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दूध बाजार में कॉरपोरेट की एंट्री: किसानों और सहकारी समितियों पर असर

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नागरिक परिक्रमा

By ACGN 7647981711, 9303948009

(संजय पराते की राजनीतिक टिप्पणियां)
एक रुपये प्रति लीटर में दूध!
रायपुर। देश में दुग्ध क्षेत्र और सहकारिता व्यवस्था के सामने एक नई चुनौती उभरती दिखाई दे रही है। कर्नाटक में एक बड़े ऑनलाइन खरीद-बिक्री मंच द्वारा प्रचार अभियान के तहत एक रुपये प्रति लीटर दूध बेचे जाने का मामला चर्चा का विषय बना हुआ है। यह मंच एक अमेरिकी खुदरा व्यापार समूह के स्वामित्व में संचालित होता है।
जानकारी के अनुसार प्रचार अवधि के दौरान लाखों लीटर दूध अत्यंत कम कीमत पर बेचा गया। इसका सीधा असर राज्य की सहकारी दुग्ध संस्थाओं पर पड़ा है। विशेष रूप से बेंगलुरु दुग्ध संघ जैसी सहकारी संस्थाओं की बिक्री में प्रतिदिन लगभग पचास हजार लीटर की कमी दर्ज की गई है। इससे पशुपालकों और दूध उत्पादक किसानों की आजीविका प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऐसी स्थिति लंबे समय तक जारी रही तो कर्नाटक की सहकारी दुग्ध समितियों के सामने गंभीर संकट खड़ा हो सकता है। सहकारी संस्थाएं लंबे समय से किसानों को बाजार उपलब्ध कराने और उनके उत्पाद का उचित मूल्य दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही हैं।
बाजार पर कब्जे की आशंका
टिप्पणीकार संजय पराते के अनुसार एक रुपये प्रति लीटर की दर से दूध बेचना केवल साधारण प्रचार अभियान नहीं है, बल्कि बड़ी कंपनियों की उस नीति का उदाहरण हो सकता है जिसमें शुरुआत में अत्यंत कम कीमत रखकर बाजार पर कब्जा करने की कोशिश की जाती है।
ऐसी रणनीतियों का उद्देश्य स्थानीय सहकारी संस्थाओं को कमजोर करना, घरेलू उत्पादन प्रणाली को नुकसान पहुंचाना और अंततः खरीद-वितरण व्यवस्था पर बड़ी कंपनियों का नियंत्रण स्थापित करना होता है। इससे स्थानीय किसानों और छोटे उत्पादकों के सामने आजीविका का संकट पैदा हो सकता है।
दुग्ध उत्पादक किसानों में बढ़ती चिंता
कर्नाटक के दुग्ध उत्पादक किसानों के बीच इस मामले को लेकर नाराजगी भी सामने आई है। उनका कहना है कि पहले से ही दुग्ध क्षेत्र बढ़ती लागत, भुगतान में देरी और दूध के लिए उचित लाभकारी मूल्य न मिलने जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। ऐसे समय में बड़े कारोबारी मंच द्वारा अत्यंत कम कीमत पर दूध बेचना किसानों की आय पर सीधा असर डाल सकता है।
बताया जा रहा है कि दूध की बिक्री घटने के कारण कई सहकारी समितियों ने किसानों से दूध की खरीद भी कम कर दी है। इससे किसानों पर दोहरी मार पड़ रही है—एक ओर उन्हें दूध का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है और दूसरी ओर बिक्री भी घट रही है।
जांच की मांग
इस पूरे मामले में यह भी कहा जा रहा है कि इस प्रकार की मूल्य निर्धारण नीति निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा के सिद्धांतों का उल्लंघन हो सकती है और इसकी जांच की जानी चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे सहकारी संस्थाओं और किसानों के हितों की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाए जाने चाहिए।
संजय पराते का कहना है कि यदि समय रहते इस प्रकार की गतिविधियों पर नियंत्रण नहीं किया गया तो भविष्य में सहकारी संस्थाओं के सामने और बड़े संकट खड़े हो सकते हैं। उनका मानना है कि दुग्ध क्षेत्र में सहकारिता व्यवस्था को मजबूत करना किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के हित में अत्यंत आवश्यक है।

संजय पराते

(टिप्पणीकार संजय पराते अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं।)
संपर्क : 94242-31650 📞

प्रदीप मिश्रा
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