“सपना आत्मनिर्भर भारत का, राजनीति मुफ्त वादों की — आखिर देश किस दिशा में?”
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संपादकीय
By ACGN 7647981711, 9303948009
✍️ ‘कलम की धार’ ✍️
निष्पक्ष • निर्भीक • जनहित की आवाज़
अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ का साप्ताहिक विशेषांक कलम की धार” अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ का साप्ताहिक विशेष संपादकीय स्तंभ है, जिसमें हर सप्ताह जनहित से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर निष्पक्ष, निर्भीक, जनहित, तथ्य और साहस का साप्ताहिक मंच-जहाँ “सच की धार, जनहित का विचार” “जहाँ सवाल सत्ता से भी पूछे जाते हैं””यहाँ मुद्दों से समझौता नहीं होता,यहाँ सवाल सीधे व्यवस्था से पूछे जाते हैं। और कीमत जानकर भी कलम नहीं रुकती, कलम की धार – निष्पक्ष, निर्भीक और जनहित की आवाज़ जो हर सप्ताह समाज और जनजीवन से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपनी स्पष्ट, निष्पक्ष और निर्भीक राय प्रस्तुत करता है।
इस विशेषांक का उद्देश्य केवल समाचार देना नहीं, बल्कि उन नीतियों, समस्याओं और परिस्थितियों पर प्रकाश डालना है जिनका सीधा संबंध आम नागरिक के जीवन, अधिकारों और भविष्य से होता है। शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली, सामाजिक चुनौतियाँ, आर्थिक परिस्थितियाँ और जनता से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर हर सप्ताह “कलम की धार” के माध्यम से गंभीर और तथ्यात्मक लेख प्रस्तुत किए जाते हैं। इसी क्रम में इस सप्ताह “कलम की धार” में देश की राजनीति और अर्थव्यवस्था से जुड़े एक महत्वपूर्ण विषय मुफ्त की रेवड़ियों की राजनीति बनाम आत्मनिर्भर भारत के सपने पर विचार प्रस्तुत किया गया है। जनहित से जुड़े ऐसे ही गंभीर सवालों को उठाना और समाज में सकारात्मक विमर्श को आगे बढ़ाना ही “कलम की धार” का उद्देश्य है।
आज का विषय – रेवड़ियों की राजनीति बनाम आत्मनिर्भर भारत : क्या लोकतंत्र तात्कालिक लाभ के जाल में फंस रहा है?
आलेख प्रदीप मिश्रा
भारत आज एक ऐसे ऐतिहासिक दौर से गुजर रहा है जहाँ राष्ट्र निर्माण की दीर्घकालिक नीतियों और चुनावी राजनीति की तात्कालिक लोकप्रियता के बीच गहरा संघर्ष दिखाई देता है। एक ओर देश आर्थिक शक्ति बनने, वैश्विक नेतृत्व करने और आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर चुनावी मंचों से लगातार मुफ्त सुविधाओं की घोषणाओं की गूंज सुनाई देती है। कही बिजली मुफ्त, पानी मुफ्त, अनाज मुफ्त, यात्रा मुफ्त, लैपटॉप मुफ्त, कर्ज माफी, नकद सहायता मानो राजनीति का एक बड़ा हिस्सा अब “मुफ्त की रेवड़ियों” के इर्द-गिर्द घूमने लगा हो।
लोकतंत्र में जनता को राहत देना गलत नहीं है, बल्कि सामाजिक न्याय की भावना से यह आवश्यक भी हो सकता है। लेकिन जब शासन का मूल दर्शन ही मुफ्त वितरण बन जाए और उत्पादन, रोजगार, कौशल विकास तथा आर्थिक मजबूती पीछे छूट जाए, तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या हम अपने भविष्य को गिरवी रखकर वर्तमान की लोकप्रियता खरीद रहे हैं।
स्वतंत्रता के बाद का भारत और कल्याणकारी राज्य की अवधारणा
जब भारत ने 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त की, तब देश अत्यंत कठिन परिस्थितियों से गुजर रहा था। गरीबी व्यापक थी, उद्योग नगण्य थे, कृषि व्यवस्था कमजोर थी और शिक्षा व स्वास्थ्य की स्थिति बेहद सीमित थी। ऐसे समय में राज्य की भूमिका केवल शासन चलाने तक सीमित नहीं रह सकती थी। इसी पृष्ठभूमि में भारत ने कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को अपनाया।
सरकार ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली, खाद्यान्न सब्सिडी, ग्रामीण विकास कार्यक्रम, कृषि सहायता और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को लागू किया ताकि समाज के कमजोर वर्गों को न्यूनतम जीवन सुरक्षा मिल सके।
इन योजनाओं का उद्देश्य था गरीबों को संरक्षण देना, समाज में असमानता कम करना और आर्थिक विकास के लिए आधार तैयार करना।
लेकिन समय के साथ इन योजनाओं का स्वरूप कई स्थानों पर बदलने लगा। सामाजिक सुरक्षा की नीतियां धीरे-धीरे चुनावी राजनीति का प्रमुख हथियार बनती चली गईं।
चुनावी राजनीति और रेवड़ियों की संस्कृति
भारतीय लोकतंत्र में चुनाव जनता की आकांक्षाओं का उत्सव होते हैं। लेकिन जब चुनावी राजनीति में दीर्घकालिक नीतियों की जगह तात्कालिक लाभ के वादे हावी होने लगें, तब लोकतंत्र की गुणवत्ता प्रभावित होने लगती है। आज कई चुनावी घोषणापत्रों में विकास की ठोस योजनाओं की तुलना में मुफ्त सुविधाओं की लंबी सूची दिखाई देती है।
राजनीतिक दलों के बीच एक अदृश्य प्रतिस्पर्धा चलती दिखाई देती है कौन ज्यादा मुफ्त दे सकता है।
कोई मुफ्त बिजली का वादा करता है, कोई मुफ्त गैस का, कोई मुफ्त लैपटॉप का, कोई नकद सहायता का।
लेकिन इन घोषणाओं के पीछे एक मूल प्रश्न अक्सर अनुत्तरित रह जाता है इन योजनाओं का आर्थिक स्रोत क्या होगा?
कुछ भी वास्तव में मुफ्त नहीं होता
अर्थशास्त्र हमें एक सरल लेकिन कठोर सत्य बताता है किसी भी संसाधन की कीमत होती है।
जब सरकार मुफ्त योजनाओं की घोषणा करती है, तो उसका खर्च सरकारी खजाने से आता है। यह पैसा दो स्रोतों से आता है, करों के माध्यम से या कर्ज के माध्यम से यदि सरकार का खर्च लगातार बढ़ता जाए और आय उसी अनुपात में न बढ़े, तो वित्तीय असंतुलन पैदा होता है। धीरे-धीरे यही असंतुलन आर्थिक संकट का कारण बन सकता है।
भारत के कई राज्यों की वित्तीय स्थिति पहले से ही दबाव में है। कई राज्यों के बजट का बड़ा हिस्सा सब्सिडी और मुफ्त योजनाओं में खर्च हो जाता है।
इसके कारण शिक्षा, स्वास्थ्य, अधोसंरचना और उद्योग जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों के लिए संसाधन सीमित हो जाते हैं।
बढ़ता सार्वजनिक कर्ज और भविष्य की चिंता
जब सरकारें अपने खर्च को पूरा करने के लिए कर्ज लेती हैं, तो उसका बोझ केवल वर्तमान पीढ़ी पर नहीं पड़ता बल्कि आने वाली पीढ़ियों पर भी पड़ता है।कर्ज के साथ ब्याज का बोझ भी जुड़ता जाता है।धीरे-धीरे स्थिति यह बन सकती है कि सरकार की आय का बड़ा हिस्सा केवल कर्ज और ब्याज चुकाने में ही खर्च होने लगे।
इतिहास में कई देशों के उदाहरण हैं जहाँ अत्यधिक सार्वजनिक कर्ज ने आर्थिक संकट को जन्म दिया।यदि आर्थिक अनुशासन न रखा जाए तो ऐसी स्थिति किसी भी देश के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है।
सुप्रीम कोर्ट में भी उठी बहस
भारत में मुफ्त योजनाओं की राजनीति पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस तब तेज हुई जब उच्च न्यायालय में चुनावी घोषणाओं में मुफ्त सुविधाओं के मुद्दे पर चर्चा हुई। इस बहस में यह प्रश्न उठाया गया कि क्या चुनावों में असीमित मुफ्त योजनाओं का वादा लोकतंत्र की स्वस्थ परंपरा के अनुरूप है या यह वित्तीय अनुशासन और नीति निर्माण को प्रभावित करता है। यह बहस इस बात का संकेत है कि यह मुद्दा केवल राजनीतिक नहीं बल्कि संवैधानिक और आर्थिक महत्व का विषय बन चुका है।
योजनाओं की विफलता और क्रियान्वयन की समस्या
भारत में कई योजनाएं अच्छे उद्देश्य से शुरू की जाती हैं, लेकिन अक्सर उनका क्रियान्वयन कमजोर रहता है। कहीं भ्रष्टाचार रास्ता रोक देता है, कहीं प्रशासनिक ढिलाई, और कहीं योजना की संरचना में ही खामियां होती हैं। परिणाम यह होता है कि योजना की घोषणा जितनी आकर्षक होती है, उसका प्रभाव उतना मजबूत नहीं हो पाता।
कई बार योजनाएं कागजों और विज्ञापनों में अधिक दिखाई देती हैं, जबकि जमीन पर उनका असर सीमित रह जाता है।
सामाजिक चेतना पर प्रभाव : कमजोर होता स्वावलंबन
किसी भी राष्ट्र की असली ताकत उसके नागरिकों की मेहनत, कौशल और उद्यमिता में होती है। जब समाज में यह मानसिकता बनने लगे कि सरकार ही सब कुछ उपलब्ध कराएगी, तब स्वावलंबन की भावना धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है। यह स्थिति केवल आर्थिक समस्या नहीं बल्कि सामाजिक चेतना की चुनौती भी है। स्वावलंबन की भावना कमजोर पड़ने लगे तो समाज की उत्पादक शक्ति भी प्रभावित होती है।
आत्मनिर्भर भारत : एक राष्ट्रीय दृष्टि
भारत ने हाल के वर्षों में आत्मनिर्भरता को राष्ट्रीय लक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया है। आत्मनिर्भर भारत का अर्थ केवल आर्थिक आत्मनिर्भरता नहीं है बल्कि तकनीकी, औद्योगिक, कृषि और रणनीतिक क्षेत्रों में भी मजबूत होना है।
इसके लिए आवश्यक है उद्योगों का विस्तार, रोजगार सृजन, कौशल विकास,नवाचार और अनुसंधान, उद्यमिता को प्रोत्साहन
जब देश का युवा रोजगार खोजने वाला नहीं बल्कि रोजगार उत्पन्न करने वाला बनेगा, तभी वास्तविक आत्मनिर्भरता संभव होगी।
वैश्विक अनुभव : उत्पादन से बनती है शक्ति
दुनिया के कई देशों ने यह सिद्ध किया है कि आर्थिक शक्ति का वास्तविक आधार उत्पादन और नवाचार होता है। पूर्वी एशिया के कई देशों ने शिक्षा, तकनीक और उद्योग पर ध्यान देकर कुछ ही दशकों में अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत बना लिया। उन्होंने नागरिकों को अवसर दिए, कौशल विकसित किया और उत्पादन आधारित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दिया। भारत के सामने भी यही रास्ता खुला हुआ है।
राजनीति की जिम्मेदारी
राजनीति केवल चुनाव जीतने का माध्यम नहीं है।राजनीति का वास्तविक उद्देश्य राष्ट्र को दिशा देना और समाज को सशक्त बनाना होता है।
नेतृत्व की जिम्मेदारी है कि वह तात्कालिक लोकप्रियता के दबाव से ऊपर उठकर दीर्घकालिक नीतियों को प्राथमिकता दे। ऐसी नीतियां जो युवाओं को अवसर दें, उद्योगों को प्रोत्साहन दें और समाज को आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ाएं।
संतुलन ही समाधान
यह भी सच है कि समाज के कमजोर वर्गों को सुरक्षा की आवश्यकता होती है। सामाजिक सुरक्षा योजनाएं किसी भी संवेदनशील समाज की जिम्मेदारी होती हैं। लेकिन सामाजिक सुरक्षा और स्थायी निर्भरता के बीच अंतर समझना आवश्यक है।
नीतियां ऐसी होनी चाहिए जो जरूरतमंदों को सहारा दें, लेकिन साथ ही उन्हें आत्मनिर्भर बनने का अवसर भी प्रदान करें।
भारत के सामने निर्णायक प्रश्न
आज भारत के सामने एक ऐतिहासिक प्रश्न खड़ा है, क्या हम तात्कालिक लोकप्रियता के लिए अपने भविष्य को जोखिम में डाल रहे हैं?
क्या हम एक ऐसे समाज का निर्माण कर रहे हैं जो सहायता का अभ्यस्त हो जाए, या एक ऐसे राष्ट्र का जो अपने श्रम और स्वाभिमान से आगे बढ़े?
रेवड़ियों से नहीं, स्वाभिमान से बनेगा आत्मनिर्भर भारत
इतिहास गवाह है कि कोई भी राष्ट्र केवल रियायतों और अनुदानों से महान नहीं बनता। महान राष्ट्र वे होते हैं जहाँ नागरिक मेहनत करते हैं, नवाचार करते हैं और अपनी क्षमता से समाज को आगे बढ़ाते हैं।भारत को भी यही रास्ता चुनना होगा। नीतियां ऐसी हों जो जरूरतमंदों को सहारा दें, लेकिन साथ ही उन्हें आत्मनिर्भर बनने का अवसर भी प्रदान करें। क्योंकि राष्ट्र निर्माण का आधार मुफ्त की सुविधाएं नहीं बल्कि मेहनत, उत्पादन, नवाचार और स्वाभिमान होता है। और यदि भारत को सच में विश्व में अग्रणी शक्ति बनना है, तो उसे रेवड़ियों की राजनीति से ऊपर उठकर आत्मनिर्भरता और सशक्तिकरण की राह को ही अपना मार्ग बनाना होगा।
अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ देश में तेजी से बढ़ता वेब पोर्टल
जब सवाल जनहित का हो, तब कलम की धार तेज होना ही चाहिए।” “जनता के सवालों को शब्द देना ही पत्रकारिता का धर्म है।”निष्पक्षता हमारा सिद्धांत है, निर्भीकता हमारी ताकत है और जनहित हमारी प्रतिबद्धता है।
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