“छत्तीसगढ़ की पुण्य भूमि:“मंत्र, महिमा और महाशक्ति, हर मंदिर में देवी का अद्भुत रूप: छत्तीसगढ़ की भक्ति यात्रा, शक्तिपीठों से आस्था का अनंत प्रवाह”
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संपादकीय
अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ की पेशकश चैत्र नवरात्रि विशेषांक:
धर्म श्रृंखला
माता का स्वरूप – छत्तीसगढ़ की पुण्य भूमि
आलेख : प्रदीप मिश्रा
मन्दिरं पुण्यभूमिश्च देवस्य सन्निधिः सदा । यत्र भक्तिः स्थिरा नित्यं तत्र श्रीर्नियता वसेत् ॥
छत्तीसगढ़, भारत की हृदयस्थली, अपने हरे-भरे जंगलों, पर्वतीय दृश्यों और प्राचीन विरासत के लिए जाना जाता है। इस भूमि पर देवी शक्तियों की उपस्थिति प्रत्येक को आध्यात्मिक ऊर्जा और भक्ति की अनुभूति कराती है। यहाँ के शक्तिपीठ, देवी मंदिर और तीर्थस्थल न केवल ऐतिहासिक और स्थापत्य दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि ये भक्तों के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और मार्गदर्शन का स्रोत भी हैं।
चैत्र नवरात्रि के अवसर पर यह भूमि श्रद्धालुओं का केंद्र बन जाती है। हर मंदिर, अपनी विशिष्ट कथाओं, स्थापत्य कला और प्राकृतिक वातावरण के माध्यम से भक्तों के हृदय को मंत्रमुग्ध कर देता है। इस विशेषांक में हम छत्तीसगढ़ के प्रमुख देवी मंदिरों और उनकी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक महत्ता का विस्तृत वर्णन प्रस्तुत कर रहे हैं।
महामाया मंदिर – रतनपुर

बिलासपुर जिले के रतनपुर का महामाया मंदिर 12वीं–13वीं शताब्दी में कलचुरी राजवंश द्वारा निर्मित किया गया था। यह 52 शक्तिपीठों में से एक है और नागर शैली की भव्य नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है। मंदिर का गर्भगृह देवी महामाया की प्रतिष्ठित प्रतिमा से सुसज्जित है।

मंदिर की भित्तियाँ देवी के विभिन्न रूपों और पौराणिक कथाओं से सजी हैं। मंडप, गर्भगृह और शिखर पर अद्भुत नक्काशी भक्तों को मंत्रमुग्ध कर देती है। नवरात्रि के दौरान मंदिर में भव्य मेला लगता है, जिसमें दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं।

स्थानीय मान्यता है कि महामाया संकट और विपत्तियों के समय भक्तों की रक्षा करती हैं। मंदिर के चारों ओर हरियाली और शांत वातावरण इसे और भी पवित्र बनाते हैं।

माँ चन्द्रहासिनी – जांजगीर-चांपा

जांजगीर-चांपा जिले के चंद्रपुर में स्थित यह मंदिर राजा चंद्रहास द्वारा निर्मित किया गया। देवी चन्द्रहासिनी का चंद्राकार स्वरूप यहाँ विशेष रूप से दर्शनीय है। मंदिर परिसर में अर्धनारीश्वर, नवग्रह, चार धाम और कई देवी-देवताओं की मूर्तियाँ स्थित हैं।

मंदिर की स्थापत्य कला अद्वितीय है। दीवारों पर अंकित पौराणिक चित्र और नक्काशी भक्तों को आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करती हैं। नवरात्रि में मंदिर में भव्य पूजा होती है और दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं।

स्थानीय कथाओं के अनुसार देवी संकट के समय अपने भक्तों की रक्षा करती हैं और उनके मनोकामनाओं को पूर्ण करती हैं। भक्त दीपक, फूल और फल अर्पित कर अपनी भक्ति प्रकट करते हैं।
चंडीमाता मंदिर – घुचापाली

महासमुंद जिले बागबाहरा के समीप घुचापाली की पहाड़ियों पर स्थित चंडीमाता मंदिर प्राचीन शक्तिपीठ है। यहाँ 10 फीट ऊँची विशाल देवी प्रतिमा है। मंदिर परिसर में बटुक भैरव, हनुमान, मां काली और शिवजी के दर्शनीय मंदिर भी हैं।

मंदिर की स्थापत्य कला अत्यंत सुंदर और भव्य है। शिखर, मंडप और दीवारों पर देवी के शक्ति स्वरूप की नक्काशी भक्तों को मंत्रमुग्ध कर देती है। प्राकृतिक घाटियाँ और हरियाली भक्तों को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देती हैं।

स्थानीय मान्यता है कि देवी चंडीमाता संकटों का नाश करती हैं और भक्तों को साहस और शक्ति प्रदान करती हैं। नवरात्रि में यहाँ भव्य उत्सव और कीर्तन आयोजित होते हैं।
खल्लारी माता मंदिर – महासमुंद

महासमुंद का खल्लारी माता मंदिर प्राचीन तीर्थस्थल है। महाभारत कालीन ‘खलवाटिका’ के नाम से विख्यात। मान्यता है कि यहीं भीम और हिडिंबा का विवाह हुआ था। मंदिर घने जंगलों से घिरा है और शांतिपूर्ण वातावरण में स्थित है।

मंदिर की दीवारें प्राचीन चित्रकला और नक्काशी से सजी हैं। परिसर में छोटे झरने और प्राकृतिक तालाब भक्तों के लिए आकर्षण हैं। नवरात्रि में भव्य पूजा और कीर्तन आयोजित होते हैं।

स्थानीय भक्त मानते हैं कि माता खल्लारी सभी इच्छाओं को पूर्ण करती हैं। मंदिर की भक्ति और प्राकृतिक सौंदर्य भक्तों के हृदय को मंत्रमुग्ध कर देता है।
पाताल भैरवी – राजनांदगांव

राजनांदगांव जिले में स्थित यह मंदिर शिवलिंगाकार तीन मंजिला संरचना में बना है। 1988 में निर्मित यह मंदिर पाताल में स्थित 15 फीट गहरे देवी दरबार के लिए प्रसिद्ध है।

मंदिर परिसर में देवी पाताल भैरवी की मूर्ति प्रमुख है। छोटे मंदिरों में हनुमानजी और शिवजी के दर्शनीय मंदिर हैं। मंदिर की भव्यता और शांत वातावरण भक्तों को आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करते हैं।
स्थानीय कथाओं के अनुसार देवी पाताल भैरवी भक्तों की सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करती हैं। नवरात्रि में मंदिर में भव्य आरती और कीर्तन भक्तों के हृदय को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देते हैं।
माँ बम्लेश्वरी – डोंगरगढ़
डोंगरगढ़ की 1600 फीट ऊँची पहाड़ी पर स्थित मां बम्लेश्वरी मंदिर लगभग 2200 वर्ष पुराना शक्तिपीठ है। इसे राजा वीरसेन ने बनवाया था। मंदिर का जीर्णोद्धार अक्षरधाम की तर्ज पर हुआ।

मंदिर की स्थापत्य कला अद्वितीय है। ऊँची पहाड़ी पर स्थित होने के कारण यहाँ पहुँचने पर भक्तों को अद्भुत प्राकृतिक दृश्य दिखाई देता है। मंदिर के गर्भगृह और मंडप में देवी बम्लेश्वरी की भव्य मूर्ति स्थापित है।

स्थानीय मान्यता है कि माता बम्लेश्वरी अपने भक्तों की रक्षा करती हैं और संकट के समय उनका मार्गदर्शन करती हैं। नवरात्रि में यहाँ भव्य उत्सव और कीर्तन भक्तों के मन को आध्यात्मिक आनंद से भर देते हैं।
माँ दंतेश्वरी – दंतेवाड़ा

दंतेवाड़ा का दंतेश्वरी मंदिर 14वीं शताब्दी में काकतीय शासकों द्वारा द्रविड़ शैली में निर्मित शक्तिपीठ है। पत्थरों से निर्मित मंदिर का गर्भगृह और महामंडप विशेष आकर्षण का केंद्र हैं।

स्थानीय मान्यता है कि यहाँ सती का दांत गिरा, इसलिए देवी दंतेश्वरी रूप में विराजमान हैं। मंदिर परिसर में छोटे मंदिरों में अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियाँ भी हैं।

नवरात्रि में यहाँ भव्य उत्सव होते हैं। भक्त दीपक, फूल और फल अर्पित कर अपनी भक्ति प्रकट करते हैं। मंदिर का शांत वातावरण भक्तों के मन को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देता है।
जतमई मंदिर-घटारानी मंदिर पहाड़ी – गरियाबंद

गरियाबंद जिले के घने जंगलों में स्थित जतमई मंदिर देवी दुर्गा को समर्पित है। ग्रेनाइट पत्थरों से निर्मित मंदिर के ऊँचे शिखर और दीवारों पर देवी-देवताओं की नक्काशी इसकी भव्यता बढ़ाते हैं।

प्रवेश द्वार पर पौराणिक भित्तिचित्र और परिसर में हनुमानजी की मूर्ति विशेष आकर्षण हैं। पास ही शिवलिंग और झरनों का प्राकृतिक सौंदर्य भक्तों को मंत्रमुग्ध कर देता है।

स्थानीय मान्यता है कि माता जतमई संकट के समय भक्तों की रक्षा करती हैं और उन्हें साहस और शक्ति प्रदान करती हैं। नवरात्रि में यहाँ भव्य पूजा और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं।

छत्तीसगढ़ की पहाड़ियों में स्थित घटारानी मंदिर देवी दुर्गा को समर्पित है। पारंपरिक और आधुनिक शैली की मिश्रित वास्तुकला, भित्तिचित्रों और मूर्तियों से सजा यह मंदिर प्राकृतिक सौंदर्य के बीच आस्था का केंद्र है।

नवरात्रि और दीपावली के अवसर पर यहां के भव्य उत्सव और सांस्कृतिक कार्यक्रम श्रद्धालुओं के मन को मोह लेते हैं। भक्त दीपक, फूल और फल अर्पित कर देवी की भक्ति में लीन होते हैं।
मां अंगारमोती मंदिर: धमतरी, छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में स्थित मां अंगारमोती मंदिर आस्था और लोकविश्वास का अत्यंत प्राचीन और पवित्र स्थल माना जाता है। जनश्रुतियों के अनुसार मां अंगारमोती को गंगरेल बांध के डूब क्षेत्र में बसे पुराने 52 गांवों की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है।

मान्यता है कि इन गांवों की स्थापना से पहले ही माता की प्रतिमा स्वयं धरती से प्रकट हुई थी, जिसके बाद आसपास के ग्रामीणों ने उन्हें अपनी कुलदेवी के रूप में स्वीकार कर लिया। लोगों का विश्वास है कि मां अंगारमोती अंगिरा ऋषि की पुत्री हैं और उनकी आराधना से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

सन 1973 में गंगरेल बांध बनने से पहले यह पूरा क्षेत्र 52 गांवों से आबाद था। बांध निर्माण के कारण कई गांव जलमग्न हो गए, तब माता की मूर्ति को मूल स्थान से हटाकर सुरक्षित स्थान पर स्थापित किया गया। वर्तमान में माता के चरण गंगरेल क्षेत्र में और धड़ धमतरी के रुद्री रोड स्थित सीताकुंड मंदिर में विराजमान हैं।

महानदी, डोड़की नदी और सूखी नदी के संगम क्षेत्र से जुड़ी यह पवित्र आस्था आज भी हजारों श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है। विशेषकर नवरात्रि के अवसर पर यहां विशाल मेला लगता है और दूर-दूर से श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

आज भी आसपास के ग्रामीण किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत करने से पहले मां अंगारमोती के दरबार में उपस्थित होकर आशीर्वाद लेना आवश्यक मानते हैं।
माँ बंजारी माता – रायपुर

रायपुर का मां बंजारी माता मंदिर 18वीं शताब्दी में निर्मित प्राचीन मंदिर है। माता बंजारी (अवतार दुर्गा) की मुख्य मूर्ति आठ हाथों वाली है, प्रत्येक हाथ में हथियार।

मंदिर की नक्काशी, जीवंत मूर्तियाँ और शांत फव्वारा इसे आस्था और संस्कृति का प्रमुख केंद्र बनाते हैं। परिसर में हनुमान, गणेश और शिव मंदिर भी स्थित हैं।

चैतुरगढ़, लाफा,पाली,कोरबा

चैतुरगढ़ को छत्तीसगढ़ का कश्मीर कहा जाता है। समुद्र तल से 3060 मीटर की ऊँचाई पर स्थित, यह स्थल गर्मियों में भी ठंडा रहता है।

यहाँ देवी महिषासुर मर्दिनी का मंदिर और कलचुरी राजवंश द्वारा निर्मित किला प्रमुख आकर्षण हैं। नवरात्रि में बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। शंकर खोल नामक संकरी गुफा और चारों ओर फैले घने जंगल मानसिक शांति प्रदान करते हैं।

माता कोसगाई मंदिर – कोरबा

कोरबा जिले के कोसगाई पहाड़ पर स्थित यह मंदिर 16वीं शताब्दी का माना जाता है। यहाँ सफेद ध्वज चढ़ाया जाता है, जो शांति का प्रतीक है। माता कुंवारी स्वरूप में विराजमान हैं।

भक्तों का मानना है कि माता उनकी मनोकामनाएँ पूर्ण करती हैं। मंदिर प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक वातावरण से मंत्रमुग्ध कर देता है।

सर्वमंगला माता मंदिर – कोरबा
कोरबा की पहाड़ियों में स्थित यह
मंदिर देवी सर्वमंगला को समर्पित है। मंदिर की स्थापत्य कला और भित्तिचित्र भक्तों के हृदय में आध्यात्मिक ऊर्जा भरते हैं।

स्थानीय मान्यता है कि माता सर्वमंगला संकटों और विपत्तियों में भक्तों की रक्षा करती हैं। नवरात्रि में भव्य पूजा, कीर्तन और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं।

मड़वा रानी मंदिर – कोरबा

मड़वा रानी मंदिर कोरबा जिले की पहाड़ियों में स्थित है। माता मड़वा रानी की मूर्ति, मंदिर की स्थापत्य कला और भित्तिचित्र इसे आस्था का प्रमुख केंद्र बनाते हैं।

भक्त मानते हैं कि माता संकट के समय उन्हें साहस, शक्ति और मनोकामनाएँ प्रदान करती हैं। नवरात्रि के अवसर पर मंदिर में भव्य उत्सव आयोजित होते हैं।

छत्तीसगढ़ के ये मंदिर और शक्तिपीठ न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि ये प्राकृतिक सौंदर्य, स्थापत्य कला और ऐतिहासिक महत्ता का अद्भुत संगम हैं। नवरात्रि के अवसर पर श्रद्धालु इन पवित्र स्थलों पर आकर माता के अद्भुत रूप का दर्शन करते हैं, अपने हृदय को शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरते हैं।
यह भूमि वास्तव में माँ की उपस्थिति का केंद्र है, जहां प्रकृति, आस्था और इतिहास मिलकर भक्तों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं। छत्तीसगढ़ में अनेक ऐसे प्राचीन, सिद्ध और पुरातात्विक देवी मंदिर हैं जो प्रदेश के हजारों वर्ष पुराने इतिहास, जनजातीय संस्कृति और सनातन परंपरा को प्रमाणित करते हैं। कई मंदिर ऐसे हैं जिनका उल्लेख सामान्य लेखों में कम मिलता है, लेकिन उनकी आस्था, पुरातात्विक महत्व और ऐतिहासिकता अत्यंत गहरी है। नीचे ऐसे कई महत्वपूर्ण और प्राचीन देवी मंदिरों के नाम दिए जा रहे हैं, जिन्हें आप अपने लेख में जोड़ सकते हैं —
छत्तीसगढ़ के प्राचीन एवं पुरातात्विक देवी मंदिर
मां दंतेश्वरी मंदिर – बस्तर की आराध्य देवी, लगभग 800 वर्ष पुराना मंदिर, शक्तिपीठ माना जाता है।
मां बम्लेश्वरी मंदिर – पहाड़ी पर स्थित अत्यंत प्राचीन शक्ति मंदिर, नवरात्र में लाखों श्रद्धालु आते हैं।
मां महामाया मंदिर – कलचुरी कालीन मंदिर, छत्तीसगढ़ के प्रमुख शक्तिपीठों में से एक।
मां चंद्रहासिनी देवी मंदिर – महानदी तट पर स्थित सिद्ध शक्ति पीठ।
मां राजीव लोचन परिसर की राजिम माता मंदिर – प्राचीन तीर्थ राजिम में स्थित देवी मंदिर।
मां कंकाली मंदिर – प्राचीन नागर शैली में बना मंदिर, ऐतिहासिक महत्व।
मां खल्लारी माता मंदिर – पहाड़ी पर स्थित प्राचीन शक्ति स्थल।
मां गढ़कलेवा देवी मंदिर – लोक आस्था का प्राचीन केंद्र।
मां महामाया मंदिर – सरगुजा अंचल का अत्यंत प्राचीन शक्ति मंदिर।
मां शीतला मंदिर – प्राचीन लोकदेवी मंदिर।
मां काली मंदिर – क्षेत्र का ऐतिहासिक शक्ति स्थल।
मां दन्तेश्वरी का प्राचीन मंदिर – चालुक्यकालीन स्थापत्य का अद्भुत उदाहरण।
मां मावली माता मंदिर – बस्तर जनजातीय आस्था का केंद्र।
मां समलेश्वरी मंदिर – ओडिशा और छत्तीसगढ़ की साझा सांस्कृतिक परंपरा का प्रतीक।
मां भोरमदेव परिसर की देवी मंदिर श्रृंखला – नागवंशी और कलचुरी कालीन पुरातात्विक स्थल।
मां चण्डी मंदिर – बस्तर की पारंपरिक शक्ति उपासना का केंद्र।
मां दंतेश्वरी मंदिर – बस्तर दशहरा से जुड़ा ऐतिहासिक मंदिर।
मां कुदरगढ़ी देवी मंदिर – अत्यंत प्रसिद्ध सिद्ध शक्ति पीठ, पहाड़ पर स्थित।
मां अंगारमोती मंदिर – 52 गांवों की अधिष्ठात्री देवी के रूप में प्रसिद्ध।
छत्तीसगढ़ को “मंदिरों और देवी उपासना की भूमि” भी कहा जाता है। यहां की देवी परंपरा में जनजातीय संस्कृति, वैदिक परंपरा और शाक्त साधना का अद्भुत संगम दिखाई देता है। कई मंदिर कलचुरी, नागवंशी और चालुक्य काल के पुरातात्विक प्रमाण भी प्रस्तुत करते हैं।
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