानकारी मिलती है।
सातवीं और आठवीं शताब्दी में सिरपुर धातु मूर्तिकला का भी महत्वपूर्ण केंद्र रहा। यहां से भगवान बुद्ध, अवलोकितेश्वर, पद्मपाणि, वज्रपाणि, मंजुश्री, तारा, ऋषभनाथ और भगवान विष्णु की धातु प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं। इन प्रतिमाओं की बारीक मुखाकृति, भावभंगिमा, हस्त मुद्राएं और अलंकरण तत्कालीन शिल्पकारों की असाधारण कला का प्रमाण देते हैं।
       संग्रहालय में सुरक्षित है सिरपुर का अनमोल अतीत
लक्ष्मण मंदिर परिसर में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा स्थापित संग्रहालय में सिरपुर से प्राप्त अनेक दुर्लभ प्रतिमाएं और स्थापत्य खंड संरक्षित हैं। यहां शैव, वैष्णव, बौद्ध और जैन परंपराओं से संबंधित कलाकृतियां मौजूद हैं।
चतुर्मुख शिवलिंग, महिषासुरमर्दिनी, नृसिंह, अंबिका, चामुंडा, विष्णु, सूर्य, मातृका, जैन तीर्थंकर और भगवान बुद्ध की प्रतिमाएं यहां की कला विविधता को सामने लाती हैं। इन कलाकृतियों में तत्कालीन धार्मिक आस्था के साथ-साथ शिल्पकला की उत्कृष्टता भी दिखाई देती है।
             राजमहल के अवशेषों ने बढ़ाया रहस्य
महानदी के किनारे वर्ष 2000-01 में हुए उत्खनन में एक विशाल परिसर के अवशेष मिले, जिन्हें राजमहल के अवशेषों के रूप में पहचाना गया। यहां भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की महत्वपूर्ण प्रतिमाएं भी प्राप्त हुईं। बाद के उत्खननों में कई मंदिरों, विहारों और अन्य संरचनाओं के अवशेष सामने आए, जिससे सिरपुर की प्राचीन नगरी की व्यापकता और समृद्धि का अंदाजा मिलता है।
  यूनेस्को की सूची से पर्यटन को मिल सकती है नई उड़ान
सिरपुर का यूनेस्को की अस्थायी सूची में शामिल होना छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक और पुरातात्विक पर्यटन के लिए महत्वपूर्ण अवसर माना जा रहा है। इससे देश-विदेश के पर्यटकों, इतिहासकारों, पुरातत्वविदों, शोधकर्ताओं और बौद्ध धर्म के अनुयायियों का आकर्षण बढ़ने की संभावना है।
पर्यटन गतिविधियों के विस्तार से स्थानीय स्तर पर होटल, होमस्टे, परिवहन, हस्तशिल्प, स्थानीय खानपान और अन्य रोजगारमूलक गतिविधियों को भी गति मिल सकती है। सिरपुर की बौद्ध विरासत अंतरराष्ट्रीय बौद्ध पर्यटन परिपथ से जुड़ने की क्षमता रखती है, जबकि शैव, वैष्णव, बौद्ध और जैन परंपराओं का ऐतिहासिक सहअस्तित्व इसे सांस्कृतिक पर्यटन के लिए और विशिष्ट बनाता है।
हालांकि यूनेस्को की अस्थायी सूची में शामिल होना विश्व धरोहर का अंतिम दर्जा नहीं है। इसके बाद निर्धारित मानकों के अनुरूप विस्तृत नामांकन, संरक्षण प्रबंधन और मूल्यांकन जैसी प्रक्रियाएं पूरी करनी होती हैं। इसके बावजूद सिरपुर का इस सूची में पहुंचना विश्व धरोहर की दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है।
महानदी के तट पर सदियों से इतिहास को संजोए सिरपुर अब वैश्विक पहचान की नई दहलीज पर खड़ा है। लक्ष्मण मंदिर की ईंटों से लेकर बौद्ध विहारों के अवशेषों तक और दुर्लभ धातु प्रतिमाओं से लेकर प्राचीन सिक्कों तक, सिरपुर का हर अवशेष छत्तीसगढ़ के उस गौरवशाली अतीत की कहानी कहता है, जिसकी गूंज अब दुनिया तक पहुंचने लगी है।


प्रदीप मिश्रा
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