तारा की नीलामी हुई, अब जंगल और पर्यावरण की मंजूरी बाकी – खनन पर अभी नहीं खुला रास्ता
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सूरजपुर, छत्तीसगढ़
By ACGN – 7647981711, 9303948009
संवाददाता :- संतोष यादव सूरजपुर
9 कंपनियों ने लगाई बोली, सफल हुआ CG Syn&Gas and Chemicals Limited; सरकार ने कहा – सभी वैधानिक मंजूरियों के बाद ही शुरू होगा खनन
सूरजपुर ACGN:- हसदेव-अरण्य क्षेत्र के तारा कोल ब्लॉक को लेकर छत्तीसगढ़ खनिज विकास निगम ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि फिलहाल केवल कोयला ब्लॉक की प्रतिस्पर्धात्मक नीलामी हुई है। नीलामी में सफल बोलीदाता को अभी खनन शुरू करने के लिए कई महत्वपूर्ण वैधानिक प्रक्रियाओं से गुजरना होगा। माइनिंग प्लान, खनन पट्टा, पर्यावरण स्वीकृति, वन स्वीकृति सहित निर्धारित अनुमतियां प्राप्त होने के बाद ही वास्तविक खनन गतिविधियां शुरू की जा सकेंगी।
सरकार की ओर से जारी जानकारी के अनुसार तारा कोल ब्लॉक की नीलामी में कुल 9 बोलियां प्राप्त हुई थीं। प्रक्रिया पूरी होने के बाद यह ब्लॉक CG Syn&Gas and Chemicals Limited को मिला है। हालांकि नीलामी में सफल होना अपने आप में खनन की अनुमति नहीं माना जाएगा।
नीलामी और खनन की अनुमति अलग-अलग चरण
तारा कोल ब्लॉक को लेकर सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नीलामी को अंतिम खनन अनुमति नहीं माना जा सकता। सरकार के अनुसार कंपनी को पहले माइनिंग प्लान स्वीकृत कराना होगा और इसके बाद खनन पट्टे सहित आवश्यक वैधानिक अनुमतियां प्राप्त करनी होंगी।
वन क्षेत्र से जुड़े मामलों में वन स्वीकृति की निर्धारित प्रक्रिया पूरी करनी होगी। इसी तरह परियोजना के संभावित पर्यावरणीय प्रभावों का नियमानुसार परीक्षण किया जाएगा। आवश्यक मंजूरियां मिलने से पहले वास्तविक खनन गतिविधि या पेड़ों की कटाई शुरू नहीं की जा सकती।
यानी फिलहाल तारा में न तो खनन शुरू हुआ है और न ही केवल नीलामी के आधार पर कंपनी को जंगल साफ करने या कोयला निकालने की स्वतः अनुमति मिल गई है।
तारा का मामला आज से शुरू नहीं हुआ
तारा कोल ब्लॉक का इतिहास भी पुराना है। उपलब्ध सरकारी दस्तावेज के अनुसार वर्ष 2011 में तारा कोल ब्लॉक छत्तीसगढ़ खनिज विकास निगम को आवंटित किया गया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के परिणामस्वरूप अन्य कई कोल ब्लॉकों के साथ इसका पूर्व आवंटन भी निरस्त हो गया।
सरकार ने अपने पक्ष में यह भी उल्लेख किया है कि हसदेव-अरण्य क्षेत्र में कोयला ब्लॉकों के आवंटन और खनन से संबंधित प्रक्रियाएं अलग-अलग समय में आगे बढ़ती रही हैं। परसा ईस्ट केते बासन यानी पीईकेबी ब्लॉक को राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड की विद्युत उत्पादन आवश्यकताओं से जोड़ा गया है।
वन स्वीकृति के पुराने फैसलों का भी दिया हवाला
तारा और पीईकेबी से संबंधित वन एवं पर्यावरण स्वीकृतियों की पुरानी प्रक्रिया का हवाला देते हुए सरकार ने कहा है कि वर्ष 2011 में वन सलाहकार समिति की प्रतिकूल अनुशंसा के बावजूद तत्कालीन केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के स्तर पर वन स्वीकृति देने का निर्णय लिया गया था।
सरकारी दस्तावेज में पीईकेबी को जुलाई 2011 में स्टेज-1 और मार्च 2012 में स्टेज-2 फारेस्ट क्लियरेंस मिलने तथा उसी अवधि में पर्यावरणीय स्वीकृति की प्रक्रिया आगे बढ़ने का उल्लेख किया गया है।
इस संदर्भ को सामने रखकर सरकार का तर्क है कि हसदेव-अरण्य में कोयला खनन से जुड़े निर्णय किसी एक सरकार के कार्यकाल तक सीमित नहीं रहे हैं। हालांकि प्रत्येक परियोजना की वर्तमान वैधानिक स्थिति और आज की पर्यावरणीय शर्तों का परीक्षण अलग से किया जाना जरूरी होगा।
मोरगा कोल ब्लॉक का मामला भी जुड़ा
सरकार ने हसदेव-अरण्य के कोयला संसाधनों के संदर्भ में मोरगा कोल ब्लॉक का भी उल्लेख किया है। जानकारी के अनुसार पूर्ववर्ती राज्य सरकार ने मोरगा को छत्तीसगढ़ खनिज विकास निगम के पक्ष में आवंटित करने के लिए केंद्रीय कोयला मंत्रालय से अनुरोध किया था।
इस पत्राचार में मदनपुर कोल ब्लॉक के मदनपुर साउथ ब्लॉक का आंध्र प्रदेश मिनरल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन को आवंटन होने का उल्लेख करते हुए मोरगा कोल ब्लॉक छत्तीसगढ़ खनिज विकास निगम को देने का अनुरोध किया गया था। दस्तावेज में यह भी कहा गया था कि आवंटन के बाद आवश्यक पर्यावरणीय अनुमतियों के लिए केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय से अनुरोध किया जाएगा।
वैज्ञानिक अध्ययन में पर्यावरणीय संवेदनशीलता का आकलन
हसदेव-अरण्य में भविष्य की खनन गतिविधियों को लेकर भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद द्वारा वैज्ञानिक अध्ययन किए जाने की जानकारी भी सरकार ने दी है। अध्ययन में जैव विविधता, वन्यजीव, जलग्रहण क्षेत्र और पर्यावरणीय संवेदनशीलता जैसे पहलुओं का आकलन किया गया।
सरकारी दस्तावेज के अनुसार अध्ययन में तारा सहित कुछ अन्य कोल ब्लॉकों को कड़े पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों और संरक्षण प्रावधानों के अधीन खनन के लिए विचार योग्य माना गया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि अध्ययन अपने आप खनन की अंतिम अनुमति बन जाता है। परियोजना को लागू करने के लिए संबंधित वैधानिक स्वीकृतियों और शर्तों का पालन अलग-अलग स्तर पर जरूरी रहेगा।
वन क्षेत्र बढ़ने के आंकड़े भी सामने रखे
राज्य सरकार ने वन संरक्षण और वृक्षारोपण को अपनी प्राथमिकता बताते हुए फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की रिपोर्ट-2023 के आंकड़ों का भी उल्लेख किया है। सरकार के अनुसार वर्ष 2021 से 2023 के बीच छत्तीसगढ़ के वन क्षेत्राच्छादन में 683.62 वर्ग किलोमीटर की शुद्ध वृद्धि दर्ज हुई, जो उस अवधि में देश के राज्यों में सर्वाधिक थी।
इसी अवधि में राज्य के वनावरण में 702.75 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि का भी उल्लेख किया गया है। इससे पहले फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की 2021 की रिपोर्ट में वर्ष 2019 की तुलना में छत्तीसगढ़ के वनावरण में करीब 106 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि बताई गई थी।
हालांकि राज्य के कुल वनावरण में वृद्धि के आंकड़े और किसी विशेष खनन परियोजना के स्थानीय पर्यावरणीय प्रभाव दो अलग-अलग विषय हैं। इसलिए तारा परियोजना के मामले में स्थानीय स्तर पर जैव विविधता, जल स्रोत, वन्यजीव और ग्रामीण जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों का स्वतंत्र और विस्तृत आकलन महत्वपूर्ण रहेगा।
ऊर्जा सुरक्षा बनाम पर्यावरण संरक्षण—संतुलन की चुनौती
सरकार का कहना है कि देश की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों और बिजली आपूर्ति की निरंतरता के लिए घरेलू कोयला संसाधनों का उपयोग महत्वपूर्ण है। साथ ही राज्य के विकास और ऊर्जा जरूरतों के बीच संतुलन बनाते हुए वन, पर्यावरण और स्थानीय हितों को प्राथमिकता देने की बात भी कही गई है।
लेकिन तारा कोल ब्लॉक की वास्तविक परीक्षा अब नीलामी के बाद शुरू होगी। कागज पर वैधानिक स्वीकृतियां, पर्यावरणीय सुरक्षा उपाय और प्रतिपूरक वनीकरण जितने महत्वपूर्ण हैं, उतना ही महत्वपूर्ण उनका जमीन पर पालन भी होगा। स्थानीय लोगों की चिंताओं, जलस्रोतों, जंगल और जैव विविधता की सुरक्षा को लेकर पारदर्शिता भी इस पूरी प्रक्रिया का अहम हिस्सा रहेगी।
अभी खनन शुरू नहीं, आगे की प्रक्रिया पर रहेगी नजर
छत्तीसगढ़ खनिज विकास निगम ने साफ किया है कि तारा कोल ब्लॉक में अभी केवल प्रतिस्पर्धात्मक नीलामी हुई है। सफल बोलीदाता को आगे माइनिंग प्लान, खनन पट्टा, वन एवं पर्यावरण स्वीकृति सहित सभी आवश्यक वैधानिक प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी।
इसलिए फिलहाल तारा कोल ब्लॉक की नीलामी को खनन शुरू होने के रूप में देखना सही नहीं होगा। असली सवाल अब यह रहेगा कि आगे होने वाली पर्यावरणीय और वन संबंधी जांच में क्या निष्कर्ष सामने आते हैं, कौन-कौन सी शर्तें लागू होती हैं और उन शर्तों का पालन किस तरह सुनिश्चित किया जाता है।
हसदेव-अरण्य जैसे संवेदनशील क्षेत्र में विकास और ऊर्जा जरूरतों के साथ पर्यावरण तथा स्थानीय समुदायों के हितों का संतुलन ही इस परियोजना की सबसे बड़ी कसौटी होगी। आने वाले समय में तारा कोल ब्लॉक से जुड़ी प्रत्येक स्वीकृति और प्रक्रिया पर सार्वजनिक निगरानी इसलिए भी महत्वपूर्ण रहेगी, क्योंकि नीलामी पूरी हो चुकी है, लेकिन खनन की राह अभी कई वैधानिक पड़ावों से होकर गुजरनी बाकी है।
प्रदीप मिश्रा
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