“नवरात्रि में माँ की आराधना, फिर विरासत की अनदेखी क्यों?”
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संपादकीय
अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ साप्ताहिक विशेषांक
✍️ कलम की धार ✍️
कलम की धार केवल समाचार लिखने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज को आईना दिखाने, इतिहास की परतें खोलने और जनमानस को अपनी संस्कृति के प्रति जागरूक करने का एक प्रयास है। हमारा उद्देश्य किसी की आस्था को ठेस पहुँचाना नहीं, बल्कि आस्था के वास्तविक अर्थ को समझाना, अपनी विरासत का महत्व बताना और उन सवालों को सामने लाना है, जिन पर अक्सर उत्सवों के शोर में चर्चा नहीं हो पाती। हमारी कलम का प्रयास है कि पाठक केवल पढ़कर आगे न बढ़ें, बल्कि अपनी संस्कृति, अपने कर्तव्यों और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के बारे में सोचने के लिए भी प्रेरित हों।
आज का विषय: नवरात्रि, नवदुर्गा,छत्तीसगढ़ की देवी परंपरा और हमारी बदलती सोच
भारत की संस्कृति में नवरात्रि केवल नौ दिनों का पर्व नहीं, बल्कि शक्ति, साधना, संयम, नारी सम्मान और आत्मशुद्धि का संदेश देने वाला महापर्व है। इन नौ दिनों में घर-घर में माँ दुर्गा का स्वागत होता है, मंदिरों में घंटियाँ गूँजती हैं, ज्योति कलश प्रज्वलित किए जाते हैं और भक्त माँ के चरणों में शीश झुकाकर सुख, शांति, समृद्धि तथा जनकल्याण की कामना करते हैं। लेकिन इसी पावन अवसर पर एक सवाल भी हमारे सामने खड़ा है, क्या हम माँ की आराधना के वास्तविक अर्थ को समझ रहे हैं, या हमारी आस्था धीरे-धीरे दिखावे, प्रतिस्पर्धा और भव्यता की दौड़ में उलझती जा रही है?
इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए हमें अपनी संस्कृति के इतिहास में लौटना होगा। हमें जानना होगा कि हमारे पूर्वज देवी की पूजा क्यों करते थे, छत्तीसगढ़ के पुराने गढ़ों और रियासतों में कुलदेवियों का क्या महत्व था, हमारे प्राचीन देवी मंदिरों की पहचान क्या है और आज हम अपनी इस विरासत को बचाने के लिए क्या कर रहे हैं।
नवदुर्गा के नौ स्वरूप: नौ दिनों की पूजा, जीवनभर के संस्कार
नवरात्रि में माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना की जाती है – माँ शैलपुत्री, माँ ब्रह्मचारिणी, माँ चंद्रघंटा, माँ कूष्मांडा, माँ स्कंदमाता, माँ कात्यायनी, माँ कालरात्रि, माँ महागौरी और माँ सिद्धिदात्री। ये नौ स्वरूप हमें साहस, तपस्या, विवेक, सृजन, मातृत्व, शक्ति, निर्भयता, पवित्रता और सिद्धि जैसे गुणों का महत्व समझाते हैं।
माँ ब्रह्मचारिणी संयम और साधना की प्रेरणा देती हैं। माँ कालरात्रि भय और अन्याय के सामने डटकर खड़े होने का संदेश देती हैं। माँ महागौरी पवित्रता और सद्भाव की याद दिलाती हैं, जबकि माँ सिद्धिदात्री आध्यात्मिक उन्नति और सिद्धि की प्रतीक हैं। कन्या पूजन हमें यह भी समझाता है कि जिस देवी की हम मंदिर में पूजा करते हैं, उसी शक्ति का सम्मान हमें अपने घर और समाज की बेटियों तथा महिलाओं के प्रति भी करना चाहिए।
यदि नौ दिनों की पूजा के बाद भी हमारे व्यवहार में महिलाओं के प्रति असम्मान, समाज में भेदभाव और जरूरतमंदों के प्रति उदासीनता बनी रहती है, तो हमें अपनी आराधना के वास्तविक उद्देश्य पर विचार करना चाहिए। माँ की पूजा केवल फूल, नारियल और चुनरी चढ़ाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए; वह हमारे विचारों और कर्मों में भी दिखाई देनी चाहिए।
छत्तीसगढ़: 36 गढ़ों की ऐतिहासिक परंपरा और देवी आराधना की गौरवगाथा
छत्तीसगढ़ की पहचान यहाँ की प्राचीन सभ्यता, ऐतिहासिक गढ़ों, राजवंशों, जनजातीय संस्कृति और देवी-देवताओं के प्रति अटूट आस्था से जुड़ी हुई है। छत्तीसगढ़ नाम की उत्पत्ति को लेकर प्रचलित एक मान्यता इसे 36 गढ़ों से जोड़ती है। ऐतिहासिक विवरणों में रतनपुर और रायपुर जैसे प्रमुख केंद्रों के साथ अनेक पुराने गढ़ों और प्रशासनिक क्षेत्रों का उल्लेख मिलता है।
एक प्रचलित पारंपरिक सूची में इन 36 गढ़ों या पुराने प्रशासनिक क्षेत्रों के नाम इस प्रकार मिलते हैं:
रतनपुर, विजयपुर, खरौद, मारो, कौटगढ़, नवागढ़, सोंढी, औखर, पदरभट्ठा, सेमरिया, चांपा, लाफा, छुरी, केन्दा, मटिन, अपरौरा, पेंड्रा, कुरकुटी-कांद्री, रायपुर, पाटन, सिमगा, सिंगारपुर, लवन, ओमेरा, दुर्ग, सरधा, सिरसा, मेहंदी, खल्लारी, सिरपुर, फिंगेश्वर, राजिम, सिंघनगढ़, सुवरमर, तेंगनागढ़ और अकलतरा।
यह सूची पुराने गढ़ों और प्रशासनिक क्षेत्रों की एक ऐतिहासिक परंपरा पर आधारित है। इतिहासकारों के बीच छत्तीसगढ़ नाम की उत्पत्ति और गढ़ों की वास्तविक संख्या को लेकर मतभेद रहे हैं।
इन पुराने गढ़ों का महत्व केवल राजनीतिक व्यवस्था तक सीमित नहीं था। इनके साथ स्थानीय शासकों, किलों, मंदिरों, ग्रामदेवियों और धार्मिक परंपराओं का इतिहास भी जुड़ा हुआ है। लेकिन प्रत्येक गढ़ के साथ किसी विशेष देवी या राजा का संबंध स्थापित करने के लिए अलग ऐतिहासिक प्रमाण आवश्यक हैं। हमारी संस्कृति के प्रति सच्चा सम्मान यही है कि हम इतिहास को श्रद्धा के साथ-साथ प्रमाणों के आधार पर भी समझें।
राजपरिवारों की कुलदेवियाँ: राज्य की रक्षा और जनकल्याण की आस्था
पुराने छत्तीसगढ़ में अनेक राजपरिवार अपनी कुलदेवी की विशेष आराधना करते थे। देवी को परिवार की रक्षक, राज्य की संरक्षिका और जनकल्याण की प्रतीक मानने की परंपरा कई क्षेत्रों में प्रचलित रही। राजकीय उत्सवों, दशहरा, नवरात्रि, राज्याभिषेक और अन्य मांगलिक अवसरों पर देवी की पूजा का विशेष महत्व होता था।
बस्तर में माँ दंतेश्वरी की आराधना राजपरंपरा और प्रसिद्ध बस्तर दशहरा से गहराई से जुड़ी है। रतनपुर में माँ महामाया की परंपरा कलचुरी राजवंश के ऐतिहासिक केंद्र से जुड़ी हुई है। डोंगरगढ़ की माँ बम्लेश्वरी और अन्य प्राचीन देवी धाम भी क्षेत्रीय आस्था की महत्वपूर्ण पहचान हैं।
हालाँकि सभी प्राचीन मंदिर किसी राजा द्वारा स्थापित नहीं किए गए थे और सभी देवियाँ किसी राजपरिवार की कुलदेवी नहीं थीं। कहीं इतिहास में राजकीय संबंधों के प्रमाण मिलते हैं, तो कहीं मंदिरों की परंपरा स्थानीय लोकविश्वासों और सामुदायिक आराधना से विकसित हुई है।
छत्तीसगढ़ की प्रमुख देवियाँ और उनके प्रसिद्ध मंदिर
छत्तीसगढ़ में अनेक देवी मंदिर सदियों से श्रद्धालुओं की आस्था के केंद्र रहे हैं। कुछ मंदिर ऐतिहासिक स्थापत्य के लिए प्रसिद्ध हैं, कुछ राजपरंपराओं से जुड़े हैं और कुछ स्थानीय लोकदेवी की आराधना के महत्वपूर्ण स्थल हैं।
प्रमुख देवी धामों के नाम और स्थान इस प्रकार हैं:
माँ महामाया मंदिर — रतनपुर, जिला बिलासपुर।
माँ बम्लेश्वरी मंदिर — डोंगरगढ़, जिला राजनांदगांव।
माँ दंतेश्वरी मंदिर — दंतेवाड़ा, बस्तर अंचल।
माँ चंद्रहासिनी मंदिर — चंद्रपुर, जिला सक्ती।
माँ बागेश्वरी मंदिर — कुदरगढ़, जिला सूरजपुर।
माँ खल्लारी मंदिर — खल्लारी, जिला महासमुंद।
माँ डिंडेश्वरी मंदिर — मल्हार, जिला बिलासपुर।
माँ अष्टभुजी मंदिर — अड़भार, जिला सक्ती।
माँ महिषासुरमर्दिनी मंदिर — चैतुरगढ़, जिला कोरबा।
माँ महामाया मंदिर — पुरानी बस्ती, रायपुर।
माँ गंगा मैया मंदिर — झलमला, जिला बालोद।
माँ जतमई मंदिर — गरियाबंद क्षेत्र।
माँ घटारानी मंदिर — गरियाबंद क्षेत्र।
माँ चंडी मंदिर — घुंचापाली, बागबाहरा क्षेत्र।
माँ सर्वमंगला मंदिर — कोरबा।
माँ कौशल्या मंदिर — चंदखुरी, रायपुर क्षेत्र।
माँ बंजारी मंदिर — रायपुर क्षेत्र।
माँ अंगारमोती मंदिर — गंगरेल, धमतरी।
माँ बिलई माता मंदिर — धमतरी।
माँ मड़वारानी मंदिर — कोरबा क्षेत्र।
माँ सीया देवी मंदिर — बालोद क्षेत्र।
माँ महामाया मंदिर — कवर्धा क्षेत्र।
माँ गंगई मंदिर — गंडई क्षेत्र।
माँ समलाई मंदिर — सारंगढ़ क्षेत्र।
माँ बंजारी मंदिर — रायगढ़ क्षेत्र।
माँ सिंहवाहिनी मंदिर — कांकेर क्षेत्र।
माँ भद्रकाली मंदिर — भोपालपट्टनम, बीजापुर क्षेत्र।
माँ चिटमिटीन मंदिर — रामाराम, सुकमा क्षेत्र।
माँ मौली मंदिर — नारायणपुर क्षेत्र।
माँ अष्टभुजी दुर्गा मंदिर — हथनीकला, मुंगेली क्षेत्र।
खरौद क्षेत्र की देवी परंपराएँ — जांजगीर-चांपा क्षेत्र।
माँ महामाया मंदिर — धमधा, दुर्ग क्षेत्र।
माँ कंकालिन की स्थानीय आराधना परंपराएँ — विभिन्न क्षेत्रों में।
माँ शीतला मंदिर — प्रदेश के अनेक नगरों और गाँवों में।
माँ काली मंदिर — प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में।
माँ भवानी और ग्रामदेवी परंपराएँ — अनेक पुराने गाँवों और बस्तियों में।
यह 36 नाम छत्तीसगढ़ के प्रमुख देवी धामों और स्थानीय देवी-आराधना परंपराओं का संकलन है। इन सभी देवी स्थलों का महत्व हमें यह समझाता है कि छत्तीसगढ़ की देवी संस्कृति किसी एक मंदिर या राजवंश तक सीमित नहीं है। यह प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों, समुदायों और पीढ़ियों की साझा सांस्कृतिक धरोहर है।
पाँच प्रमुख शक्तिपीठों को जोड़ने की योजना: आस्था के साथ विकास की नई उम्मीद
छत्तीसगढ़ शासन के वित्त वर्ष 2026–27 के बजट में छत्तीसगढ़ आस्था पथ (शक्तिपीठ भ्रमण) योजना के लिए पाँच करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इस योजना में पाँच प्रमुख देवी मंदिरों को धार्मिक पर्यटन सर्किट के रूप में विकसित करने की पहल शामिल है। छत्तीसगढ़ जनमन के मार्च 2026 के अंक में भी इन पाँच मंदिरों का उल्लेख किया गया है। इस प्रस्तावित आस्था पथ में शामिल पाँच प्रमुख देवी धाम हैं:
1. माँ बम्लेश्वरी मंदिर — डोंगरगढ़, जिला राजनांदगांव
पहाड़ी पर स्थित माँ बम्लेश्वरी का मंदिर छत्तीसगढ़ के प्रमुख देवी धामों में से एक है। नवरात्रि में यहाँ बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुँचते हैं। इस धाम की धार्मिक पहचान और श्रद्धालुओं की आवाजाही इसे आस्था पथ का महत्वपूर्ण केंद्र बनाती है।
2. माँ महामाया मंदिर — रतनपुर, जिला बिलासपुर
रतनपुर का माँ महामाया मंदिर प्राचीन धार्मिक परंपरा और कलचुरी राजवंश के इतिहास से जुड़ा है। यह मंदिर प्रदेश की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण प्रतीक है।
3. माँ दंतेश्वरी मंदिर — दंतेवाड़ा, बस्तर अंचल
माँ दंतेश्वरी बस्तर की आराध्य देवी हैं। उनकी पूजा और बस्तर दशहरा की परंपरा इस क्षेत्र की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान है।
4. माँ बागेश्वरी मंदिर — कुदरगढ़, जिला सूरजपुर
कुदरगढ़ धाम पहाड़ी और वन क्षेत्र में स्थित एक महत्वपूर्ण देवी स्थल है। यहाँ श्रद्धालु माँ बागेश्वरी के दर्शन के लिए पहुँचते हैं। यह उत्तरी छत्तीसगढ़ की धार्मिक परंपरा का प्रमुख केंद्र है।
5. माँ चंद्रहासिनी मंदिर — चंद्रपुर, जिला सक्ती
महानदी के निकट स्थित माँ चंद्रहासिनी का मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। नवरात्रि और अन्य धार्मिक अवसरों पर यहाँ विशेष पूजा-अर्चना होती है।
इन पाँच मंदिरों को जोड़ने वाली योजना का उद्देश्य श्रद्धालुओं के आवागमन को सुगम बनाना और धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देना है। इसके अंतर्गत सड़क संपर्क, स्वच्छता, पेयजल, प्रकाश व्यवस्था, विश्राम स्थल, पार्किंग और सुरक्षा जैसी सुविधाओं के विकास पर ध्यान दिया जा सकता है। यदि यह योजना व्यवस्थित रूप से लागू होती है, तो इससे स्थानीय परिवहन, प्रसाद, भोजन, हस्तशिल्प और अन्य छोटे व्यवसायों को भी अवसर मिल सकते हैं। लेकिन मंदिरों का विकास केवल सौंदर्यीकरण तक सीमित नहीं रहना चाहिए। प्राचीन मूर्तियों, शिलालेखों, स्थापत्य और प्राकृतिक वातावरण का संरक्षण भी उतना ही जरूरी है।
गरबा: भक्ति, अनुशासन और सांस्कृतिक गरिमा का प्रतीक
नवरात्रि में गरबा और डांडिया अनेक स्थानों पर आयोजित किए जाते हैं। गरबा का मूल भाव शक्ति की उपासना, सामूहिकता, ताल, अनुशासन और उत्सव से जुड़ा है। गोल घेरे में एक साथ नृत्य करना लोगों को जोड़ने और भक्ति के भाव को व्यक्त करने का माध्यम बन सकता है। लेकिन किसी भी सांस्कृतिक आयोजन में जब भक्ति से अधिक दिखावा, अनावश्यक प्रतिस्पर्धा या अभद्र व्यवहार को महत्व मिलने लगे, तब आत्ममंथन जरूरी हो जाता है। आधुनिक परिधान पहनना अपने आप में गलत नहीं है। किसी व्यक्ति के पहनावे के आधार पर उसे अपमानित करना भी उचित नहीं है। समस्या तब है, जब आयोजनों में अश्लील प्रस्तुतियाँ, नशाखोरी, महिलाओं के प्रति असम्मान, सुरक्षा की अनदेखी या सार्वजनिक मर्यादा का उल्लंघन हो।
ऐसे मामलों में आयोजकों को स्पष्ट नियम बनाने चाहिए और वास्तविक अनुचित व्यवहार के विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई करनी चाहिए। गरबा और डांडिया का आयोजन ऐसा हो, जहाँ परिवार सुरक्षित महसूस करें, महिलाएँ सम्मान के साथ भाग ले सकें और युवा अपनी संस्कृति के मूल भाव से परिचित हों।
गरबा को केवल मनोरंजन की प्रतियोगिता नहीं, बल्कि अनुशासन, साधना और सामूहिक भक्ति के अवसर के रूप में भी देखा जाना चाहिए। संगीत, लोकगीत, देवी स्तुति और पारंपरिक सांस्कृतिक प्रस्तुतियों को उचित स्थान देकर इन आयोजनों की गरिमा को और मजबूत किया जा सकता है।
नौ दिन करोड़ों का उत्सव, लेकिन प्राचीन मंदिरों का क्या?
आज हमारी प्राथमिकताओं पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। बड़े-बड़े पंडाल, महँगी रोशनी, विशाल मंच, आकर्षक सजावट, ध्वनि व्यवस्था और प्रचार पर कई आयोजनों में बड़ी रकम खर्च की जाती है। गरबा और डांडिया के भव्य आयोजन भी होने लगे हैं। इन आयोजनों से रोजगार मिलता है, व्यापार बढ़ता है और लोगों को अपनी कला दिखाने का अवसर भी मिलता है। इसलिए भव्यता को पूरी तरह गलत कहना उचित नहीं होगा।
लेकिन सवाल यह है कि क्या हमारी सामाजिक जिम्मेदारी केवल नौ दिनों तक ही सीमित रहनी चाहिए?
जब हमारे आसपास कोई प्राचीन मंदिर मरम्मत की प्रतीक्षा कर रहा हो, किसी ऐतिहासिक स्थल तक जाने का रास्ता खराब हो, श्रद्धालुओं के लिए पेयजल या शौचालय की व्यवस्था न हो, पुरानी मूर्तियों और शिलालेखों को संरक्षण की आवश्यकता हो, तब क्या हमारी जिम्मेदारी नहीं बनती कि उत्सव के बजट में से कुछ हिस्सा ऐसे कार्यों के लिए भी स्वेच्छा से निर्धारित करें?
कल्पना कीजिए, यदि आयोजन समितियाँ, सामाजिक संस्थाएँ, व्यापारी, जनप्रतिनिधि और श्रद्धालु अपनी क्षमता के अनुसार पुराने मंदिरों के संरक्षण, स्वच्छता, पौधारोपण, गरीब बच्चों की शिक्षा और स्थानीय सांस्कृतिक विरासत के दस्तावेजीकरण में सहयोग करें, तो आने वाले वर्षों में कितने महत्वपूर्ण कार्य पूरे हो सकते हैं।
यह किसी पर दान देने का दबाव बनाने की बात नहीं है। यह सामाजिक जिम्मेदारी का संदेश है। यदि कोई समिति भव्य आयोजन करती है, तो वह अपनी इच्छा और सामर्थ्य के अनुसार संरक्षण के लिए अलग कोष बना सकती है। मंदिर समिति और संबंधित विभागों के साथ मिलकर पारदर्शी तरीके से धन खर्च किया जा सकता है। इससे श्रद्धालुओं को भरोसा मिलेगा और संरक्षण के काम का वास्तविक परिणाम भी सामने आएगा।
हर वर्ष उत्सव मनाना हमारी परंपरा है, लेकिन हर वर्ष अपनी विरासत को थोड़ा और सुरक्षित बनाना हमारा कर्तव्य भी होना चाहिए। पूजा और विकास एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। सच्चा संतुलन यही है कि उत्सव भी हो, भक्ति भी हो, स्थानीय रोजगार भी बढ़े और प्राचीन धरोहरें भी सुरक्षित रहें।
हमारी संस्कृति को अगली पीढ़ी तक कौन पहुँचाएगा?
हम अक्सर कहते हैं कि हमारी संस्कृति महान है, हमारे मंदिर प्राचीन हैं और हमारे पूर्वजों ने अद्भुत विरासत छोड़ी है। लेकिन क्या हमने अपने बच्चों को अपने क्षेत्र के पुराने देवी मंदिरों का इतिहास बताया है? क्या उन्हें पता है कि रतनपुर की माँ महामाया का राजवंशीय इतिहास से क्या संबंध है, माँ दंतेश्वरी बस्तर की पहचान क्यों हैं और डोंगरगढ़ की माँ बम्लेश्वरी के दर्शन के लिए श्रद्धालु दूर-दूर से क्यों आते हैं?
क्या हमने उन्हें बताया है कि छत्तीसगढ़ के पुराने गढ़ों की ऐतिहासिक परंपरा क्या थी, ग्रामदेवी और कुलदेवी की पूजा क्यों की जाती थी और मंदिरों का सामाजिक जीवन में क्या महत्व रहा है?
यदि हम केवल उत्सव की तस्वीरें और वीडियो अगली पीढ़ी को देंगे, लेकिन उसके पीछे का इतिहास, संस्कृति, श्रद्धा और जिम्मेदारी नहीं समझाएँगे, तो हमारी विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा धीरे-धीरे विस्मृत हो सकता है।
इसलिए विद्यालयों, समाचार माध्यमों, मंदिर समितियों, सामाजिक संस्थाओं और परिवारों को मिलकर प्राचीन मंदिरों की सही जानकारी संकलित करनी चाहिए। मंदिरों के नाम, स्थान, स्थापत्य, ऐतिहासिक अभिलेख, लोककथाएँ और संरक्षण की आवश्यकताओं का दस्तावेज तैयार किया जाना चाहिए। जहाँ इतिहास प्रमाणित नहीं है, वहाँ लोकमान्यता को लोकमान्यता के रूप में ही प्रस्तुत किया जाना चाहिए। यही हमारी संस्कृति के प्रति ईमानदार और जिम्मेदार दृष्टिकोण है।
माँ की आराधना के साथ अपनी विरासत की रक्षा का संकल्प लें
नवरात्रि हमें शक्ति की उपासना करना सिखाती है, लेकिन शक्ति का अर्थ केवल माँ के सामने सिर झुकाना नहीं है। शक्ति का अर्थ है सत्य के साथ खड़े होना, अन्याय का विरोध करना, महिलाओं का सम्मान करना, जरूरतमंदों की सहायता करना और अपनी संस्कृति को सुरक्षित रखने के लिए आगे आना।
आइए, इस नवरात्रि हम संकल्प लें कि उत्सव की खुशियाँ मनाएँगे, गरबा और डांडिया की सांस्कृतिक गरिमा बनाए रखेंगे, अभद्र व्यवहार और अश्लील प्रस्तुतियों को बढ़ावा नहीं देंगे, महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान को प्राथमिकता देंगे तथा अपनी क्षमता के अनुसार प्राचीन मंदिरों और सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण में योगदान करेंगे। हम अपने बच्चों को नवदुर्गा के नौ स्वरूपों के साथ छत्तीसगढ़ के पुराने गढ़ों, राजपरिवारों की देवी परंपराओं और ऐतिहासिक मंदिरों का महत्व भी बताएँगे।
आने वाली पीढ़ियाँ हमसे केवल यह नहीं पूछेंगी कि हमने कितने बड़े पंडाल लगाए थे या कितनी चमकदार रोशनी की थी। वे यह भी जानना चाहेंगी कि हमने अपने पूर्वजों की विरासत के लिए क्या किया, अपने मंदिरों को कितना सुरक्षित रखा और अपनी संस्कृति को आगे बढ़ाने के लिए कौन-सा योगदान दिया।
माँ की ज्योति केवल नौ दिनों तक नहीं, हमारे विचारों और कर्मों में बारहों महीने जलनी चाहिए। उत्सव हर वर्ष लौटकर आएगा, लेकिन अपनी प्राचीन विरासत को बचाने का अवसर यदि आज खो दिया, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए उसकी भरपाई कठिन हो सकती है।
यही है अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ के साप्ताहिक विशेषांक ‘कलम की धार’ का संदेश—आस्था भी बचाएँ, संस्कृति भी बचाएँ और अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए इतिहास की अमूल्य धरोहर भी बचाएँ।
जय माँ दुर्गा! जय माँ दंतेश्वरी! जय माँ महामाया! जय छत्तीसगढ़!
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