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सच की तह तक

“सत्ता मिली तो कार्यकर्ता भूले, दरबार में चापलूस फूले”

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संपादकीय

अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ साप्ताहिक विशेषांक

✍️ ‘कलम की धार’ ✍️

By ACGN 7647981711, 9303948009

जनहित, तथ्य और साहस का साप्ताहिक मंच-जहाँ सच कहा जाता है, सवाल पूछे जाते हैं, और कीमत जानकर भी कलम नहीं रुकती।

आज का विषय :कार्यकर्ता पसीना बहाए, चमचे मलाई खाएं, सत्ता मिलते ही कार्यकर्ता भूले, दरबार में चापलूस फूले और संघर्ष करने वाले बाहर, जयकारा लगाने वाले अंदर

राजनीति की असली ताकत भाषणों या पदों में नहीं, बल्कि उन हजारों कार्यकर्ताओं के पसीने में होती है जो वर्षों तक बिना किसी अपेक्षा के संगठन को खड़ा करते हैं। लेकिन अक्सर सत्ता मिलते ही वही कार्यकर्ता भीड़ में खो जाते हैं और उनकी जगह चापलूसी की भीड़ दरबारों में दिखाई देने लगती है। “कलम की धार” का यह लेख उसी कड़वी सच्चाई को सामने लाने का प्रयास है, जहां कार्यकर्ता का संघर्ष और नेताओं के आसपास बढ़ती चापलूसी की संस्कृति आम कार्यकर्ताओं के दिल में दर्द छोड़ जाती है।

आलेख प्रदीप मिश्रा 

जब झंडा उठाने वाले किनारे कर दिए जाते हैं और चापलूसों की भीड़ सत्ता के दरबार की असली पहचान बन जाती है

आज वर्तमान के समय में राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिन कंधों पर चढ़कर नेता सत्ता तक पहुँचते हैं, सत्ता मिलते ही सबसे पहले वही कंधे बोझ लगने लगते हैं। चुनाव के दिनों में कार्यकर्ता “परिवार” कहलाता है, “ताकत” कहलाता है, “रीढ़ की हड्डी” कहलाता है; लेकिन परिणाम आते ही वही कार्यकर्ता अचानक पहचान से बाहर हो जाता है। जिन दरवाजों पर कभी नेता स्वयं पहुँचते थे, आज वहीं गेट के बाहर खड़े कार्यकर्ता को बताया जाता है “साहब प्रवास पर हैं व्यस्त हैं मीटिंग में है।”

यह केवल एक वाक्य नहीं, यह राजनीति के बदलते चरित्र का आईना है। सत्ता के आसपास अब संघर्ष करने वालों से ज्यादा चापलूसी करने वालों की भीड़ दिखाई देती है। झंडा उठाने वाले पीछे खड़े रह जाते हैं और जयकारे लगाने वाले आगे बैठ जाते हैं। सवाल यह नहीं कि राजनीति बदल रही है, सवाल यह है कि क्या राजनीति अब उन लोगों की हो गई है जो संघर्ष नहीं बल्कि अवसर की सीढ़ी ढूँढते हैं? और यदि ऐसा है तो यह केवल कार्यकर्ताओं का नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र का संकट है।

सत्ता की सीढ़ियाँ और भूले हुए कंधे

राजनीति का एक कड़वा सच है सत्ता की सीढ़ियाँ कार्यकर्ता के कंधों पर खड़ी होती हैं, लेकिन शिखर पर पहुँचते ही सबसे पहले उन्हीं कंधों को भुला दिया जाता है। झंडा किसी और ने उठाया होता है, पोस्टर किसी और ने चिपकाया होता है, नारे किसी और ने लगाए होते हैं, लाठियाँ किसी और ने खाई होती हैं, जेल कोई और गया होता है; लेकिन जब सत्ता के दरबार सजते हैं तो कुर्सियाँ उन लोगों के लिए सुरक्षित हो जाती हैं जिनका संघर्ष से कभी कोई रिश्ता ही नहीं रहा। राजनीति कभी विचारधारा की तपस्या हुआ करती थी, आज कई जगह वह अवसरवाद का बाजार बनती दिखाई देती है। कभी कार्यकर्ता को परिवार कहा जाता था, आज कई जगह वही कार्यकर्ता चुनावी मौसम का “यूज़ एंड थ्रो” संसाधन बनता जा रहा है। यह बात अब केवल फुसफुसाहट नहीं रही, यह हजारों कार्यकर्ताओं के मन में उठता हुआ वह मौन प्रश्न है जिसे राजनीति की चमक-दमक अभी सुन नहीं पा रही।

जब राजनीति तपस्या हुआ करती थी

एक समय था जब राजनीति में कार्यकर्ता होना गर्व की बात होती थी। लोग वर्षों तक बिना किसी पद, बिना किसी स्वार्थ और बिना किसी लालच के पार्टी के विचारधारा के लिए काम करते थे। गांव-गांव जाकर विचारधारा का प्रचार करना, साइकिल से घूमना, खुद पोस्टर लगाना, रात-रात भर बैठकर रणनीति बनाना, धरना देना, जेल जाना यह सब राजनीति की सामान्य प्रक्रिया थी। तब नेता और कार्यकर्ता के बीच केवल राजनीतिक संबंध नहीं होता था, बल्कि एक पारिवारिक रिश्ता होता था। नेता कार्यकर्ता को नाम से पहचानता था, उसके घर के सुख-दुख में शामिल होता था और कार्यकर्ता भी अपने नेता को केवल पदाधिकारी नहीं बल्कि अपना मानता था। राजनीति तब केवल सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं थी, बल्कि समाज को जोड़ने वाली एक जीवंत परंपरा थी।

जब राजनीति में स्वार्थ की एंट्री हुई

लेकिन समय बदला सत्ता मिली, सत्ता और कुर्सी की लालच बढ़ी और राजनीति का स्वरूप भी धीरे-धीरे बदलता चला गया। विचारधारा की जगह धीरे-धीरे अवसरवाद ने ले ली और संघर्ष की जगह संपर्क ने। राजनीति में एक नया वर्ग प्रवेश करने लगा, ऐसा वर्ग जिसका राजनीति से जुड़ाव संगठन की विचारधारा से नहीं बल्कि स्वार्थ से था। कुछ लोग अपने व्यापार की सुरक्षा के लिए राजनीति में आए, कुछ अपने विवादों से बचाव के लिए, तो कुछ सत्ता की छाया में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए। देखते-देखते यही लोग नेताओं के आसपास सबसे मजबूत घेरा बनाकर खड़े हो गए। जो लोग कभी पार्टी के झंडे के आसपास भी नहीं दिखते थे, वे अचानक नेताओं के सबसे विश्वसनीय सलाहकार बन गए।

पुराने कार्यकर्ता कैसे हाशिए पर चले गए

यहीं से राजनीति का सबसे दर्दनाक अध्याय शुरू होता है। वह कार्यकर्ता जिसने वर्षों तक संगठन के लिए तन,मन,धन के साथ अपना पूरा जीवन खपा दिया, धीरे-धीरे हाशिए पर चला जाता है। जिस व्यक्ति ने गांव-गांव जाकर लोगों को समझाया, जिसने चुनाव के समय दिन-रात मेहनत की, जिसने नेता को जिताने के लिए तन,मन,धन के साथ अपना सब कुछ लगा दिया,वही व्यक्ति अचानक व्यवस्था के बाहर खड़ा दिखाई देने लगता है। अब नेता के कमरे के बाहर वे लोग दिखाई देते हैं जो कल तक राजनीति में थे ही नहीं। आज निर्णय लेने से पहले उन्हीं से सलाह ली जाती है, योजनाएँ उन्हीं के साथ बैठकर बनाई जाती हैं और वही लोग धीरे-धीरे संगठन के भीतर प्रभावशाली बन जाते हैं। और नेता के साथ पूरे संगठन की कमान उन्हीं के इशारों पर चलती दिखती है

जब कार्यकर्ता से कहा जाता है “आप उनसे मिल लीजिए”

सबसे दर्दनाक दृश्य तब सामने आता है जब कोई पुराना कार्यकर्ता अपने नेता से मिलने पहुँचता है। वह व्यक्ति जिसने वर्षों तक पार्टी के लिए काम किया, जिसने चुनाव के समय अपने घर-परिवार से ज्यादा संगठन को समय दिया, जब वह नेता के दरवाजे तक पहुँचता है तो उसे बताया जाता है “आप उनसे मिल लीजिए, वही सब देख रहे हैं।” यह वाक्य केवल एक औपचारिक जवाब नहीं होता, यह उस कार्यकर्ता के आत्मसम्मान पर सीधा आघात होता है। उस क्षण उसे महसूस होता है कि जिस संगठन को उसने अपना परिवार समझा था, वह शायद अब उसके लिए परिवार नहीं रहा।
चुनाव के समय का अपनापन, चुनाव के बाद की दूरी
चुनाव के समय राजनीति का दृश्य बिल्कुल अलग होता है। तब नेताओं की गाड़ियाँ सीधे कार्यकर्ताओं के घरों के सामने रुकती हैं। चाय के कप पर रणनीतियाँ बनती हैं, देर रात तक योजनाएँ तैयार होती हैं और मंचों से कहा जाता है “कार्यकर्ता हमारी ताकत हैं, कार्यकर्ता हमारा परिवार हैं।” लेकिन जैसे ही चुनाव खत्म होता है, वही दृश्य बदल जाता है। वही गाड़ियाँ अब कार्यकर्ता के घर के सामने से गुजरती जरूर हैं, लेकिन शीशे ऊपर चढ़े रहते हैं। जिन घरों में बैठकर चुनाव की रणनीति बनी थी, अब वही घर पहचान से बाहर हो जाते हैं। कई बार तो कार्यकर्ता जब मिलने जाता है तो गेट पर लिखा मिलता है “साहब प्रवास पर हैं।”

मौन अपमान का दर्द

बता दे कार्यकर्ता का अपमान हमेशा शब्दों में नहीं होता। कई बार अपमान मौन में होता है। जब कार्यकर्ता घंटों इंतजार करता है और उसे मिलने का समय नहीं मिलता, जब उसकी बात को टाल दिया जाता है, जब उसे यह महसूस कराया जाता है कि उसकी जरूरत अब खत्म हो चुकी है तब यह अपमान शब्दों से भी ज्यादा गहरा होता है। दूसरी ओर वही नेता उन लोगों के साथ घंटों बैठता है जिनका राजनीति से रिश्ता केवल स्वार्थ का होता है। यही दृश्य कार्यकर्ता के दिल को सबसे ज्यादा चोट पहुँचाता है।

स्वार्थ की भीड़ और चमचों का घेरा

आज राजनीति में एक और दृश्य तेजी से दिखाई देता है चमचों की भीड़ का बढ़ता हुआ घेरा। ऐसे लोग जो संघर्ष से नहीं बल्कि चापलूसी से आगे बढ़ते हैं, वे धीरे-धीरे नेताओं के सबसे करीब पहुँच जाते हैं। वे हर समय नेता की प्रशंसा करते हैं, हर निर्णय को सही बताते हैं और धीरे-धीरे संगठन के वास्तविक कार्यकर्ताओं को किनारे कर देते हैं। यही वह भीड़ है जो नेताओं के अहंकार को मजबूत करती है और कार्यकर्ताओं की पीड़ा को अनसुना कर देती है।

नेताओं के लिए चेतावनी

अब नेताओं को यह समझना होगा कि संगठन केवल पद और सत्ता से नहीं चलता। संगठन उन हजारों कार्यकर्ताओं के विश्वास से चलता है जो बिना किसी अपेक्षा के पार्टी के लिए काम करते हैं। जिस दिन वही कार्यकर्ता निराश होकर घर बैठ गया, उस दिन किसी भी नेता की जीत मुश्किल हो जाएगी। क्योंकि स्वार्थ से जुड़े लोग उतनी ही तेजी से साथ छोड़ते हैं जितनी तेजी से साथ आते हैं।

सबसे खतरनाक खामोशी

राजनीति में सबसे खतरनाक चीज विरोध नहीं होती, बल्कि टूटा हुआ विश्वास होता है। जब कार्यकर्ता बोलना बंद कर देता है, शिकायत करना छोड़ देता है और चुपचाप घर बैठ जाता है तब समझ लेना चाहिए कि संगठन की जड़ें कमजोर होने लगी हैं। इतिहास गवाह है कि निराश कार्यकर्ता की खामोशी किसी भी विरोधी के भाषण से ज्यादा खतरनाक होती है। और सत्ता और संगठन के लिए खतरनाक साबित हो सकती है

सत्ता, संगठन और नेताओं से कुछ जरूरी सवाल

क्या आज भी राजनीतिक दलों में कार्यकर्ता को उतना ही सम्मान मिलता है जितना कभी संगठन की संस्कृति में मिलता था?

क्या निर्णय लेने की प्रक्रिया में जमीनी स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं की आवाज सच में सुनी जाती है?

क्या नेताओं के आसपास बढ़ती चापलूसी की भीड़ वास्तविक कार्यकर्ताओं को संगठन से दूर नहीं कर रही?

क्या सत्ता मिलने के बाद कार्यकर्ताओं से दूरी बनाना राजनीतिक संस्कृति का नया सामान्य बनता जा रहा है?

क्या संगठन में संघर्ष करने वालों की जगह अब संपर्क और चापलूसी करने वाले लोग नहीं ले रहे?

यदि सच्चे और पुराने कार्यकर्ता निराश होकर घर बैठ जाएं, तो क्या केवल अवसरवादी भीड़ किसी भी दल को मजबूत बना सकती है?

क्या राजनीतिक दलों को अब समय रहते अपनी संगठन संस्कृति पर आत्ममंथन नहीं करना चाहिए?

और सबसे बड़ा सवाल क्या कार्यकर्ता केवल चुनाव के समय याद आने वाला चेहरा है, या सच में संगठन की रीढ़?

नेताओं और संगठनों के लिए कुछ आवश्यक कदम

यदि राजनीतिक दल अपने संगठन की जड़ों को मजबूत रखना चाहते हैं तो उन्हें सबसे पहले अपने कार्यकर्ताओं के सम्मान और विश्वास को प्राथमिकता देनी होगी। नेताओं को यह समझना होगा कि संगठन केवल पदाधिकारियों से नहीं, बल्कि उन हजारों कार्यकर्ताओं से चलता है जो बिना किसी अपेक्षा के वर्षों तक मेहनत करते हैं। इसलिए आवश्यक है कि निर्णय प्रक्रिया में जमीनी कार्यकर्ताओं की भागीदारी बढ़ाई जाए, उनसे नियमित संवाद रखा जाए और उनके अनुभव व सुझावों को महत्व दिया जाए।

संगठनों को भी यह सुनिश्चित करना चाहिए कि चापलूसी की संस्कृति के बजाय कार्य और समर्पण को महत्व मिले। पुराने और समर्पित कार्यकर्ताओं को सम्मान, अवसर और पहचान देना केवल औपचारिकता नहीं बल्कि संगठन की मजबूती का आधार है। यदि नेता और संगठन समय रहते इस दिशा में आत्ममंथन कर लें तो कार्यकर्ताओं का विश्वास और ऊर्जा दोनों बनी रहेंगी, और वही किसी भी राजनीतिक दल की सबसे बड़ी पूंजी होती है।

राजनीति में जीत केवल भाषणों से नहीं होती, वह कार्यकर्ताओं के विश्वास से होती है। जिस दिन वही विश्वास टूट गया, उस दिन सबसे बड़ी सभा और सबसे ऊँचे मंच भी किसी नेता को नहीं बचा पाएंगे।

याद रखिए—चापलूस तालियाँ जरूर बजा सकते हैं, लेकिन चुनाव नहीं जिताते। चुनाव तो वही कार्यकर्ता जिताते हैं जो बिना स्वार्थ के वर्षों तक झंडा उठाए खड़े रहते हैं।

इसलिए समय रहते नेताओं और संगठनों को यह समझ लेना चाहिए कि कार्यकर्ता केवल भीड़ नहीं होता, वह संगठन की आत्मा होता है।

और इतिहास गवाह है जिस दिन संगठन की आत्मा आहत होती है, उसी दिन सत्ता की नींव हिलना शुरू हो जाती है।

✍️लेखक : प्रदीप मिश्रा स्वतंत्र पत्रकार
विशेष आमंत्रण

अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ के साप्ताहिक स्तंभ“कलम की धार” (प्रत्येक रविवार प्रकाशित) में हर सप्ताह वर्तमान राजनीति की हलचल, सच्चाई और समीकरणों पर आलोचनात्मक विश्लेषणात्मक, पर्व,तीज, त्यौहार एवं पर्यटनस्थलों पर लेख सादर आमंत्रित हैं। चयनित लेख लेखक के नाम के साथ प्रकाशित किए जाएंगे।

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