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सच की तह तक

धान की खुशबू वाली धरती पर नशे का साया, सवाल- सीधे-साधे प्रदेश को कौन बना रहा नशे का अड्डा

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रायगढ़, छत्तीसगढ़

By ACGN 7647981711, 9303948009

दुर्ग, बलरामपुर के बाद रायगढ़ में करोड़ों की अफीम की खेती का खुलासा

रायगढ़ – ACGN: छत्तीसगढ़ को हमेशा धान के कटोरे, मेहनतकश किसानों और सरल लोगों की धरती के रूप में जाना जाता रहा है। यहां की पहचान खेतों में लहलहाती धान की फसल और गांवों की सादगी रही है। लेकिन पिछले कुछ समय से प्रदेश के अलग-अलग जिलों से आ रही खबरें एक गंभीर और खतरनाक सच्चाई की ओर इशारा कर रही हैं। दुर्ग और बलरामपुर के बाद अब रायगढ़ जिले के तमनार थाना क्षेत्र के ग्राम आमाघाट में करोड़ों रुपये की अवैध अफीम की खेती पकड़े जाने से यह सवाल पूरे प्रदेश के सामने खड़ा हो गया है

कि आखिर छत्तीसगढ़ की शांत धरती पर नशे का यह जाल कौन फैला रहा है और इसके पीछे किसका संरक्षण है।

आमाघाट गांव में जब पुलिस और प्रशासन की संयुक्त टीम खेतों तक पहुंची तो वहां का नजारा किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं था। साधारण खेती की आड़ में हजारों की संख्या में अफीम के पौधे लहलहा रहे थे। यह कोई छोटा-मोटा प्रयोग नहीं था बल्कि संगठित तरीके से की जा रही खेती थी, जिसमें जमीन, समय, श्रम और संसाधनों का इस्तेमाल किया गया था।

ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि इतनी बड़ी खेती आखिर इतने दिनों तक कैसे चलती रही और किसकी नजरों से बची रही।

मामले की सूचना मिलते ही रायगढ़ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक शशि मोहन सिंह तत्काल मौके के लिए रवाना हुए। पुलिस, प्रशासन, आबकारी विभाग और वैज्ञानिक जांच दल की संयुक्त टीम ने मौके पर पहुंचकर कार्रवाई की। कार्रवाई के दौरान मार्शल सांगा पिता मिखाएल सांगा उम्र लगभग 40 वर्ष निवासी ग्राम हडमबनम थाना खूंटी जिला खूंटी झारखंड को गिरफ्तार किया गया, जबकि उसके दो साथी फरार बताए जा रहे हैं। प्रारंभिक जांच में यह बात भी सामने आई है कि आरोपी बाहरी राज्य से आकर यहां डेरा डालकर गोपनीय तरीके से अफीम की खेती कर रहा था।
कार्रवाई के दौरान पुलिस ने खेतों से 60,326 अफीम के पौधे, लगभग 2,877 किलोग्राम अफीम की फसल और 3.02 किलोग्राम तैयार अफीम बरामद की है। बरामद सामग्री की अनुमानित कीमत लगभग 2 करोड़ 5 लाख 10 हजार रुपये बताई जा रही है। यह आंकड़ा यह बताने के लिए काफी है कि यह कोई छोटा अपराध नहीं बल्कि एक संगठित और खतरनाक नेटवर्क का हिस्सा हो सकता है।
यह पूरी कार्रवाई रायगढ़ पुलिस के “ऑपरेशन आघात” के तहत की गई है, जिसके माध्यम से जिले में नशे के कारोबार पर लगातार चोट की जा रही है। लेकिन इस घटना ने एक और गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है। अफीम की खेती कोई ऐसी फसल नहीं है जो एक-दो दिन में तैयार हो जाए। इसे उगाने में समय लगता है, नियमित देखभाल और मेहनत लगती है।

ऐसे में अगर किसी गांव में हजारों पौधों की खेती हो रही थी तो क्या गांव के लोगों, आसपास के किसानों या स्थानीय तंत्र को इसकी भनक नहीं लगी।
छत्तीसगढ़ के कई हिस्सों से हाल के महीनों में इस तरह की खबरें सामने आई हैं। दुर्ग, बलरामपुर और अब रायगढ़ यह सिलसिला किसी संयोग की तरह नहीं बल्कि एक बढ़ते खतरे की तरह दिखाई देने लगा है। कई मामलों में यह भी सामने आया है कि ऐसी खेती को तरबूज, ककड़ी या अन्य फसलों की आड़ में किया जाता है ताकि लंबे समय तक किसी को संदेह न हो।

यह केवल कानून व्यवस्था का मामला नहीं है बल्कि यह समाज के भविष्य से जुड़ा सवाल है। अगर खेतों में धान की जगह नशे की खेती होने लगे और गांवों में बाहरी लोग आकर इस तरह का कारोबार करने लगें तो यह पूरे प्रदेश के लिए खतरे की घंटी है।

सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि आखिर ये लोग कहां से आ रहे हैं, इन्हें जमीन कौन दे रहा है, इनके पीछे कौन लोग खड़े हैं और कौन इनके लिए रास्ता आसान बना रहा है। जब तक इन सवालों के जवाब सामने नहीं आएंगे तब तक नशे के खिलाफ लड़ाई अधूरी ही रहेगी।
इस पूरे मामले ने समाज की भूमिका पर भी सवाल खड़ा किया है। कई बार गांव में संदिग्ध गतिविधियां होती रहती हैं लेकिन लोग यह सोचकर चुप रह जाते हैं कि हमें क्या लेना-देना। यही चुप्पी अपराधियों की सबसे बड़ी ताकत बन जाती है। अगर समय रहते सूचना दी जाए तो कई बड़े अपराध होने से पहले ही रोके जा सकते हैं।
और अब बात केवल अफीम की खेती तक सीमित नहीं रह गई है। छत्तीसगढ़ में शराब भी पूरी तरह से अपने पैर पसार चुकी है। गांव-गांव और शहर-शहर में शराब की दुकानें बढ़ती जा रही हैं और आज का युवा बड़ी संख्या में शराब के नशे में डूबता नजर आ रहा है। दूसरी ओर अब अफीम की खेती और तरह-तरह के नशे के इंजेक्शन, दवाइयां और अवैध मादक पदार्थों का जाल भी फैलता दिखाई दे रहा है। यह स्थिति धीरे-धीरे छत्तीसगढ़ को “उड़ता छत्तीसगढ़” बनाने की दिशा में बढ़ती हुई प्रतीत हो रही है।


विडंबना यह है कि एक ओर सरकार नशा मुक्ति अभियान चला रही है, नशा मुक्ति केंद्र खोल रही है, लाखों रुपये खर्च कर बैनर और पोस्टर लगवा रही है, लोगों को जागरूक करने की बात कर रही है। वहीं दूसरी ओर जमीन पर नशे का कारोबार लगातार पैर पसारता नजर आ रहा है। शराब की बढ़ती दुकानें, नशे के इंजेक्शन, दवाइयों का दुरुपयोग और अब खेतों में अफीम की खेती यह सब मिलकर एक कड़वी सच्चाई की ओर इशारा कर रहे हैं।
ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या नशा मुक्ति अभियान सिर्फ कागजों और पोस्टरों तक ही सीमित रह जाएगा या वास्तव में जमीन पर नशे के कारोबार पर सख्त चोट की जाएगी।
छत्तीसगढ़ की पहचान मेहनतकश किसानों, संस्कृति और सादगी से है, न कि नशे के कारोबार से। इसलिए अब समय आ गया है कि शासन, प्रशासन और समाज सभी मिलकर इस खतरे के खिलाफ खड़े हों। अगर आज इस पर सख्ती से रोक नहीं लगाई गई तो आने वाली पीढ़ियां इसकी भारी कीमत चुकाने के लिए मजबूर होंगी।

प्रदीप मिश्रा
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