कुदरगढ़ महोत्सव में करोड़ों की चकाचौंध, पर श्रद्धालु और मीडिया दूर, आखिर यह उत्सव किसके लिए
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सूरजपुर, छत्तीसगढ़
By ACGN 7647981711, 9303948009
मां कुदरगढ़ी देवी धाम में आस्था से अधिक दिखावे की चर्चा, आम जनता की दूरी और व्यवस्थाओं पर उठने लगे तीखे सवाल
सूरजपुर जिले के प्रसिद्ध आस्था स्थल मां कुदरगढ़ी देवी धाम में चैत्र नवरात्रि के अवसर पर आयोजित कुदरगढ़ महोत्सव इस बार भव्यता से अधिक सवालों के कारण चर्चा में है। करोड़ों रुपये खर्च कर बड़े आयोजन और मंचीय कार्यक्रमों का दावा किया जा रहा है, लेकिन इसके साथ ही एक सवाल लगातार लोगों के बीच उठ रहा है कि जब आम श्रद्धालु ही इस महोत्सव से दूरी बनाते नजर आ रहे हैं तो आखिर यह भव्यता किसके लिए है।

माता कुदरगढ़ी माता का यह धाम सदियों से जनआस्था का केंद्र रहा है। यहां आने वाला हर श्रद्धालु यह महसूस करता है कि माता का दरबार सबके लिए खुला है। लेकिन इस बार जिस तरह आयोजन की चमक और प्रचार दिखाई दे रहा है, उसी के साथ यह चर्चा भी तेज हो गई है कि कहीं यह महोत्सव धीरे-धीरे आम जनता से दूर तो नहीं होता जा रहा।

क्षेत्र में यह सवाल भी उठने लगा है कि यदि करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं तो वह आस्था की भीड़ और जनभागीदारी क्यों दिखाई नहीं दे रही जो माता के धाम की पहचान हुआ करती थी। लोग कटाक्ष करते हुए कहते हैं कि यदि श्रद्धालु ही इस आयोजन से दूरी बना लें तो फिर मंच, कार्यक्रम और भव्यता का यह प्रदर्शन आखिर किसके लिए किया जा रहा है।

कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि माता का धाम समाज की सामूहिक आस्था का स्थान है, न कि किसी सीमित दायरे का आयोजन स्थल। यदि आयोजन में आम जनता स्वयं को जुड़ा हुआ महसूस न करे तो यह स्थिति स्वाभाविक रूप से कई प्रश्न खड़े करती है। कई श्रद्धालु यह भी कहते नजर आते हैं कि मंदिरों में सादगी और श्रद्धा की परंपरा रही है, लेकिन जब आस्था के स्थान पर दिखावे की चर्चा होने लगे तो यह स्थिति चिंता का विषय बन जाती है।
इसी के साथ यह चर्चा भी तेज हो रही है कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माने जाने वाले समाचार माध्यम भी इस आयोजन से कुछ दूरी बनाए हुए दिखाई दे रहे हैं। सामान्यतः ऐसे धार्मिक आयोजनों में मीडिया की सक्रिय उपस्थिति होती है, लेकिन जब वही दूरी बनाता नजर आए तो लोग स्वाभाविक रूप से कारण तलाशने लगते हैं।
क्षेत्र में यह सवाल भी उठ रहा है कि कहीं महोत्सव की व्यवस्थाओं और खर्च को लेकर पारदर्शिता की कमी तो नहीं है। कुछ लोग यह भी पूछते नजर आते हैं कि यदि आयोजन वास्तव में जनता की आस्था के लिए है तो फिर जनता ही इससे दूर क्यों दिखाई दे रही है। यह स्थिति अपने आप में व्यवस्था और आयोजन की शैली पर विचार करने की मांग करती है।
कई श्रद्धालु भावनात्मक रूप से यह भी कहते दिखाई देते हैं कि देवी-देवताओं के मंदिर समाज को जोड़ने का स्थान होते हैं, जहां आस्था सबसे बड़ा उत्सव होती है। लेकिन यदि उस आस्था की जगह दिखावे और प्रचार की चर्चा होने लगे तो यह केवल व्यवस्था ही नहीं बल्कि समाज के लिए भी आत्ममंथन का विषय बन जाता है।
कुदरगढ़ महोत्सव को लेकर उठ रहे ये सवाल किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप नहीं बल्कि एक सामाजिक चेतावनी की तरह सामने आ रहे हैं। यह समय उन सभी जिम्मेदार लोगों के लिए भी है जो इस आयोजन से जुड़े हैं कि वे इस बात पर विचार करें कि माता का यह पावन धाम सदैव की तरह जनआस्था, श्रद्धा और सादगी का केंद्र बना रहे।
आस्था का केंद्र वही होता है जहाँ आम श्रद्धालु स्वयं को सम्मानित और सहज महसूस करे। मंदिर केवल भव्यता या व्यवस्थाओं से नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं की भागीदारी से जीवंत रहता है। यदि कहीं भी आमजन स्वयं को दूर महसूस करने लगे तो यह समय रहते सोचने और व्यवस्था को और अधिक जनकेंद्रित बनाने का अवसर भी है, ताकि आस्था का यह पवित्र स्थान सदैव सबके लिए खुला और आत्मीय बना रहे।
आखिरकार माता के दरबार में सबसे बड़ा उत्सव मंच या प्रचार नहीं, बल्कि वह आस्था होती है जो हजारों श्रद्धालुओं को सिर झुकाने के लिए यहां तक खींच लाती है। यदि वही आस्था कहीं किनारे खड़ी दिखाई दे तो यह संकेत है कि व्यवस्था को भी समय रहते स्वयं से कुछ कठिन प्रश्न पूछने होंगे।
प्रदीप मिश्रा
निष्पक्ष निर्भीक और सच्ची खबरों और जनहित के प्रति समर्पित पत्रकारिता के साथ देश में तेजी से बढ़ता विश्वसनीय वेब पोर्टल अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़
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