बारिश बरसती रही, माताओं की आस्था नहीं थमी – श्रद्धा से मनाया गया कमरछठ
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कोरबा कटघोरा, छत्तीसगढ़
By ACGN – 7647981711, 9303948009
संवाददाता :- दीपक पटेल
संतान की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना लेकर महिलाओं ने निभाई सदियों पुरानी परंपरा, कथा-पूजन और सामूहिक आरती में दिखी छत्तीसगढ़ी संस्कृति की झलक
कटघोरा ACGN:- आसमान से बारिश की बूंदें बरसती रहीं, मौसम ने कई बार परीक्षा ली, लेकिन माताओं की आस्था और श्रद्धा को कोई नहीं डिगा सका। संतान के सुख, उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु और परिवार की मंगलकामना को लेकर हलषष्ठी अर्थात कमरछठ पर्व ग्राम जवाली में पूरे श्रद्धा, विश्वास और छत्तीसगढ़ी पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया।
खराब मौसम के बावजूद पर्व को लेकर महिलाओं में जबरदस्त उत्साह देखने को मिला। सुबह से ही माताएं पारंपरिक पूजा की तैयारियों में जुट गईं और निर्धारित समय के बाद समूहवार पूजा-अर्चना का सिलसिला शुरू हुआ। पूजा स्थल पर छत्तीसगढ़ की मिट्टी से जुड़ी लोकपरंपराओं और रीति-रिवाजों की सुंदर झलक दिखाई दी।
पारंपरिक सामग्रियों से हुई पूजा, निभाई गई विशेष रस्में
कमरछठ पर्व की पूजा में परंपरा के अनुसार भैंस के दूध, बिना हल चले खेतों में उगने वाली छह प्रकार की भाजियों, महुआ लाई, राहर दाना तथा पसहर चावल से भैंस के दूध में तैयार खीर सहित पारंपरिक प्रसाद का उपयोग किया गया। सेंधा नमक से तैयार भाजी भी प्रसाद का हिस्सा रही।
माताओं ने विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हुए अपने परिवार और संतान की सुख-शांति, समृद्धि एवं दीर्घायु की कामना की। इस दौरान परंपरा के अनुसार पीठ पर सात-सात बार ठप्पा लगाने की रस्म भी श्रद्धापूर्वक निभाई गई।
रामसनेही महाराज के निवास पर कथा और सामूहिक आरती
इसी क्रम में गौतम गुड्डू रामसनेही महाराज के निवास पर उनकी माताजी के मार्गदर्शन में कमरछठ की कथा एवं सामूहिक आरती का आयोजन किया गया। बड़ी संख्या में माताओं और श्रद्धालुओं ने एक साथ बैठकर कमरछठ की कथा सुनी तथा सामूहिक आरती में शामिल होकर धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक एकता का परिचय दिया।
कथा और आरती के दौरान वातावरण पूरी तरह भक्तिमय नजर आया। महिलाओं ने पारंपरिक भाव से पूजा-अर्चना करते हुए अपनी संतान के उज्ज्वल भविष्य और परिवार में सुख-शांति की प्रार्थना की।
केवल पर्व नहीं, छत्तीसगढ़ की संस्कृति की पहचान है कमरछठ
कमरछठ पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान या व्रत तक सीमित नहीं है। यह छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति, ग्रामीण जीवनशैली, पारिवारिक मूल्यों और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं का जीवंत स्वरूप है। आधुनिकता के इस दौर में भी ग्रामीण अंचलों में इस पर्व को उसी श्रद्धा और पारंपरिक तरीके से मनाया जाना इस बात का प्रमाण है कि छत्तीसगढ़ की मिट्टी से जुड़ी संस्कृति आज भी लोगों के दिलों में जीवित है।
ऐसे आयोजन नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का काम करते हैं। बुजुर्गों से बच्चे जब पूजा की विधि, कथा और पारंपरिक सामग्रियों के बारे में जानते हैं तो संस्कृति केवल एक पर्व नहीं रहती, बल्कि अगली पीढ़ी तक पहुंचने वाली विरासत बन जाती है।
मौसम की चुनौती के सामने भी माताओं का उत्साह रहा कायम
बारिश और खराब मौसम के बावजूद महिलाओं की आस्था में कोई कमी नहीं आई। पूरे उत्साह और सामूहिक भावना के साथ पर्व मनाया गया। आयोजन के दौरान तीजबाई, बबली, सरस्वती, उमा, रजनी, दिलबाई, शीला, सिकन, दरहीन, आयो सहित बड़ी संख्या में महिलाओं की सहभागिता रही।
पूरे आयोजन में आपसी प्रेम, सामाजिक एकता और श्रद्धा का सुंदर वातावरण देखने को मिला। माताओं ने एक-दूसरे को पर्व की शुभकामनाएं दीं और संतान की सुख-समृद्धि की मंगलकामना की।
जवाली के साथ अन्य पारा-मोहल्लों में भी दिखी आस्था
ग्राम जवाली के अलावा मध्यनारी, मौहारपारा एवं ठाकुरपारा में भी हलषष्ठी/कमरछठ पर्व पूरे श्रद्धा एवं उत्साह के साथ मनाया गया। विभिन्न स्थानों पर महिलाओं ने पारंपरिक विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर अपने परिवार एवं संतान के सुखी, स्वस्थ और मंगलमय जीवन की कामना की।
कमरछठ के इस आयोजन ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि समय बदल सकता है, मौसम बदल सकता है, लेकिन अपनी संस्कृति और परंपराओं के प्रति आस्था कभी कमजोर नहीं होती।
“परंपरा कायम रहे, संस्कृति जीवित रहे और हमारी लोक विरासत पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रहे”—इसी संकल्प के साथ ग्रामवासियों ने कमरछठ पर्व को श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया।
प्रदीप मिश्रा
अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़
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