भक्ति और विचार का संगम: अंबेडकर चिंतन और सांस्कृतिक प्रतियोगिता में शांति सोनी की प्रतिभा का सम्मान
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बिलासपुर, छत्तीसगढ़
By ACGN 7647981711, 9303948009
बाबा साहेब अंबेडकर के समता और नारी सम्मान के विचारों के साथ छठ घाट तोरवा में भक्ति, संस्कृति और कला का अद्भुत आयोजन
बिलासपुर ACGN: बिलासपुर के तोरवा स्थित छठ घाट की पावन धरती 11 अप्रैल 2026 को धर्म, संस्कृति, कला और सामाजिक विचारों के अद्भुत संगम की साक्षी बनी। यहां आयोजित श्रीमद्भागवत महापुराण की दिव्य कथा ने पूरे वातावरण को आध्यात्मिकता से सराबोर कर दिया। मंत्रों की मधुर ध्वनि और कथा की अमृतवाणी से भक्तजन भावविभोर होकर प्रभु भक्ति में लीन दिखाई दिए।
इसी पावन अवसर पर धार्मिक एवं सांस्कृतिक प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया, जिसमें क्षेत्र की अनेक प्रतिभाओं ने भाग लेकर अपनी कला का प्रदर्शन किया। एकल गायन प्रतियोगिता में प्रतिभागियों ने भक्ति के सुरों से वातावरण को भक्तिमय बना दिया। हर प्रस्तुति में श्रद्धा और समर्पण का भाव स्पष्ट दिखाई दे रहा था।

प्रतियोगिता के दौरान शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय महमंद की व्याख्याता शांति सोनी की प्रस्तुति सबसे अधिक मनोहारी रही। उन्होंने अपनी मधुर वाणी से ऐसा भक्ति रस प्रवाहित किया कि पूरा परिसर मंत्रमुग्ध हो उठा। उनका गायन केवल एक प्रस्तुति नहीं बल्कि साधना की अनुभूति प्रतीत हो रहा था। हर स्वर में भक्ति और हर शब्द में गहरी भावना झलक रही थी, जिसे सुनकर श्रोताओं की आंखें भावविभोर हो उठीं।
निर्णायकों ने उनके उत्कृष्ट गायन की सराहना करते हुए उन्हें एकल गायन प्रतियोगिता में प्रथम स्थान से सम्मानित किया। इस अवसर पर उनका सम्मान पुष्पा साहू, निशा यज्ञेश सोनी, गौरी कश्यप तथा भागवत पीठ के आचार्य पंडित मुरारी मोहन पांडे द्वारा किया गया। उपस्थित जनसमूह ने तालियों की गड़गड़ाहट से उनका अभिनंदन किया।

कार्यक्रम में भक्ति और संस्कृति के साथ-साथ सामाजिक चिंतन की धारा भी प्रवाहित हुई। इस अवसर पर महान समाज सुधारक और भारतीय संविधान के शिल्पी डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर के विचारों को भी स्मरण किया गया। उनके समता, शिक्षा और नारी सम्मान के सिद्धांत आज भी समाज के लिए मार्गदर्शक हैं।
डॉ. अंबेडकर का मानना था कि समाज की वास्तविक प्रगति तभी संभव है जब महिलाओं को शिक्षा, सम्मान और समान अवसर प्राप्त हों। उन्होंने महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए ऐतिहासिक पहल करते हुए हिंदू कोड बिल जैसे प्रगतिशील विधेयक का समर्थन किया, जिससे महिलाओं को संपत्ति और उत्तराधिकार में समान अधिकार मिल सके।
उनके विचारों में नारी केवल करुणा की प्रतीक नहीं बल्कि शक्ति, स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता की जीवंत प्रतिमूर्ति है। शिक्षा को उन्होंने नारी मुक्ति का सबसे प्रभावी साधन बताया और समाज से आह्वान किया कि वह महिलाओं को बराबरी का सम्मान दे।
छठ घाट तोरवा में आयोजित यह कार्यक्रम केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि भक्ति, संस्कृति और सामाजिक जागरूकता का प्रेरणादायक संगम बन गया। ऐसे आयोजन समाज में संस्कारों और प्रतिभाओं को नई दिशा देते हैं तथा समता और सम्मान के मूल्यों को मजबूत करते हैं।
प्रदीप मिश्रा
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