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आदिवासी भूमि सुरक्षा को लेकर राज्यपाल से संवैधानिक हस्तक्षेप की मांग

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भुवनेश्वर, ओडिशा

By ACGN 7647981711, 9303948009

पंचम अनुसूची, भूमि कानून और सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों का हवाला देकर निरंजन बिशी ने की कड़ी कार्रवाई की मांग

भुवनेश्वर ACGN: आदिवासी समाज की जमीनों पर बढ़ते अवैध कब्जे, बेनामी सौदों, फर्जी हस्तांतरण और गैरकानूनी प्लॉटिंग को गंभीर संवैधानिक संकट बताते हुए वरिष्ठ जनप्रतिनिधि निरंजन बिशी ने ओडिशा के महामहिम राज्यपाल को विस्तृत पत्र भेजकर तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। उन्होंने कहा कि अनुसूचित जनजातियों की भूमि केवल संपत्ति नहीं बल्कि उनकी पहचान, संस्कृति, परंपरा और आजीविका का आधार है और इसकी रक्षा करना राज्य का संवैधानिक दायित्व है।
पत्र में उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 244 के तहत लागू पंचम अनुसूची का उल्लेख करते हुए कहा कि अनुसूचित क्षेत्रों में विशेष प्रशासनिक व्यवस्था का प्रावधान है और राज्यपाल को आदिवासी भूमि के हस्तांतरण पर रोक लगाने के लिए विशेष विनियम बनाने का अधिकार प्राप्त है। साथ ही अनुच्छेद 46 राज्य को अनुसूचित जनजातियों को सामाजिक अन्याय और शोषण से बचाने का निर्देश देता है, जबकि अनुच्छेद 338A के तहत राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की स्थापना उनके अधिकारों की रक्षा के लिए की गई है।
निरंजन बिशी ने अपने पत्र में ओडिशा भूमि सुधार अधिनियम 1960 की धारा 23 का हवाला देते हुए कहा कि अनुसूचित जनजाति से गैर अनुसूचित जनजाति को भूमि हस्तांतरण बिना अनुमति अवैध है और ऐसी भूमि को वापस दिलाने का स्पष्ट प्रावधान है। इसके साथ ही पेसा अधिनियम 1996 ग्रामसभा को भूमि मामलों में निर्णायक अधिकार देता है, जबकि एससी एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 के तहत आदिवासी भूमि से बेदखली और अवैध कब्जे को दंडनीय अपराध माना गया है।
पत्र में उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के कई महत्वपूर्ण फैसलों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि समता बनाम आंध्र प्रदेश राज्य 1997 मामले में न्यायालय ने अनुसूचित क्षेत्रों की भूमि को गैर आदिवासियों या निजी कंपनियों को हस्तांतरित करना शून्य और अवैध बताया था। वहीं मांचेगौड़ा बनाम कर्नाटक राज्य 1984 में अदालत ने आदिवासी भूमि की वापसी संबंधी कानूनों को वैध ठहराया था। इसके अलावा नियामगिरि ग्रामसभा मामला 2013 में ग्रामसभा की अंतिम सहमति को अनिवार्य माना गया था।
उन्होंने कहा कि इन सभी संवैधानिक प्रावधानों और न्यायिक फैसलों से स्पष्ट है कि आदिवासी भूमि का प्रत्यक्ष या परोक्ष हस्तांतरण पूरी तरह निषिद्ध है। बेनामी सौदे अवैध हैं, अवैध कब्जाधारियों को हटाना जरूरी है और मूल आदिवासी भू स्वामियों को उनकी जमीन लौटाना राज्य का कर्तव्य है।
निरंजन बिशी ने राज्यपाल से मांग की कि पूरे राज्य में विशेष अभियान चलाकर सभी अवैध भूमि हस्तांतरणों को निरस्त किया जाए, स्वतः संज्ञान लेकर भूमि बहाली की प्रक्रिया शुरू की जाए, दोषियों पर आपराधिक प्रकरण दर्ज किए जाएं और ऐसे मामलों में संलिप्त अधिकारियों के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।
उन्होंने कहा कि यह संघर्ष केवल जमीन का नहीं बल्कि न्याय, अधिकार, संविधान और सम्मान की रक्षा का प्रश्न है। यदि इस विषय पर शीघ्र कार्रवाई होती है तो यह आदिवासी समाज के संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में ऐतिहासिक कदम साबित होगा।

प्रदीप मिश्रा
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