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धान के कटोरे में खेती का नया प्रयोग, बदल रही किसानों की कमाई की तस्वीर

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रायपुर, छत्तीसगढ़

By ACGN – 7647981711, 9303948009
संवाददाता :- अनादि पांडेय रायपुर

रायपुर ACGN:- छत्तीसगढ़ की पहचान भले ही लंबे समय से देश के धान के कटोरे के रूप में रही है, लेकिन अब प्रदेश के खेतों में खेती की तस्वीर धीरे-धीरे बदलती नजर आ रही है। किसान पारंपरिक धान की खेती के साथ अदरक, फूल, फल-सब्जी, दलहन, तिलहन और मोटे अनाज जैसी फसलों की ओर बढ़ रहे हैं। वहीं कुछ किसान खेती के साथ मछली पालन, मुर्गी पालन और बागवानी को जोड़कर अपनी आय के नए साधन तैयार कर रहे हैं। ऐसे में खेती अब केवल एक फसल पर निर्भर रहने के बजाय ग्रामीण अर्थव्यवस्था का व्यापक आधार बनती दिखाई दे रही है।


      धान के साथ बढ़ा फसल विविधीकरण का रास्ता
छत्तीसगढ़ के किसानों के लिए धान आज भी प्रमुख फसल है, लेकिन लगातार एक ही फसल पर निर्भरता से होने वाले जोखिम को कम करने के लिए फसल विविधीकरण पर जोर दिया जा रहा है। सरकार की ओर से किसानों को दलहन, तिलहन, मक्का, कपास और मोटे अनाज की खेती के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। अरहर, मूंग, उड़द और चना जैसी दलहन फसलों के साथ सोयाबीन, मूंगफली, सूरजमुखी और तिल जैसी तिलहन फसलों को भी बढ़ावा देने की योजना है।
कोदो, कुटकी, रागी और बाजरा जैसे मोटे अनाज भी किसानों के लिए वैकल्पिक आय का जरिया बन सकते हैं। फसल विविधीकरण को प्रोत्साहित करने के लिए किसानों को प्रति एकड़ 15 हजार रुपये तक की प्रोत्साहन राशि दिए जाने का प्रावधान बताया गया है। इसका उद्देश्य केवल फसल बदलना नहीं, बल्कि किसानों की आय के स्रोत बढ़ाना और किसी एक फसल पर निर्भरता से जुड़े आर्थिक जोखिम को कम करना है।


           अदरक और फूलों की खेती ने दिखाई नई राह
प्रदेश के कई इलाकों में किसान अब पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर ऐसी फसलों का प्रयोग कर रहे हैं जिनकी बाजार में मांग बनी रहती है। अदरक और गेंदा फूल जैसी फसलें किसानों के लिए नगदी आय का साधन बन रही हैं। बागवानी का विस्तार भी इसी बदलाव का हिस्सा है।
कई युवा किसान खेती को केवल खेत तक सीमित रखने के बजाय उसे व्यवसाय के रूप में देख रहे हैं। खेती के साथ मछली पालन, मुर्गी पालन और बागवानी को जोड़कर वे एक ही कृषि व्यवस्था से अलग-अलग स्रोतों से आमदनी लेने का प्रयास कर रहे हैं। इससे ग्रामीण युवाओं के लिए खेती में नए अवसर पैदा होने की संभावना भी बढ़ी है।


           मशीन और ड्रोन से घट रही खेती की लागत
खेती में आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल भी तेजी से बढ़ रहा है। गांवों में फार्म मशीनरी बैंक के माध्यम से छोटे और सीमांत किसानों को महंगी कृषि मशीनें किराये पर उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जा रही है। इससे ऐसे किसान भी आधुनिक कृषि उपकरणों का उपयोग कर पा रहे हैं, जिनके लिए स्वयं मशीन खरीदना आसान नहीं है।
ड्रोन, ऑटोमैटिक रीपर और दूसरे कृषि उपकरणों के इस्तेमाल से श्रम और समय की बचत के साथ खेती की लागत कम करने की कोशिश हो रही है। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों का विस्तार भी खेती में पानी के बेहतर उपयोग की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
          उत्पादन बढ़ा, लेकिन असली कसौटी आय की
राज्य सरकार के अनुसार पिछले ढाई वर्षों से अधिक समय में खरीफ फसलों के उत्पादन में करीब 17 प्रतिशत और रबी फसलों में लगभग 20 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। इसके पीछे खेती का रकबा बढ़ने के साथ बेहतर बीज, उर्वरक, सिंचाई और कृषि यंत्रीकरण तक किसानों की बढ़ती पहुंच को महत्वपूर्ण कारण बताया गया है।
हालांकि खेती की सफलता का अंतिम पैमाना केवल उत्पादन बढ़ना नहीं है। किसान के हाथ में उत्पादन के बाद कितना पैसा बचता है, उसे अपनी उपज का कितना बेहतर मूल्य मिलता है और बाजार तक उसकी पहुंच कितनी आसान होती है, यही कृषि व्यवस्था की वास्तविक सफलता तय करेगा।
  कृषक उन्नति योजना से सीधे खातों तक पहुंची सहायता
किसानों को आर्थिक सुरक्षा देने के लिए कृषक उन्नति योजना को भी महत्वपूर्ण पहल बताया गया है। खरीफ फसल के धान पर न्यूनतम समर्थन मूल्य से जुड़ी आदान सहायता के रूप में 24 लाख 73 हजार 762 किसानों को 13 हजार 289 करोड़ रुपये का भुगतान किए जाने की जानकारी दी गई है।
खरीफ 2023 से 2025 तक लगभग 25.52 लाख किसानों के बैंक खातों में कृषक उन्नति योजना के तहत करीब 35,892.90 करोड़ रुपये की सहायता राशि सीधे हस्तांतरित किए जाने का दावा किया गया है। गन्ना प्रोत्साहन योजना के तहत एक करोड़ तीन लाख 34 हजार क्विंटल से अधिक गन्ने की खरीदी कर 32 हजार 955 किसानों को 64.95 करोड़ रुपये का भुगतान किए जाने की भी जानकारी सामने आई है।


          फसल बीमा से जोखिम घटाने की कोशिश
किसान के लिए खेती केवल उत्पादन का सवाल नहीं, बल्कि मौसम और प्राकृतिक आपदाओं से जुड़े जोखिम का भी विषय है। ऐसे में फसल बीमा को कृषि सुरक्षा कवच के रूप में देखा जा रहा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार खरीफ सीजन में 15.92 लाख से अधिक और रबी सीजन में 2.99 लाख किसानों को फसल बीमा के दायरे में शामिल किया गया है।
इसी तरह प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के तहत प्रदेश के 24.63 लाख किसानों को 23वीं किस्त के रूप में 493 करोड़ रुपये दिए जाने तथा अब तक 11 हजार करोड़ रुपये से अधिक की राशि सीधे किसानों के खातों में पहुंचाए जाने की जानकारी दी गई है।
                 बागवानी में बढ़ा खेती का दायरा
छत्तीसगढ़ की बदलती कृषि तस्वीर में बागवानी तेजी से महत्वपूर्ण स्थान बना रही है। पिछले ढाई वर्षों में बागवानी का क्षेत्रफल 8.42 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 8.91 लाख हेक्टेयर तक पहुंचने की जानकारी दी गई है। फल, सब्जियां, मसाले और फूलों के साथ तेल पाम और बांस जैसी फसलों का विस्तार भी नई संभावनाओं की ओर संकेत करता है।
लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि खेत में पैदा होने वाली उपज किसान को बाजार में कितना लाभ दे पाती है? उत्पादन बढ़ने के बाद यदि भंडारण की सुविधा नहीं हो, प्रसंस्करण की व्यवस्था कमजोर हो या किसान को सही बाजार और उचित मूल्य न मिले तो खेती की बढ़ी हुई उत्पादकता का पूरा लाभ किसान तक नहीं पहुंच पाएगा।
               खेत से बाजार तक मजबूत हो कड़ी
छत्तीसगढ़ में कृषि के अगले चरण की सबसे बड़ी जरूरत खेत से बाजार तक मजबूत व्यवस्था तैयार करना है। पैक हाउस, सेंटर ऑफ एक्सीलेंस और प्रसंस्करण जैसी अधोसंरचनाओं का विकास इस दिशा में महत्वपूर्ण हो सकता है। यदि किसानों को उत्पादन के साथ भंडारण, ग्रेडिंग, पैकेजिंग, प्रसंस्करण और बाजार की सुविधा मिले तो नगदी और बागवानी फसलों से होने वाली आय को और मजबूत किया जा सकता है।
प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ता रुझान भी कृषि के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण संकेत है। पिछले वर्ष 57 हजार से अधिक किसानों द्वारा प्राकृतिक खेती अपनाए जाने की जानकारी दी गई है। आने वाले समय में खेती की उत्पादकता के साथ मिट्टी, पानी और पर्यावरण की सेहत को बनाए रखना भी उतना ही जरूरी होगा।


         किसान की बदली सोच बनेगी असली ताकत
छत्तीसगढ़ में कृषि का यह बदलाव केवल सरकारी योजनाओं का परिणाम नहीं माना जा सकता। खेत में प्रयोग करने वाले किसान, आधुनिक तकनीक अपनाने वाले युवा और पारंपरिक खेती के साथ नए विकल्प तलाशने वाले ग्रामीण परिवार इस परिवर्तन के महत्वपूर्ण हिस्सेदार हैं।
धान की अपनी मजबूत पहचान के बावजूद यदि किसान अदरक, फूल, फल-सब्जी, दलहन, तिलहन, मोटे अनाज, मछली पालन और पशुपालन जैसे विकल्पों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अपनाते हैं, तो खेती की आय को कई स्तरों पर मजबूत किया जा सकता है। लेकिन इसके लिए बाजार, सिंचाई, बीमा, भंडारण, प्रसंस्करण और उचित मूल्य की व्यवस्था को भी उतनी ही मजबूती देनी होगी।
छत्तीसगढ़ के खेतों में अब केवल धान की हरियाली नहीं, बल्कि खेती के नए प्रयोगों और बदलती आर्थिक सोच की तस्वीर भी दिखाई दे रही है। आने वाले वर्षों में यह बदलाव कितना स्थायी और किसानों के लिए कितना लाभकारी साबित होता है, इसकी असली परीक्षा खेत से बाजार तक पूरी कृषि व्यवस्था के मजबूत होने पर निर्भर करेगी।

प्रदीप मिश्रा
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