महाशिवरात्रि : उपवास, उपासना और विज्ञान का समन्वय : महंत त्यागी जी महाराज
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राजनांदगांव छत्तीसगढ़
By ACGN 7647 9817119303 948009
राजनांदगांव: महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर डोंगरगढ़ जिला राजनांदगांव के समीप स्थित मुरमुंडा शनि धाम आश्रम के महंत एवं गोरखनाथ युवा वाहिनी के राष्ट्रीय संगठन मंत्री त्यागी जी महाराज ने श्रद्धालुओं को महाशिवरात्रि का आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि महाशिवरात्रि केवल एक धार्मिक पर्व नहीं बल्कि आत्मशुद्धि, संयम और जागरण की रात्रि है। यह वह पावन समय है जब साधक अपने भीतर की नकारात्मकता, अहंकार और क्रोध को त्यागकर आत्मबल और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त करता है।
त्यागी जी महाराज ने बताया कि सनातन संस्कृति में महाशिवरात्रि का विशेष महत्व है। यह भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य मिलन का प्रतीक मानी जाती है और सृष्टि के संतुलन का संदेश देती है। शिव को केवल संहारक के रूप में नहीं बल्कि परिवर्तन और नवसृजन के देवता के रूप में समझना चाहिए। शिवलिंग निराकार ब्रह्म का प्रतीक है जो यह दर्शाता है कि परम सत्य किसी एक रूप में सीमित नहीं है।
उन्होंने कहा कि उपवास केवल धार्मिक परंपरा नहीं बल्कि शरीर और मन की शुद्धि का माध्यम है। जब व्यक्ति उपवास रखता है तो पाचन तंत्र को विश्राम मिलता है, शरीर से विषैले तत्व बाहर निकलते हैं और मन अधिक एकाग्र होता है। रात्रि जागरण आत्मनियंत्रण और अनुशासन का अभ्यास कराता है। इस रात्रि में साधक की चेतना भीतर की ओर प्रवाहित होती है जिससे मानसिक स्पष्टता और आत्मिक शक्ति बढ़ती है।
पूजन विधि के बारे में उन्होंने बताया कि प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण कर शिवलिंग पर जल, दूध और बेलपत्र अर्पित करना चाहिए तथा श्रद्धा के साथ “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जप करना चाहिए। चार प्रहर की पूजा का विशेष महत्व है और रात्रि में भजन, कीर्तन तथा ध्यान से वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से भर जाता है। उन्होंने कहा कि शिव पूजा का वास्तविक अर्थ बाहरी आडंबर नहीं बल्कि अपने भीतर के विकारों को त्यागकर सद्गुणों को अपनाना है।
त्यागी जी महाराज ने यह भी बताया कि हमारे सनातन संस्कारों में विज्ञान का गहरा रहस्य छिपा है। उपवास शरीर को शुद्ध करता है, बेलपत्र औषधीय गुणों से युक्त है और संयमित जीवनशैली मानसिक संतुलन को मजबूत करती है। प्रत्येक पर्व हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य, अनुशासन और संतुलन का संदेश देता है।
अंत में उन्होंने श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि महाशिवरात्रि को केवल एक दिन का अनुष्ठान न मानें बल्कि इसे अपने जीवन में सदाचार, सेवा, संयम और सकारात्मक सोच के रूप में उतारें। जब शिव के गुण हमारे आचरण में उतरेंगे तभी महाशिवरात्रि का सच्चा अर्थ पूर्ण होगा।
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