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महाशिवरात्रि : आत्मजागरण, तप और शिवत्व की अनुभूति का महान पर्व

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संपादकीय

By ACGN 7647981711, 9303948009

महाशिवरात्रि विशेष
महाशिवरात्रि केवल एक पर्व नहीं, यह आत्मा की पुकार है। यह वह रात्रि है जब मनुष्य बाहरी संसार से थोड़ा हटकर अपने भीतर झांकता है। सनातन परंपरा में यह माना गया है कि इस पावन रात्रि में सृष्टि में शिवतत्त्व विशेष रूप से जागृत रहता है और जो साधक श्रद्धा, विश्वास और संयम के साथ साधना करता है, उसे अद्भुत आंतरिक शक्ति का अनुभव होता है।
शिव केवल देवता नहीं, बल्कि चेतना के प्रतीक हैं। वे संहार के देव हैं, पर उनका संहार विनाश नहीं, बल्कि नये सृजन का मार्ग प्रशस्त करता है। वे भोलेनाथ हैं, आशुतोष हैं, जो सच्चे भाव से तुरंत प्रसन्न हो जाते हैं। उनके स्वरूप का हर अंग एक संदेश देता है। जटाओं में गंगा ज्ञान का प्रवाह है। अर्धचंद्र मन और समय पर नियंत्रण का प्रतीक है। कंठ का सर्प भय पर विजय का संकेत देता है। शरीर की भस्म यह सिखाती है कि यह देह नश्वर है। त्रिशूल तीन गुणों सत्व, रज और तम पर संतुलन का प्रतीक है और डमरू सृष्टि की मूल ध्वनि का संकेत देता है।


          पौराणिक आधार और आध्यात्मिक संदेश

मान्यता है कि इसी रात्रि भगवान शिव और माता पार्वती का दिव्य विवाह हुआ था। यह शिव और शक्ति के मिलन का प्रतीक है। शिव चेतना हैं, शक्ति ऊर्जा है। दोनों का संतुलन ही सृष्टि को चलाता है।
समुद्र मंथन के समय निकले हलाहल विष को शिव ने अपने कंठ में धारण किया और नीलकंठ कहलाए। यह कथा त्याग, करुणा और लोककल्याण का संदेश देती है। एक अन्य मान्यता के अनुसार इसी रात्रि शिव अनंत ज्योतिर्लिंग रूप में प्रकट हुए, जो उनके अनादि और अनंत स्वरूप का प्रतीक है।

इस दिन लोग ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करते हैं, स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं और व्रत का संकल्प लेते हैं। कई लोग निर्जल व्रत रखते हैं, कुछ फलाहार करते हैं। दिन भर “ॐ नमः शिवाय” और महामृत्युंजय मंत्र का जप किया जाता है। मंदिरों में रुद्राभिषेक, भजन, कीर्तन और चार प्रहर की पूजा होती है।
रात्रि जागरण का विशेष महत्व है। यह केवल रात भर जागना नहीं, बल्कि अपने भीतर की चेतना को जगाना है।
        भगवान शिव को क्या भोग लगाया जाता है
भगवान शिव को सादा और सात्विक भोग प्रिय है। दूध, दही, घी, शहद, शक्कर से बना पंचामृत अर्पित किया जाता है। बेलपत्र, भांग, धतूरा, आक के फूल, गन्ने का रस, बेर, नारियल, खीर, फल और मिष्ठान चढ़ाए जाते हैं।
बेलपत्र की तीन पत्तियां त्रिदेव और तीन गुणों का प्रतीक मानी जाती हैं। केतकी का फूल नहीं चढ़ाया जाता और तुलसी सामान्यतः विष्णु पूजा में अर्पित की जाती है।
         किस वस्तु से अभिषेक करने पर क्या फल
जल से अभिषेक करने पर मानसिक शांति और तनाव में कमी आती है। यह मन को ठंडक देता है और क्रोध को शांत करता है।
दूध से अभिषेक सुख और समृद्धि की कामना के लिए किया जाता है। मान्यता है कि इससे आर्थिक परेशानियां कम होती हैं और घर में सौभाग्य बढ़ता है।
दही से अभिषेक स्वास्थ्य और रोगों से मुक्ति के लिए किया जाता है।
घी से अभिषेक तेज, शक्ति और आत्मविश्वास बढ़ाने का प्रतीक है।
शहद से अभिषेक वाणी में मधुरता और संबंधों में प्रेम बढ़ाने के लिए किया जाता है।
गन्ने के रस से अभिषेक धन और वैभव की कामना से किया जाता है।
भांग और धतूरा अर्पित करना विकारों और नकारात्मक विचारों पर नियंत्रण का प्रतीक माना जाता है।
वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो अभिषेक के समय मंत्रोच्चारण की ध्वनि तरंगें वातावरण में सकारात्मक कंपन पैदा करती हैं। जल और दूध जैसी वस्तुएं ऊर्जा को अवशोषित और प्रवाहित करने की क्षमता रखती हैं। उपवास शरीर को डिटॉक्स करता है और मन को हल्का बनाता है। मंत्रजप से मानसिक एकाग्रता बढ़ती है और तनाव कम होता है।

महाशिवरात्रि हमें सिखाती है कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिनाई क्यों न हो, हमें संतुलन बनाए रखना चाहिए। जैसे शिव ने विष को अपने कंठ में रोक लिया, वैसे ही हमें भी अपने भीतर के क्रोध, ईर्ष्या और अहंकार को रोकना चाहिए ताकि वह समाज में न फैले।
यह पर्व हमें याद दिलाता है कि असली सुख बाहरी दौलत में नहीं, बल्कि मन की शांति में है। शिव का सादा जीवन हमें सिखाता है कि संतोष ही सबसे बड़ा धन है।
अंततः महाशिवरात्रि आत्ममंथन की रात्रि है। यह अपने भीतर के अंधकार को पहचानकर उसे प्रकाश में बदलने का अवसर है। श्रद्धा, विश्वास और सच्चे भाव से किया गया जप, तप और अभिषेक मनुष्य को शांति, शक्ति और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है।
हर हर महादेव।

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