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सच की तह तक

शिक्षा या व्यापार ? सरकारी अनदेखी और निजी स्कूलों के मुनाफाखोरी के बीच अभिभावकों के जेब खली करने का खेल

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संपादकीय

अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ साप्ताहिक विशेषांक

✍️ ‘कलम की धार’ ✍️

By ACGN 7647981711, 9303948009

जनहित, तथ्य और साहस का साप्ताहिक मंच-जहाँ सच कहा जाता है, सवाल पूछे जाते हैं, और कीमत जानकर भी कलम नहीं रुकती।

कलम की धार’ कोई औपचारिक कॉलम नहीं, बल्कि व्यवस्था के मौन को तोड़ने वाली आवाज़ है। यह उन सवालों की चोट है, जिन्हें फाइलों में दबा दिया जाता है;
उन सच्चाइयों का आईना है, जिन्हें विकास की चमक में छुपा दिया जाता है।

कलम की धार केवल शब्दों का स्तंभ नहीं, बल्कि समाज की उन दबती आवाज़ों का आईना है जिन्हें अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। यह मंच सच बोलने, सच्चाई उजागर करने और जनता के हितों की रक्षा करने के लिए हमेशा प्रतिबद्ध रहा है। आज हम उसी साहस के साथ उन मुद्दों की ओर ध्यान खींच रहे हैं जो देश के लाखों मध्यमवर्गीय परिवारों के जीवन में प्रतिदिन कठिनाई पैदा कर रहे हैं—निजी स्कूलों की मनमानी, शुल्क वसूली, किताबों और गतिविधियों के माध्यम से होने वाली आर्थिक शोषण, और सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता पर अनदेखी।

यह लेख उन असंख्य अभिभावकों की पीड़ा, उनके संघर्ष और उनके वास्तविक अनुभवों को उजागर करता है, जो अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित बनाने के लिए व्यक्तिगत बलिदान करते हैं। इस लेख का उद्देश्य केवल समस्याओं को बताना नहीं, बल्कि प्रशासन, नीति निर्माताओं और समाज को यह समझाना है कि शिक्षा केवल व्यवसाय नहीं बल्कि बच्चों के बौद्धिक, मानसिक, शारीरिक और संस्कारिक विकास का आधार है।

आज का विषय :- निजी स्कूल माफिया और सरकारी शिक्षा सुधार: मध्यमवर्गीय परिवारों की पीड़ा

आलेख – प्रदीप मिश्रा

 नर्सरी से बारहवीं: “शिक्षा या व्यापार?”

आज की शिक्षा प्रणाली में प्रवेश की पहली चुनौती नर्सरी या एलकेजी से शुरू होती है। माता-पिता को बच्चों को एडमिशन दिलाने के लिए एडमिशन फीस, वार्षिक शुल्क, यूनिफॉर्म, किताबें, बैग और अन्य जरूरी सामग्री के लिए हजारों रुपये खर्च करने पड़ते हैं। कई निजी स्कूलों में यह शुरुआती खर्च 20 से 30 हजार रुपये तक पहुंच जाता है।वहीँ मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए यह चुनौती कई बार उनके बजट को सीधा प्रभावित करती है। घर का किराया, राशन, बिजली बिल और अन्य आवश्यक खर्च पहले से ही दबाव डालते हैं, और शिक्षा का यह अतिरिक्त बोझ परिवार को आर्थिक रूप से कमजोर कर देता है। अपने बच्चो के उज्जवल भविष्य के लिए अभिभावक अक्सर अपनी व्यक्तिगत जरूरतों को पीछे छोड़ देते हैं, उधार लेते हैं या अपने बचत खाते को तोड़कर बच्चों का एडमिशन कराते हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि शिक्षा आज धीरे-धीरे सेवा से व्यापार में बदल रही है।

यहां  सवाल यह उठता है कि क्या शिक्षा केवल बच्चों को डिग्री दिलाने का माध्यम बन गई है, या बच्चों का मानसिक, बौद्धिक, शारीरिक और संस्कारिक विकास भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जब बच्चे केवल फीस देने के आधार पर एडमिशन पाते हैं और शिक्षा प्रणाली केवल पैसे पर केंद्रित होती है, तो परिवार और समाज दोनों ही नुकसान में रहते हैं।

मनमानी फीस और अतिरिक्त शुल्क का बोझ

वर्तमान समय में निजी स्कूलों में फीस का मुद्दा अभिभावकों की सबसे बड़ी चिंता बन चुका है। हर साल नए सत्र के साथ फीस बढ़ाई जाती है। स्कूल प्रबंधन ट्यूशन, वार्षिक, स्मार्ट क्लास, कंप्यूटर, खेल और परिवहन जैसे कई नामों से अतिरिक्त शुल्क वसूलता है। जिससे अभिभावक अक्सर मजबूर होते हैं, अपने व्यक्तिगत खर्चों में कटौती करके या उधार लेकर बच्चों की पढ़ाई जारी रखते हैं। इससे घर की आर्थिक स्थिरता प्रभावित होती है और परिवार पर तनाव बढ़ता है।, इस स्थिति में यह सवाल उठता है कि क्या शिक्षा का उद्देश्य केवल वित्तीय लाभ कमाना है, या बच्चों का सर्वांगीण विकास सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है। कई बार परिवार ऐसे निर्णय लेने को मजबूर होते हैं जो उनके लिए आर्थिक रूप से नुकसानदायक होते हैं। इस अतिरिक्त बोझ का सीधा असर बच्चों पर भी पड़ता है। अभिभावक तनावग्रस्त होते हैं, बच्चे दबाव महसूस करते हैं, और शिक्षा का आनंद और प्राकृतिक सीखने की प्रक्रिया प्रभावित होती है। इस प्रणाली में शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य ज्ञान और व्यक्तित्व का विकास पीछे रह जाता है।

एक अभिभावक ने बताया कि नर्सरी में एडमिशन के लिए उसे अपनी बचत तोड़नी पड़ी और परिवार से उधार लेना पड़ा।

किताबों और कॉपियों में कमीशन खेल

वर्तमान में अभिभावकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती नई किताबों और कॉपियों को लेकर होती है। अधिकांश निजी स्कूल अभिभावकों को केवल एक निर्धारित दुकान से किताबें खरीदने के लिए बाध्य करते हैं।, इसके पीछे कमीशन का खेल चलता है। कई मामलों में स्कूल और दुकानदार के बीच 10-20 प्रतिशत तक कमीशन तय होता है। इसके कारण अभिभावकों को किताबों के साथ साथ दुकानदारो के दबाव में अतिरिक्त सामग्री खरीदनी पड़ती है जो बच्चों के लिए आवश्यक नहीं होती, लेकिन उसका मनमाना पैसा वसूला जाता है।, अभिभावक मजबूरी में यह सब खरीदते हैं क्योंकि वे बच्चों की पढ़ाई से समझौता नहीं करना चाहते। परिणामस्वरूप शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और न्याय का प्रश्न खड़ा हो जाता है।यह सिस्टम केवल पैसों पर केंद्रित है, जबकि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य बच्चों के ज्ञान, बौद्धिक क्षमता और मानसिक विकास को बढ़ावा देना होना चाहिए

कई माता-पिता ने बताया कि किताबों और यूनिफॉर्म के नाम पर कमीशन के कारण उन्हेंबिना कम की चीजे लेनी पड़ी और कीमतों में बाजार के दर से अधिक अतिरिक्त पैसा देना पड़ा।

यूनिफॉर्म और गतिविधियों का अतिरिक्त बोझ

वहीँ स्कुलो में अलग- अलग यूनिफॉर्म और गतिविधियों के नाम पर अभिभावकों पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव पड़ता है। कई स्कूलों में यूनिफॉर्म केवल एक निर्धारित दुकान से ही खरीदने का नियम होता है। इसके अलावा स्कूलों में विभिन्न गतिविधियों जैसे डांस, म्यूजिक, आर्ट, वार्षिक उत्सव, पिकनिक व अन्य गतिविधियों के लिए अलग से शुल्क वसूला जाता है। बच्चों का सर्वांगीण विकास आवश्यक है, लेकिन जब इन गतिविधियों का उद्देश्य केवल अतिरिक्त शुल्क वसूली बन जाए, तो यह अभिभावकों के लिए वित्तीय बोझ और बच्चों के लिए दबाव का कारण बनता है। इस स्थिति में सवाल उठता है कि क्या शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा और शुल्क वसूली बन चुका है, या बच्चों का वास्तविक विकास सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है।

साल भर अलग अलग खर्चीले गतिविधियों के नाम पर अतिरिक्त शुल्क छोटे बच्चों के माता-पिता की जेब खाली कर देता है। कई बार ये गतिविधियां केवल पैसा वसूलने का माध्यम बन जाती हैं। इन अनुभवों से स्पष्ट है कि शिक्षा अब व्यापार बन चुकी है और मध्यमवर्गीय परिवार इसके केंद्र में फंसा हुआ है।

बच्चों का बौद्धिक, मानसिक और शारीरिक विकास प्रभावित

आज की शिक्षा प्रणाली केवल परीक्षा, रिज़ल्ट और फीस पर केंद्रित है। संस्कार, अनुशासन, सामाजिक समझ और सांस्कृतिक मूल्य अब पिछड़े स्थान पर हैं। आज के बच्चों का व्यक्तित्व, सोचने की क्षमता और शारीरिक विकास इस प्रणाली में कम ध्यान आकर्षित कर रहे हैं। यह स्थिति समाज के लिए चिंता का विषय है क्योंकि शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री देना नहीं बल्कि जिम्मेदार और जागरूक नागरिक बनाना होना चाहिए। जब शिक्षा व्यवस्था केवल व्यवसाय के रूप में काम करती है, तो बच्चों का सर्वांगीण विकास प्रभावित होता है और परिवारों की पीड़ा बढ़ती है।

जब बच्चों की बौद्धिक और मानसिक क्षमता को नजरअंदाज कर केवल आर्थिक लाभ को प्राथमिकता दी जाए, तो शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य खो जाता है।

 सरकारी स्कूलों की अनदेखी और शासन की जिम्मेदारी

आज सरकारें बड़ी-बड़ी योजनाओं मुफ्त राशन, मुफ्त बिजली, मुफ्त योजना मध्यान्ह भोजन, नास्ता कापी किताब युनिफर्म की घोषणा करती हैं। यह अच्छी पहल है, लेकिन शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत आवश्यकताओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं देती। सरकारी स्कूलों में कई जगह भव्य भवन बनाए गए हैं, लेकिन शिक्षकों की कमी और संसाधनों की कमीभी शिक्षा पर प्रभाव डालते है के कारण लोग निजी स्कूलों की ओर जाते हैं। और स्कूलों के अधूरे पड़े भवन भरष्टाचार की कहानी कहते है 

यदि सरकार चाहती तो सरकारी स्कूलों को निजी स्कूलों जैसी सुविधाओं से लैस कर सकती थी। इससे मध्यमवर्गीय परिवारों पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव नहीं पड़ता और बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सकती है। पर सरकार का शिक्षा और स्वास्थ्य पर पर्याप्त ध्यान नहीं देती।सरकारी स्कूलों में भव्य भवन हैं, लेकिन शिक्षक और संसाधनों की कमी और सरकार की योजनाओ में भरष्टाचार के कारण शिक्षा की गुणवत्ता निजी स्कूलों के स्तर से पीछे है। केवल स्कुलो में भोजन, नास्ता ,यूनिफार्म किताबो से शिक्षा की गुणवत्ता में सुधर नही होगा बल्कि उसमे कमिशन के नाम पर भरष्टाचार हो रहा है आ आगनबाडी में देखे रेडी टू इट के नाम पर बच्चो को पोषण आहार दिया जाता है कई आगंबाडीयो में  बच्चो की संख्या 50 से अधिक है पर क्या सभी बच्चो को वह मिल पता है उसे अलग से बेच कर कागजो में खाना पूर्ति की जाती है 

यदि प्रत्येक पंचायत में एक उच्च स्तरीय स्कूल बनाया जाए जिसमें शिक्षक, लाइब्रेरी, प्रयोगशाला, खेल मैदान और डिजिटल कक्षा हो, तो मध्यमवर्गीय परिवारों पर अतिरिक्त दबाव कम होगा। लोग निजी स्कुलो की बजाए सरकारी स्कुलो पर ध्यान देंगे 

इन सबके बीच सवाल यह उठते हैं कि

क्या शिक्षा का उद्देश्य केवल बच्चों को डिग्री दिलाना है या उनका सर्वांगीण विकास करना भी उतना ही जरूरी है?

क्या सरकार निजी स्कूलों की मनमानी से पीड़ित परिवारों की समस्याओं पर गंभीरता से ध्यान दे रही है?

क्या सरकारी स्कूलों में सभी सुविधाएं देने का प्रयास किया जा सकता है ताकि बच्चे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मुफ्त में प्राप्त कर सकें?

क्या शिक्षक और शिक्षा का स्तर प्राथमिकता नहीं बनाकर केवल भौतिक योजनाओं पर ध्यान देने से समस्या हल होगी?

क्या शिक्षा और स्वास्थ्य पर ध्यान देकर समाज में समान अवसर और बेहतर भविष्य सुनिश्चित किया जा सकता है?

ठोस सरकारी शिक्षा सुधार मॉडल

हर पंचायत में एक बड़ा सरकारी स्कूल, जिसमें लाइब्रेरी, प्रयोगशाला, खेल मैदान और डिजिटल कक्षा हो। शिक्षकों की नियमित भर्ती और प्रशिक्षण पर ध्यान। बच्चों के मानसिक, बौद्धिक और शारीरिक विकास के लिए गतिविधियों का उचित बजट। गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए पूरी तरह मुफ्त शिक्षा। यह मॉडल केवल सुविधाएं देने तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों के सर्वांगीण विकास और समाज में समान अवसर सुनिश्चित करता है।

आज के समय में बच्चों का सर्वांगीण विकास केवल ऑनलाइन पढ़ाई या परीक्षा की तैयारी तक सीमित नहीं रहना चाहिए। स्कूलों में शिक्षा का उद्देश्य बच्चों को ज्ञान प्रदान करने के साथ-साथ उनके संस्कार, संस्कृति, बौद्धिक, मानसिक और शारीरिक विकास को भी सुनिश्चित करना होना चाहिए। इस दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए स्कूल की दिनचर्या की शुरुआत सुबह प्रार्थना और मंत्र से की जानी चाहिए, जिससे बच्चों के मन में अनुशासन, शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो। इसके साथ ही बच्चों को भारत के इतिहास, स्वतंत्रता संग्राम और भारतीय महापुरुषों के जीवन और शिक्षाओं से परिचित कराया जाना चाहिए, ताकि उनमें देशभक्ति, आदर्श और संस्कार विकसित हों। पाठ्यक्रम की पढ़ाई केवल किताबों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसमें बौद्धिक खेल, पहेलियाँ और समस्या सुलझाने वाले अभ्यास शामिल किए जाएं, जिससे बच्चों की सोचने की क्षमता, तार्किक विवेक और रचनात्मकता विकसित हो। इसके साथ ही सप्ताह में एक दिन उन्हें गीता, रामायण और अन्य भारतीय ग्रंथों के ज्ञान से परिचित कराना चाहिए, ताकि उनके जीवन मूल्यों और नैतिक दृष्टिकोण में मजबूती आए।

बच्चों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर भी ध्यान देना आवश्यक है। स्कूल में रोज़ाना योग और व्यायाम के साथ-साथ खेल-कूद और सामूहिक गतिविधियों का समावेश होना चाहिए, जिससे बच्चों में सहनशीलता, टीम भावना और नेतृत्व क्षमता का विकास हो। भोजन का समय भी केवल भूख मिटाने का माध्यम न होकर समान्य मंत्र या शुद्धिकरण के साथ बच्चों को अनुशासन और कृतज्ञता का अनुभव देना चाहिए। दिन का समापन भी विसर्जन मंत्र और धन्यवाद प्रार्थना के साथ होना चाहिए, जिससे बच्चों के मन में सकारात्मकता और आत्मसंतुष्टि बनी रहे। इसके अतिरिक्त स्कूल समय-समय पर संस्कार दिवस का आयोजन कर बच्चों को समाज सेवा, पौधारोपण और सामुदायिक कार्यों में शामिल कर सकते हैं। अभिभावकों को भी कभी-कभी स्कूल में बुलाकर बच्चों के बौद्धिक, शारीरिक और संस्कारिक विकास की जानकारी दी जानी चाहिए।

यदि स्कूलों में शिक्षा का यह मॉडल अपनाया जाए तो ऑनलाइन शिक्षा की सीमाओं के बावजूद बच्चों का सर्वांगीण विकास सुनिश्चित किया जा सकता है, उन्हें देश और समाज के लिए जागरूक, सशक्त और संस्कारित नागरिक बनाया जा सकता है। इस दृष्टिकोण से शिक्षा केवल डिग्री या परीक्षा तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि बच्चों का चरित्र, सोच और जीवन मूल्य भी मजबूत होंगे।

शिक्षा केवल परीक्षा और फीस तक सीमित नहीं होनी चाहिए। यह बच्चों के संस्कार, संस्कृति, बौद्धिक, मानसिक और शारीरिक विकास की नींव है। यदि शासन ने शिक्षा और स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी, सरकारी स्कूलों को निजी स्कूलों जैसी सुविधाएँ दी, और शिक्षक तथा विद्यार्थियों के विकास पर ध्यान केंद्रित किया, तो समाज और देश दोनों मजबूत होंगे। अभिभावकों की वास्तविक समस्याओं को उजागर करना और शिक्षा प्रणाली में सुधार की दिशा में कदम उठाना अब किसी विकल्प का नहीं, बल्कि आवश्यक कदम का विषय है।

प्रदीप मिश्रा

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