नमस्कार 🙏 हमारे न्यूज पोर्टल - मे आपका स्वागत हैं ,यहाँ आपको हमेशा ताजा खबरों से रूबरू कराया जाएगा , खबर ओर विज्ञापन के लिए संपर्क करे +91 7647981711 ,हमारे यूट्यूब चैनल को सबस्क्राइब करें, साथ मे हमारे फेसबुक को लाइक जरूर करें , “बटन दबाते रहे… और जीवन की शक्ति खोते रहे: आधुनिकता की अनकही कीमत” – Anjor Chhattisgarh News

Anjor Chhattisgarh News

सच की तह तक

“बटन दबाते रहे… और जीवन की शक्ति खोते रहे: आधुनिकता की अनकही कीमत”

😊 कृपया इस न्यूज को शेयर करें😊

संपादकीय

अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ साप्ताहिक विशेषांक

✍️‘कलम की धार’✍️

By ACGN 7647981711, 9303948009

जनहित, तथ्य और साहस का साप्ताहिक मंच-जहाँ सच कहा जाता है, सवाल पूछे जाते हैं, और कीमत जानकर भी कलम नहीं रुकती, जनहित के मुद्दों को केंद्र में रखकर, जनसमस्याओं को निर्भीक स्वर देने वाला और भ्रष्टाचार के विरुद्ध बेबाक आवाज उठाने वाला मंच है अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ का साप्ताहिक विशेषांक “कलम की धार” हमारा उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि उन सवालों को उजागर करना है जिन्हें अक्सर दबा दिया जाता है।

हम निष्पक्ष, निर्भीक और तथ्याधारित पत्रकारिता के माध्यम से जनता की वास्तविक समस्याओं, स्वास्थ्य, शिक्षा, प्रशासनिक लापरवाही, व्यवस्था की खामियों और जनजीवन से जुड़े मुद्दों को सीधे शासन और प्रशासन तक पहुँचाने का दायित्व निभाते हैं।

आज भी अनेक जनसमस्याएँ वर्षों से जस की तस बनी हुई हैं। कहीं योजनाएँ कागज़ों में सीमित हैं, कहीं भ्रष्टाचार विकास को निगल रहा है, तो कहीं व्यवस्था की चुप्पी आम नागरिक को असहाय बना रही है। “कलम की धार” इन्हीं अनदेखे और अनसुने विषयों पर प्रहार करती है, तथ्यों के साथ, प्रमाणों के साथ और जनहित की स्पष्ट मंशा के साथ।

हम मानते हैं कि पत्रकारिता केवल खबर नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व है। जब तक व्यवस्था जवाबदेह नहीं बनेगी, तब तक सवाल उठते रहेंगे  और हमारी कलम जनहित में चलती रहेगी।

आज का विषय – वैदिक चेतना से मशीन युग तक: क्या हमने सुविधा के बदले स्वास्थ्य गिरवी रख दिया?

लेखक: प्रदीप मिश्रा

आज शहरों में हर चीज़ आसान हो गई है। एक बटन दबाओ कपड़े धुल जाते हैं। एक ऐप खोलो खाना घर आ जाता है। गाड़ी स्टार्ट करो दो कदम की दूरी भी पैदल चलने की ज़रूरत नहीं।

सवाल यह है कि क्या सचमुच हमारी ज़िंदगी आसान हुई है या हमारा शरीर कमजोर होता जा रहा है?

पहले लोग कम बीमार क्यों पड़ते थे?

पहले हमारे बुज़ुर्गों के पास न जिम था, न सप्लीमेंट, न महंगी दवाइयाँ। फिर भी वे 70–80 साल तक सक्रिय रहते थे। इसका कारण था उनकी जीवनशैली, सुबह जल्दी उठना, खेत या काम में शारीरिक श्रम, घर का सादा खाना, समय पर सोना यही उनकी दिनचर्या थी।

प्राचीन भारत में स्वास्थ्य को केवल बीमारी का इलाज नहीं माना जाता था। यह जीवन जीने का तरीका था,सुश्रुत और चरक जैसे आचार्यों ने हजारों वर्ष पहले शरीर, शल्य चिकित्सा और औषध विज्ञान पर गहराई से काम किया। आयुर्वेद का साफ सिद्धांत था  “रोग होने ही न दो।”

आज हालत उलटी है। बीमारी पहले आती है, इलाज बाद में ढूंढते हैं।

मशीनें बढ़ीं, चलना कम हुआ

पहले लोग 3–4 किलोमीटर पैदल चल लेते थे। आज 300 मीटर भी बाइक से जाते हैं, पहले कपड़े हाथ से धुलते थे कंधे और हाथ मजबूत रहते थे।पहले घर में अनाज कूटा जाता था, शरीर को रोज़ व्यायाम मिलता था,पहले पानी भरने, झाड़ू लगाने, खेत में काम करने से शरीर सक्रिय रहता था।

आज मशीनों ने मेहनत कम कर दी, पर बीमारियाँ बढ़ा दीं। आज वर्तमान में अधिकांश लोगों में मोटापा, शुगर (मधुमेह), ब्लड प्रेशर, दिल की बीमारी  ये अब अमीर-गरीब सबके घर में मिल जाती हैं।

क्या यह केवल किस्मत है? या हम खुद अपनी जीवनशैली से बीमारी बुला रहे हैं?

खाना बदला, शरीर बिगड़ा

गोबर की खुशबू से गैस के धुएँ तक: क्या बदल गया हमारे भोजन और शरीर में?

पहले लोग घर का ताज़ा खाना खाते थे, मोटा अनाज, दाल, हरी सब्ज़ी, मौसमी फल

पहले खेती केवल उत्पादन नहीं थी, जीवन का हिस्सा थी। खेतों में जैविक खेती होती थी। गोबर की खाद डाली जाती थी। हर घर में गाय पाली जाती थी। आँगन की सफाई, गोबर से लिपे घर, मिट्टी की ठंडक यह सब केवल परंपरा नहीं, सेहत का हिस्सा था, गाय के गोबर में प्राकृतिक जीवाणुनाशक गुण माने जाते थे। घरों को गोबर से लीपने से वातावरण शुद्ध रहता था। पैरों के संपर्क से मिट्टी और गोबर का स्पर्श शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करता था, चूल्हे में लकड़ी या उपले से खाना बनता था। पीतल, कांसे और कांच के बर्तनों का उपयोग होता था ये धातुएँ भोजन के गुणों को संतुलित रखने में सहायक मानी जाती थीं। खाना मौसमी होता था, जो फसल जिस मौसम में उगती, वही खाई जाती थी।

आज तस्वीर बदल गई है, खेतों में रासायनिक खाद, यूरिया, कीटनाशक और इंजेक्शन आधारित खेती ने उत्पादन तो बढ़ा दिया, पर जमीन की ताकत कम कर दी। अब 12 महीने हर सब्जी और फल बाजार में मिल जाते हैं, पर क्या उनमें वही पोषण है?

गैस चूल्हे और स्टील या एल्युमिनियम के बर्तनों ने सुविधा तो दी, लेकिन पारंपरिक तरीकों से मिलने वाला प्राकृतिक संतुलन धीरे-धीरे कम होता गया,पहले भोजन कम था, पर शुद्ध था,आज भोजन अधिक है, पर शुद्धता पर सवाल है, आज पैकेट वाला खाना, फास्ट फूड, ठंडा पेय और देर रात का भोजन आम हो गया है,पहले लोग जमीन पर बैठकर हाथ से खाते थे। इससे पाचन तंत्र सक्रिय होता थापहले तांबे या पीतल के बर्तन में पानी रखा जाता था,आज प्लास्टिक और केमिकल हमारे भोजन का हिस्सा बन गए हैं।

फिर हम पूछते हैं  पेट की समस्या क्यों बढ़ रही है?यही कारण है कि पहले लोग कम बीमार पड़ते थे। उनका शरीर प्रकृति के संपर्क में रहता था। आज उत्पादन बढ़ा है, पर प्रतिरोधक क्षमता घटी है।

सवाल यह नहीं कि आधुनिकता गलत है सवाल यह है कि क्या हमने सुविधा के लिए शुद्धता और स्वास्थ्य से समझौता कर लिया?

सोचने की ज़रूरत है,क्योंकि स्वस्थ शरीर ही मजबूत समाज की असली नींव है।

कपड़े और आभूषण भी विज्ञान थे

पहले पहनावा केवल दिखावे के लिए नहीं होता था, शरीर की जरूरत के अनुसार होता था। सूती, खादी और ढीले-खुले कपड़े पहने जाते थे ताकि शरीर को हवा मिले, पसीना सूखे और त्वचा सांस ले सके। धोती, साड़ी, कुर्ता जैसे परिधान शरीर के तापमान को संतुलित रखने में मदद करते थे।

आज की टाइट जींस, सिंथेटिक और टेरीकॉट जैसे कपड़े शरीर को कसकर पकड़ते हैं। इससे पसीना रुकता है, त्वचा रोग, फंगल इंफेक्शन और रक्तसंचार में बाधा जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। लगातार तंग कपड़े पहनने से पेट, कमर और जांघों के हिस्से में दबाव बढ़ता है, जो लंबे समय में नुकसानदायक हो सकता है।

आभूषण भी केवल श्रृंगार नहीं थे।

सोना प्रायः गले, कान और हाथों में पहना जाता था  माना जाता था कि यह हृदय और मस्तिष्क के पास ऊर्जा संतुलन में सहायक होता है, चांदी पैरों में  पायल, बिछिया  के रूप में पहनी जाती थी। इसे शीतल धातु माना गया, जो शरीर की अतिरिक्त गर्मी को संतुलित करने में सहायक समझी जाती थी, नाक और कान छेदन को भी शरीर के विशेष बिंदुओं से जोड़ा जाता था।

आजकल नकली या मिलावटी धातुओं के आभूषण, सस्ता तांबा-पीतल या केमिकल मिश्रित धातु पहनी जाती हैं। इससे त्वचा में एलर्जी, खुजली, रैशेज़ और संक्रमण की समस्या हो सकती है, पहले पहनावा शरीर के अनुकूल था,आज पहनावा फैशन के अनुकूल है, फैशन जरूरी है, पर स्वास्थ्य उससे भी ज्यादा जरूरी है, 

शायद हर परंपरा के पीछे कोई कारण था, जिसे हमने बिना समझे “पुराना” कहकर छोड़ दिया।

डिजिटल जीवन और मानसिक तनाव

पहले लोग शाम को परिवार के साथ बैठते थे। बातचीत होती थी, आज हर व्यक्ति मोबाइल में व्यस्त है। देर रात तक स्क्रीन देखना, कम नींद लेना इससे मानसिक तनाव, चिड़चिड़ापन और अवसाद बढ़ रहा है।

हम आधुनिक तो दिख रहे हैं, पर क्या हम भीतर से संतुलित हैं?

क्या समाधान है?, समाधान मशीन छोड़ना नहीं है।समाधान है संतुलन।

रोज़ थोड़ा पैदल चलें, घर का सादा और ताज़ा भोजन लें, समय पर सोएँ और उठें, बच्चों को मोबाइल से ज़्यादा मैदान दें, शरीर को रोज़ थोड़ा श्रम दें

आधुनिकता बुरी नहीं है, पर अति हर चीज़ की बुरी है।

भारत ने कभी दुनिया को संतुलित जीवन जीने का तरीका दिया था। आज ज़रूरत है कि हम उसी समझ को नए दौर में अपनाएँ।

आख़िरी सवाल

क्या हम सुविधा के पीछे भागते-भागते अपना स्वास्थ्य खो रहे हैं?

क्या हम अपने बच्चों को केवल टेक्नोलॉजी सिखा रहे हैं, या स्वस्थ जीवन भी?

यह लेख किसी परंपरा को थोपने के लिए नहीं, बल्कि सोचने के लिए है।

क्योंकि सच यही है, अगर शरीर स्वस्थ नहीं रहेगा, तो सुविधा भी बेकार हो जाएगी।

और यही सवाल आज “कलम की धार” उठा रही है 

क्या हमने सचमुच प्रगति की है, या केवल आराम की आदत पाल ली है?

सोचिए… क्योंकि यह मुद्दा केवल परंपरा का नहीं, हमारे भविष्य का है।

अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ का जनमंच

   ✍️ ‘कलम की धार’ ✍️

जनहित से जुड़े मुद्दे, भ्रष्टाचार का बेबाक विश्लेषण, राजनीति की सच्ची तस्वीर, लोक पर्व, संस्कार और संस्कृति, अपने क्षेत्र के पर्यटन स्थल, प्राचीन धरोहरों पर आलोचनात्मक दृष्टि

यदि आपके मन में कोई ऐसा विचार है,

जिसे आप लेख के रूप में समाज के सामने रखना चाहते हैं, तो “कलम की धार” आपके लिए एक खुला और निष्पक्ष मंच है, आप अपने लेख, विचार और शोधपरक सामग्री हमें भेज सकते हैं।

📞 संपर्क नंबर:

7647981711 – 9303948009

अपनी कलम को आवाज़ दें, समाज की सच्चाई को सामने लाएं।

Whatsapp बटन दबा कर इस न्यूज को शेयर जरूर करें 

Advertising Space


स्वतंत्र और सच्ची पत्रकारिता के लिए ज़रूरी है कि वो कॉरपोरेट और राजनैतिक नियंत्रण से मुक्त हो। ऐसा तभी संभव है जब जनता आगे आए और सहयोग करे.

Donate Now