केरल के इतिहास के कुछ सबक सीखिए राहुलजी!
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By ACGN 7647981711, 9303948009
लेखक : संजय पराते
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने सात मार्च को केरल में संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा की एक रैली को संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने केरल के लोगों के लिए कई तरह की घोषणाएँ करते हुए पाँच गारंटियों का वादा किया। इन गारंटियों में केरल राज्य सड़क परिवहन निगम की बसों में महिलाओं के लिए मुफ्त यात्रा, छात्राओं के लिए मासिक प्रोत्साहन राशि, युवाओं के लिए बिना ब्याज का ऋण, स्वास्थ्य बीमा तथा वृद्धावस्था पेंशन में वृद्धि जैसी योजनाएँ शामिल थीं।
हालाँकि इन घोषणाओं से केरल के लोगों में कोई विशेष हलचल देखने को नहीं मिली। इसका प्रमुख कारण यह है कि केरल की जनता पहले से ही राज्य की वाम लोकतांत्रिक मोर्चा सरकार की कई जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ उठा रही है।
दरअसल, राहुल गांधी के भाषण का मुख्य उद्देश्य इन घोषणाओं से अधिक राजनीतिक आरोपों पर केंद्रित था। उन्होंने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार और केरल की वाम लोकतांत्रिक मोर्चा सरकार के बीच एक कथित “गुप्त गठबंधन” की बात कही और इसे सिद्ध करने का प्रयास किया कि यदि केंद्र सरकार जनविरोधी है तो राज्य की सरकार को भी उसी श्रेणी में रखा जाना चाहिए। उन्होंने इस कथित गठबंधन को “कम्युनिस्ट जनता पार्टी” तक कह दिया।
अपने आरोप को सही साबित करने के लिए उन्होंने अपने ऊपर चल रही प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई का उदाहरण दिया और कहा कि उनके खिलाफ पचपन दिनों तक जांच चली, जबकि केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के खिलाफ एक दिन भी कार्रवाई नहीं हुई। किंतु यह दावा तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है। राष्ट्रीय हेराल्ड प्रकरण में राहुल गांधी और उनके परिवार के खिलाफ लंबे समय से जांच और मुकदमे चल रहे हैं, जबकि केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन को उनके नाम से जुड़े प्रमुख एसएनसी-लावलिन प्रकरण में पहले ही न्यायालय से राहत मिल चुकी है।
यह सर्वविदित है कि प्रवर्तन निदेशालय विपक्ष के नेताओं के खिलाफ छोटी से छोटी कथित अनियमितता पर भी कार्रवाई करने के लिए कुख्यात रहा है। कई मामलों में कांग्रेस के नेताओं के खिलाफ भी ऐसी कार्रवाई हुई है और कुछ नेता तो इसी दबाव के कारण भारतीय जनता पार्टी में भी शामिल हो चुके हैं। ऐसे में राहुल गांधी के लिए अधिक उपयोगी यह होगा कि वे कांग्रेस छोड़कर भाजपा में जाने वाले नेताओं की सूची तैयार करें, बजाय इसके कि बिना ठोस आधार के किसी “गुप्त गठबंधन” की बात कहें।
केरल के इतिहास से मिलने वाले सबक
राहुल गांधी के लिए केरल के इतिहास से कुछ महत्वपूर्ण सबक सीखना भी उपयोगी हो सकता है। इन सबकों को समझे बिना वर्तमान राजनीति की व्याख्या अधूरी रहेगी।
पहला सबक – उन्नीस सौ सत्तावन
उन्नीस सौ सत्तावन में नवगठित केरल राज्य में पहली बार एक कम्युनिस्ट सरकार सत्ता में आई। इस सरकार ने भूमि सुधार, शिक्षा सुधार, सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार, पुलिस व्यवस्था में सुधार, सरकारी नौकरियों में आरक्षण व्यवस्था तथा प्रशासनिक विकेंद्रीकरण जैसे महत्वपूर्ण कदम उठाए।
ये वे सुधार थे जिन्हें केंद्र में उस समय सत्ता में बैठी कांग्रेस सरकार भी लागू कर सकती थी। लेकिन इसके बजाय कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्ष ने इन सुधारों का विरोध किया और सरकार को गिराने के लिए जातिवादी तथा सांप्रदायिक शक्तियों के साथ गठजोड़ किया। इसी दौर में केरल की राजनीति में पहली बार सांप्रदायिक शक्तियों को मजबूत होने का अवसर मिला।
दूसरा सबक – उन्नीस सौ इकहत्तर
उन्नीस सौ इकहत्तर में केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा सरकार थी। उस समय थालास्सेरी क्षेत्र में मंदिर के जुलूस और युवाओं के एक समूह के बीच मामूली विवाद के बाद व्यापक हिंसा भड़क उठी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने मुस्लिम समुदाय के घरों, मस्जिदों और दुकानों पर हमले किए।
उस समय मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं ने आगे बढ़कर मुस्लिम परिवारों की रक्षा की और उन्हें हिंसा से बचाया। इस बचाव अभियान का नेतृत्व पिनाराई विजयन कर रहे थे, जो उस समय स्थानीय विधायक थे। उसी समय से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को अपना प्रमुख राजनीतिक विरोधी मानना शुरू कर दिया और कई स्थानों पर हिंसक हमलों की घटनाएँ सामने आईं।
तीसरा सबक – उन्नीस सौ चौरासी
उन्नीस सौ चौरासी में भी केरल में संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा की सरकार थी और मुख्यमंत्री के. करुणाकरण थे। सबरीमला के निकट निलक्कल क्षेत्र में एक शिव मंदिर के पास सदियों पुराना पत्थर का क्रॉस मिला। सीरियन कैथोलिक चर्च उस स्थान पर पूजा स्थल बनाना चाहता था, जिसका मंदिर प्रबंधन ने विरोध किया।
इस मुद्दे पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा अयप्पा सेवा संघम जैसे संगठनों ने बड़ा आंदोलन चलाया। अंततः चर्च को अपनी योजना छोड़नी पड़ी और उस स्थान से क्रॉस हटा दिया गया। इस घटना को केरल में हिंदुत्व राजनीति के उभार की प्रारंभिक घटनाओं में से एक माना जाता है, जिसमें संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा सरकार की भूमिका को लेकर भी सवाल उठे।
चौथा सबक – उन्नीस सौ सत्तासी
उन्नीस सौ सत्तासी में वाम लोकतांत्रिक मोर्चा ने विधानसभा चुनाव स्पष्ट रूप से सांप्रदायिकता विरोधी मंच के आधार पर जीता। इस चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा ने वाम मोर्चा को हराने के लिए एक संयुक्त विपक्षी उम्मीदवार का प्रयोग किया, जिसमें कांग्रेस, मुस्लिम लीग और भारतीय जनता पार्टी का अप्राकृतिक गठबंधन बना। इसे उस समय “कांग्रेस-लीग-भाजपा” गठबंधन कहा गया।
लेकिन यह प्रयोग असफल रहा और दोनों प्रमुख सीटों पर इस गठबंधन को हार का सामना करना पड़ा।
पाँचवाँ सबक – सबरीमला विवाद
सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के प्रश्न पर सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया कि महिलाओं को भी मंदिर में प्रवेश का अधिकार है। राज्य की वाम लोकतांत्रिक मोर्चा सरकार ने इस निर्णय का सम्मान करने का निर्णय लिया।
इसके बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और अन्य संगठनों ने बड़े पैमाने पर आंदोलन चलाया। इस आंदोलन में बाद में संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा भी शामिल हो गया। दो हजार उन्नीस के लोकसभा चुनाव में भी यह मुद्दा प्रमुख राजनीतिक अभियान का हिस्सा बना, जिसमें संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा और भारतीय जनता पार्टी दोनों ने इस मुद्दे को उठाया।
इन ऐतिहासिक घटनाओं से स्पष्ट होता है कि केरल की राजनीति में सांप्रदायिक ताकतों को बढ़ावा देने और उनका विरोध करने की भूमिकाएँ समय-समय पर कैसे बदलती रही हैं। इसके बावजूद राहुल गांधी द्वारा यह कहना कि केरल में “कम्युनिस्ट जनता पार्टी” शासन कर रही है, वस्तुतः राजनीतिक अतिशयोक्ति प्रतीत होती है।
पिछले दस वर्षों में वाम लोकतांत्रिक मोर्चा सरकार ने धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र और संघीय ढांचे की रक्षा के लिए लगातार संघर्ष किया है। केंद्र सरकार तथा राज्य के विपक्ष दोनों के राजनीतिक हमलों के बावजूद यह सरकार अपनी नीतियों पर कायम रही है।
एक राष्ट्रीय नेता के रूप में राहुल गांधी से अपेक्षा की जाती है कि वे संसद और देश की राजनीति में हिंदुत्व आधारित सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ लड़ाई में सहयोगी दलों के प्रति अधिक जिम्मेदार और तथ्याधारित बयान दें।
लेखक : संजय पराते, स्रोत : पीपुल्स डेमोक्रेसी
अनुवाद : संजय पराते,उपाध्यक्ष – छत्तीसगढ़ किसान सभा
(अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध)
संपर्क : ९४२४२-३१६५०
प्रदीप मिश्रा
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