नमस्कार 🙏 हमारे न्यूज पोर्टल - मे आपका स्वागत हैं ,यहाँ आपको हमेशा ताजा खबरों से रूबरू कराया जाएगा , खबर ओर विज्ञापन के लिए संपर्क करे +91 7647981711 ,हमारे यूट्यूब चैनल को सबस्क्राइब करें, साथ मे हमारे फेसबुक को लाइक जरूर करें , औद्योगिक पहचान से परे आस्था का प्राचीन इतिहास : कोरबा के पहाड़ों पर विराजमान हैं सदियों से जागृत मां शक्ति – Anjor Chhattisgarh News

Anjor Chhattisgarh News

सच की तह तक

औद्योगिक पहचान से परे आस्था का प्राचीन इतिहास : कोरबा के पहाड़ों पर विराजमान हैं सदियों से जागृत मां शक्ति

😊 कृपया इस न्यूज को शेयर करें😊

संपादकीय

अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ साप्ताहिक विशेषांक

✍️‘कलम की धार’✍️

By ACGN 7647981711, 9303948009

जनहित, तथ्य और साहस का साप्ताहिक मंच-जहाँ सच कहा जाता है, सवाल पूछे जाते हैं, और कीमत जानकर भी कलम नहीं रुकती, जनहित के मुद्दों को केंद्र में रखकर, जनसमस्याओं को निर्भीक स्वर देने वाला और भ्रष्टाचार के विरुद्ध बेबाक आवाज उठाने वाला मंच है अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ का साप्ताहिक विशेषांक “कलम की धार”  में हम केवल खबर नहीं, बल्कि समाज, इतिहास, संस्कृति और जनजीवन से जुड़े उन विषयों को सामने लाते हैं जो हमारे क्षेत्र की पहचान और सच्चाई को दर्शाते हैं। इस विशेषांक के माध्यम से हमारा प्रयास है कि पाठकों तक तथ्यपूर्ण, विश्वसनीय और सार्थक जानकारी सरल और प्रभावी रूप में पहुँचे।

आज का विषयआस्था, इतिहास और शक्ति की पावन भूमि कोरबा

आलेख – प्रदीप मिश्रा 

छत्तीसगढ़ का कोरबा जिला आज देशभर में ऊर्जा नगरी और औद्योगिक क्षेत्र के रूप में जाना जाता है। कोयला खदानें, ताप विद्युत संयंत्र और औद्योगिक इकाइयाँ इसकी आधुनिक पहचान बन चुकी हैं। लेकिन कोरबा की पहचान केवल उद्योगों तक सीमित नहीं है। यह भूमि प्राचीन काल से ही धार्मिक आस्था, शक्ति उपासना और आध्यात्मिक साधना की पावन भूमि ऋषभ तीर्थ रही है।

चैत्र नवरात्रि के पावन अवसर पर कोरबा जिले के प्राचीन देवी मंदिरों में श्रद्धा और भक्ति का अद्भुत संगम दिखाई देता है। कोसगाई, मड़वारानी, सर्वमंगला और चैतुरगढ़ की महिषासुर मर्दिनी माता के मंदिरों में सदियों से आस्था की ज्योति जल रही है। इन मंदिरों से जुड़ी ऐतिहासिक मान्यताएँ, लोककथाएँ और परंपराएँ इस क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती हैं।

 प्राचीन आस्था की भूमि कोरबा

स्थानीय मान्यताओं और ऐतिहासिक परंपराओं के अनुसार कोरबा क्षेत्र को प्राचीन समय में “ऋषभ तीर्थ” के नाम से भी जाना जाता था। कहा जाता है कि घने जंगलों, पहाड़ों और हसदेव नदी के शांत तट के कारण यह क्षेत्र ऋषि-मुनियों की तपस्थली रहा है। प्राचीन काल में यहां अनेक साधु-संत और तपस्वी साधना किया करते थे। प्राकृतिक वातावरण और आध्यात्मिक ऊर्जा के कारण यह क्षेत्र धीरे-धीरे देवी शक्ति की आराधना का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया। जिसके यहां आज भी घने जंगलों के बीच कई पुरातत्विक प्रमाण मिलते है

कोरबा का प्राचीन इतिहास और गढ़ों की परंपरा

कोरबा जिले का इतिहास अत्यंत प्राचीन और गौरवशाली रहा है। पुरातात्विक प्रमाण बताते हैं कि यह क्षेत्र कलचुरी शासनकाल में भी महत्वपूर्ण रहा है। छत्तीसगढ़ को ऐतिहासिक रूप से “छत्तीस गढ़ों की भूमि” कहा जाता है। इस क्षेत्र में कई गढ़ और किले स्थापित किए गए थे जो प्रशासन और सुरक्षा के केंद्र हुआ करते थे।

कोरबा के आसपास स्थित छुरीगढ़ और चैतुरगढ़ जैसे प्राचीन किले आज भी उस गौरवशाली इतिहास के प्रमाण हैं। इन किलों के आसपास देवी मंदिरों की स्थापना की गई थी जहां राजपरिवार और आम जनता देवी शक्ति की पूजा किया करते थे।

चैत्र नवरात्रि और शक्ति उपासना

चैत्र नवरात्रि हिंदू संस्कृति का अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है। चैत्र नवरात्रि हिंदू पंचांग के अनुसार वर्ष का पहला नवरात्र माना जाता है। यह वसंत ऋतु में आने वाला पर्व है यह हिंदू नववर्ष की शुरुआत के साथ आता है और इन नौ दिनों में देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। कोरबा जिले में भी चैत्र नवरात्रि के दौरान मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना, ज्योति कलश, भंडारा और धार्मिक आयोजनों का आयोजन होता है। भक्तजन नौ दिनों तक उपवास रखते हैं, दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं और माता के चरणों में अपनी श्रद्धा अर्पित करते हैं। इन दिनों मंदिरों का वातावरण भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा से भर जाता है। छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में भी चैत्र नवरात्रि का पर्व अत्यंत श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। यहां स्थित प्राचीन देवी मंदिरों में हजारों श्रद्धालु माता के दर्शन करने पहुंचते हैं।

आस्था, इतिहास और शक्ति की भूमि कोरबा

औद्योगिक पहचान के साथ प्राचीन धार्मिक विरासत से समृद्ध है कोरबा, कोसगाई, मड़वारानी, सर्वमंगला और चैतुरगढ़ की महिषासुर मर्दिनी माता के मंदिरों में सदियों से जल रही है आस्था की ज्योति

कोरबा जिले में हसदेव नदी का विशेष महत्व है। यह नदी केवल जीवनदायिनी ही नहीं बल्कि धार्मिक आस्था का भी केंद्र है। इसके तट पर स्थित मां सर्वमंगला का मंदिर आज भी हजारों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।

कोरबा के प्रमुख प्राचीन देवी स्थल

कोसगाई पहाड़ की मां कोसगाई देवी

कोरबा जिला मुख्यालय से लगभग 35 किलोमीटर दूर स्थित कोसगाई पहाड़ पर मां कोसगाई देवी का प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर प्राकृतिक सुंदरता और आध्यात्मिक वातावरण के कारण विशेष रूप से प्रसिद्ध है। पहाड़ की ऊंची चोटी पर स्थित यह मंदिर श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र है।

माना जाता है कि यह मंदिर लगभग 16वीं शताब्दी का है और इसका संबंध छत्तीसगढ़ के 36 गढ़ों में से एक छुरीगढ़ से रहा है। प्राचीन समय में इस क्षेत्र में राजघरानों का प्रभाव था और वे यहां नियमित रूप से पूजा-अर्चना करने आते थे।

मां कोसगाई मंदिर की सबसे अनोखी परंपरा यह है कि यहां देवी को लाल नहीं बल्कि सफेद ध्वज अर्पित किया जाता है। आमतौर पर देवी मंदिरों में लाल ध्वज चढ़ाने की परंपरा होती है, लेकिन यहां सफेद ध्वज शांति और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है।

स्थानीय मान्यता के अनुसार मां कोसगाई कुंवारी स्वरूप में विराजमान हैं, इसलिए उन्हें सफेद ध्वज अर्पित किया जाता है। एक प्राचीन कथा के अनुसार राजघराने के लोगों ने एक बार मंदिर पर छत बनाने की योजना बनाई थी, लेकिन माता ने स्वप्न में आकर उन्हें ऐसा करने से मना कर दिया।

तभी से माता खुले आसमान के नीचे विराजमान हैं। श्रद्धालुओं का मानना है कि माता विश्व कल्याण के लिए तपस्या कर रही हैं और इसी कारण वे धूप, बारिश और ठंड को सहते हुए भी खुले आसमान के नीचे विराजमान रहती हैं। आज भी यहां सेवा करने वाले परिवार की कई पीढ़ियां माता की सेवा में लगी हुई हैं और नवरात्रि के दौरान यहां हजारों श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

पहाड़ की चोटी पर स्थित मां मड़वारानी मंदिर

कोरबा जिले में स्थित मां मड़वारानी का मंदिर भी अत्यंत प्रसिद्ध और श्रद्धा का केंद्र है। यह मंदिर घने जंगलों और ऊंचे पहाड़ों के बीच स्थित है और यहां का वातावरण अत्यंत शांत और आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करता है।

 

लोककथाओं के अनुसार मां मड़वारानी स्वयं प्रकट हुई देवी हैं और वे आसपास के गांवों की रक्षा करती हैं। इस मंदिर तक पहुंचने के लिए लगभग पांच किलोमीटर लंबा मार्ग है, जहां से श्रद्धालु पहाड़ की चोटी तक पहुंचते हैं।

मां मड़वारानी से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा यह है कि देवी अपने विवाह के मंडप यानी मड़वा को छोड़कर इस पहाड़ पर आ गई थीं। जब वे इस स्थान पर पहुंचीं तो उनके शरीर से लगी हल्दी रास्ते में एक पत्थर पर गिर गई, जिससे वह पत्थर पीले रंग का हो गया। उसी घटना के बाद इस क्षेत्र और पहाड़ को मड़वारानी के नाम से जाना जाने लगा।

एक अन्य कथा के अनुसार गांव के लोगों को सपना आया था कि देवी कलमी वृक्ष के नीचे विराजमान हैं। जब लोगों ने उस स्थान पर जाकर देखा तो वहां देवी की दिव्य उपस्थिति का अनुभव हुआ। तभी से उस स्थान पर माता की पूजा प्रारंभ हुई।

आज भी मां मड़वारानी को पिंड रूप में पूजा जाता है और श्रद्धालु दूर-दूर से यहां दर्शन करने आते हैं। नवरात्रि के दौरान यहां विशाल मेले का आयोजन होता है और हजारों भक्त माता के चरणों में शीश नवाते हैं।

हसदेव तट की मां सर्वमंगला

कोरबा शहर के पास हसदेव नदी के तट पर स्थित मां सर्वमंगला का मंदिर पूरे क्षेत्र में अत्यंत प्रसिद्ध है। यह मंदिर धार्मिक और ऐतिहासिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है।

कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण कोरबा रियासत की रानी धनराज कुंवर के पूर्वजों द्वारा कराया गया था। मंदिर परिसर में कई अन्य मंदिर भी स्थित हैं जिनमें त्रिलोकिनाथ मंदिर, काली मंदिर,राम जानकी मंदिर, हनुमान मंदिर, प्राचीन वट वृक्ष और ज्योति कलश भवन प्रमुख हैं।

मां सर्वमंगला मंदिर से जुड़ी एक रोचक कथा यह भी है कि मंदिर परिसर में एक प्राचीन गुफा है जो हसदेव नदी के नीचे से होकर दूसरी ओर निकलती है। कहा जाता है कि पुराने समय में रानी इस गुफा का उपयोग नदी पार करने के लिए करती थीं।

नवरात्रि के दौरान यहां हजारों मनोकामना ज्योति कलश प्रज्ज्वलित किए जाते हैं और भक्त माता से अपने जीवन की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

चैतुरगढ़ की मां महिषासुर मर्दिनी

कोरबा जिले का सबसे ऐतिहासिक और रोमांचक धार्मिक स्थल चैतुरगढ़ या लाफागढ़ है। यह स्थान कोरबा से लगभग 70 किलोमीटर दूर ऊंचे पहाड़ पर स्थित है और इसे प्राचीन प्राकृतिक किलों में गिना जाता है।

माना जाता है कि इस किले का निर्माण कलचुरी वंश के राजा पृथ्वीदेव प्रथम ने कराया था। यह किला चारों ओर से प्राकृतिक पहाड़ियों से सुरक्षित है और यहां तीन मुख्य प्रवेश द्वार हैं जिन्हें मेनका द्वार, हुंकारा द्वार और सिंहद्वार कहा जाता है।

पहाड़ की चोटी पर मां महिषासुर मर्दिनी का प्राचीन मंदिर स्थित है, जहां देवी की 12 भुजाओं वाली भव्य प्रतिमा स्थापित है। नवरात्रि के दौरान यहां विशेष पूजा-अर्चना की जाती है और हजारों श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

 

चैतुरगढ़ की पहाड़ी पर मंदिर के समीप एक प्राचीन तालाब भी स्थित हैं जिसमें पूरे वर्ष पानी भरा रहता है। कहा जाता है माता इसमें प्रतिदिन स्नान करने आती है यहां प्राचीन किले के अवशेष आज भी दिखाई देते हैं और इस पूरे क्षेत्र को भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित किया गया है।

मंदिर से कुछ दूरी पर भगवान शिव की एक गुफा भी स्थित है जिसे शंकर गुफा कहा जाता है। यह गुफा लगभग 25 फीट लंबी है और सुरंग की तरह दिखाई देती है। जिसके अंदर भगवान शिव का लिंग है 

आस्था और इतिहास का अद्भुत संगम

कोरबा जिले के ये सभी देवी स्थल केवल धार्मिक आस्था के केंद्र ही नहीं बल्कि इतिहास, संस्कृति और पुरातात्विक धरोहर के भी महत्वपूर्ण प्रतीक हैं। पहाड़ों की चोटियों पर स्थित ये मंदिर आज भी लोगों को यह याद दिलाते हैं कि यह क्षेत्र प्राचीन काल से ही देवी शक्ति की आराधना का केंद्र रहा है।

चैत्र नवरात्रि के पावन अवसर पर इन मंदिरों में भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है और पूरा क्षेत्र भक्ति और श्रद्धा के वातावरण से भर जाता है।

कोरबा आज भले ही देश के प्रमुख औद्योगिक जिलों में गिना जाता हो, लेकिन इसकी पहचान केवल उद्योगों से नहीं बल्कि इसकी समृद्ध धार्मिक परंपरा, और कई प्राचीन मंदिरों और ऐतिहासिक स्थलों से  भी है। यही कारण है कि कोरबा को आस्था, इतिहास और संस्कृति की भूमि भी कहा जाता है।

प्रदीप मिश्रा

देश में तेजी से बढ़ता विश्वसनीय वेब पोर्टल अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़, हम लाते हैं निष्पक्ष निर्भीक और सच्ची खबरें

Whatsapp बटन दबा कर इस न्यूज को शेयर जरूर करें 

Advertising Space


स्वतंत्र और सच्ची पत्रकारिता के लिए ज़रूरी है कि वो कॉरपोरेट और राजनैतिक नियंत्रण से मुक्त हो। ऐसा तभी संभव है जब जनता आगे आए और सहयोग करे.

Donate Now