श्रीराम का अनुकरण और श्रीकृष्ण का अनुसरण करें : पं. कृष्णा महाराज
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सूरजपुर, छत्तीसगढ़
By ACGN 7647981711, 9303948009
भागवत कथा के चतुर्थ दिवस राम-कृष्ण चरित्र से धर्म, सेवा और परिवार एकता का दिया संदेश
सूरजपुर ACGN:- बैजनाथपुर (बनियाटिकरी) भैयाथान में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस कथा प्रवक्ता पं. कृष्णा महाराज ने श्रद्धालुओं को श्रीराम के जीवन का अनुकरण और श्रीकृष्ण के चरित्र का अनुसरण करने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि भगवान ने अनेक अवतार लिए, लेकिन राम और कृष्ण की जीवन गाथा इतनी महान है कि उनके नाम के साथ ‘श्री’ स्वतः जुड़ गया। यदि हम उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतार लें तो हमारे जीवन में भी लक्ष्मी और मंगल का वास होगा।
महाराज ने कहा कि परिस्थितियां कैसी भी रही हों, प्रभु श्रीराम ने राजगद्दी, आभूषण, वस्त्र और अयोध्या तक छोड़ दी, लेकिन धर्म रक्षा के लिए धनुष नहीं छोड़ा। सनातन की रक्षा और दुष्टों के संहार के लिए शस्त्र धारण करना ही श्रीराम बनने की पहली सीढ़ी है। उन्होंने कहा कि आज हम यज्ञ और धर्म आयोजन से दूरी बना रहे हैं, जबकि श्रीराम ने गुरुकुल में रहते हुए भी ताड़का जैसे दुष्टों से यज्ञ की रक्षा की थी। यदि हमें राम जैसा बनना है तो धर्म को सर्वोपरि रखना होगा।
उन्होंने सेवा भाव पर जोर देते हुए कहा कि आज समाज अर्थलोलुपता की ओर बढ़ रहा है। धन कमाना आवश्यक है, लेकिन उसका पहला उपयोग धर्म कार्य में होना चाहिए। उन्होंने प्रश्न उठाया कि हनुमान मंदिर अधिक क्यों हैं और बताया कि क्योंकि बजरंगबली ने अपने आराध्य श्रीराम की सेवा पूर्ण निस्वार्थ भाव से की। जब तक हम माता-पिता, गुरु और सनातन धर्म की सेवा निस्वार्थ भाव से नहीं करेंगे, तब तक राम के जीवन की ओर बढ़ना संभव नहीं है।
कथा के दौरान उन्होंने श्रीराम के आज्ञापालन का उदाहरण देते हुए कहा कि पिता की आज्ञा मिलते ही वे वन के लिए प्रस्थान कर गए, उन्होंने अपने अधिकार या हिस्से की बात नहीं की। यही सीख हर परिवार को अपनानी होगी कि माता-पिता की सेवा में कोई अवरोध न आए।
महाराज ने बताया कि श्रीमद्भागवत में राम कथा इसलिए आती है क्योंकि कृष्ण चरित्र को समझने के लिए पहले राम के चरित्र को जानना आवश्यक है। यदि राम को सही ढंग से नहीं समझा गया तो कृष्ण चरित्र पर भी भ्रम उत्पन्न होगा। उन्होंने कहा कि भगवान का अवतरण किसी एक पीढ़ी का परिणाम नहीं होता, बल्कि कई पीढ़ियों के पुण्य और आचरण से वह योग बनता है।
उन्होंने श्रीराम और श्रीकृष्ण के जन्म समय का उल्लेख करते हुए कहा कि दोनों का जन्म ठीक बारह बजे हुआ, एक का दिन में और दूसरे का मध्यरात्रि में। घड़ी की सुइयां जब एक स्थान पर आती हैं तो वह संकेत देती हैं कि परिवार, विचार और व्यवहार में एकता होनी चाहिए। जब पूरा परिवार एक मत होगा तभी प्रभु का आगमन होगा।
कृष्ण जन्मोत्सव प्रसंग में उन्होंने देवकी और वसुदेव के अटूट विश्वास का उदाहरण देते हुए कहा कि सात पुत्रों को खोने के बाद भी उन्होंने नाम स्मरण नहीं छोड़ा। उनका विश्वास अंत तक अडिग रहा। इसी प्रकार यदि हम भी यह विश्वास रखें कि प्रभु कृपा करेंगे तो जीवन अवश्य संवर जाएगा। नाम जप, नाम स्मरण, लीला श्रवण और आदर्शों का अनुकरण ही सच्ची भक्ति का मार्ग है।
कथा के समापन पर भक्तों ने भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव की झांकी और भंडारे का आनंद लिया। क्षेत्र में भक्ति और उत्साह का वातावरण बना रहा।
प्रदीप मिश्रा
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