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Anjor Chhattisgarh News

सच की तह तक

“गरीब को सहारा, अमीर को सुविधा… तो फिर मध्यमवर्ग की सज़ा क्या है?”

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संपादकीय

अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ साप्ताहिक विशेषांक

✍️ ‘कलम की धार’ ✍️

By ACGN 7647981711, 9303948009

जनहित, तथ्य और साहस का साप्ताहिक मंच-जहाँ सच कहा जाता है, सवाल पूछे जाते हैं, और कीमत जानकर भी कलम नहीं रुकती।

कलम की धार’ कोई औपचारिक कॉलम नहीं, बल्कि व्यवस्था के मौन को तोड़ने वाली आवाज़ है। यह उन सवालों की चोट है, जिन्हें फाइलों में दबा दिया जाता है;
उन सच्चाइयों का आईना है, जिन्हें विकास की चमक में छुपा दिया जाता है।
यह सत्ता से टकराव नहीं, पर चुप्पी से समझौता भी नहीं करता, यह आम आदमी की थकान, आक्रोश और अधूरी उम्मीदों को शब्द देता है,
ताकि शासन पढ़े, प्रशासन देखे और व्यवस्था अपने ही आईने से नज़र न चुराए।

आज का विषय – तीन भारत, तीन सच्चाइयाँ सबसे अकेला वही, जो देश चलाता है, बढ़ती महंगाई, असमान सुरक्षा और उपेक्षित मध्यमवर्ग, जहाँ वेतन राहत नहीं, सिर्फ़ गुज़ारे का बहाना बन जाता है, और संघर्ष रोज़मर्रा की जीवनचर्या।

लेखक : प्रदीप मिश्रा

न मुफ्त का हक़, न अमीरी की ताकत,मध्यमवर्ग की अदृश्य त्रासदी

हमारा देश भारत जो एक धर्म निरपेक्ष लोकतांत्रिक राष्ट्र है ,यहाँ वर्तमान में एक नारा सबसे ज़्यादा गूंजता है“सबका साथ, सबका विकास।” लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि यह देश तीन हिस्सों में बंट चुका है

अमीर, गरीब और मध्यमवर्ग।

तीनों का भारत एक है, लेकिन तीनों की ज़िंदगी, सुविधाएँ और सुरक्षा बिल्कुल अलग-अलग हैं।

पहला भारत : अमीरों का भारत

यह वह वर्ग है जो देश में बड़े बड़े निवेश करते है व्यापर करते है जिन्हें सरकार व्यापर के नाम पर कई प्रकार की छुट भी देती है बैंक बड़ी रकम का लोने भी देते है जिसे वह निवेश कर देश के अर्थ व्यवस्था का भागीदार बनता है जिसे शासन के साथ साथ प्रशासन का भरपूर सहयोग मिलता है क्योकि वह राजनेताओ के और शासन के करीबी होते है जहाँ सुविधा अधिकार नहीं, आदत बन चुकी है यह वह वर्ग है जो बड़े उद्योग लगाता है, बड़े निवेश करता है, बड़े नामों के साथ बैठता है। सरकार इसे “इंवेस्टर” कहती है, प्रशासन इसे “ग्राहक” समझता है। इन्हें सरकार द्वारा टैक्स में छूट, जमीन में रियायत, बैंक से करोड़ों का लोन, नीतियों में सहूलियत, अफसरों तक सीधी पहुँच, अगर नुकसान हो जाए तो पैकेज, अगर घाटा हो जाए तो राहत, अगर नियम टूट जाए तो समझौता।

यह वर्ग देश की अर्थव्यवस्था का “पार्टनर” है, इसलिए इसके लिए दरवाज़े हमेशा खुले रहते हैं।

दूसरा भारत : गरीबों का भारत

दूसरा गरीब वर्ग जो शासन के खास होते है शासन इन्हें हर वो चीज मुफ्त देने का प्रयास करता है जो दिया जा सके आजकल शासन इन्हें बी पी एल कार्ड मुहैया कराकर इन्हें गरीबी रेखा में जीवन यापन करने का प्रमाण देता है यह कार्ड गरीबी का लिखित प्रमाण पत्र है जिससे शिक्षा, शासन की  मुफ्त योजनाओ का लाभ मिलता है जहाँ पहचान बीपीएल कार्ड है आजकल शासन इन्हें बी पी एल कार्ड मुहैया कराकर इन्हें गरीबी रेखा में जीवन यापन करने का प्रमाण देता है यह कार्ड गरीबी का लिखित प्रमाण पत्र है यह वह भारत है जिसे सरकार “कल्याणकारी योजनाओं” से देखती है। यहाँ गरीबी सिर्फ हालात नहीं, एक कार्ड है बीपीएल कार्ड। जिससे सरकार इन्हें मुफ्त राशन, मुफ्त इलाज, मुफ्त आवास, छात्रवृत्ति, आयुष्मान कार्ड, गैस, बिजली, पानी में सब्सिडी कुल मिलाकर पैदा होने से लेकर मृत्यु तक सब कुछ मुहैया कराती है 

गरीब की ज़रूरतें असली हैं और मदद ज़रूरी भी है, लेकिन सच यह भी है कि गरीबी को प्रमाणपत्र बना दिया गया है। गरीबी अब दुख नहीं, योजना बन चुकी है।

तीसरा भारत : मध्यमवर्ग

जिन्हें न योजना है, न प्राथमिकता, न इतना गरीब कि योजना मिले, न इतना अमीर कि व्यवस्था झुक जाए। यही वह वर्ग है जो पूरा टैक्स देता है, हर नियम मानता है, हर बिल समय पर भरता है और फिर भी हर राहत से बाहर रह जाता है

अब आता है वह भारत, जो हर सुबह उठकर देश को चलाने निकलता है और हर रात थककर चुप हो जाता है। मध्यम वर्ग आज के  भारत में एक नहीं, दो समानांतर सच्चाइयों में जी रहा है। एक भारत वह है, जो फाइलों में सुरक्षित है वेतनमान, महंगाई भत्ता, एरियर, पेंशन और मेडिकल सुविधाओं की मजबूत दीवारों के भीतर, और दूसरा भारत वह है, जो हर सुबह बढ़ती महंगाई से जूझने निकलता है और हर रात थककर चुप हो जाता है। इस दूसरे भारत का नाम है मध्यमवर्ग।

वह मध्यमवर्ग, जो न सरकारी प्राथमिकताओं की सूची में है, न चुनावी घोषणाओं का स्थायी विषय, लेकिन उसी के कंधों पर पूरी अर्थव्यवस्था, पूरा तंत्र, पूरा समाज टिका हुआ है। महंगाई बढ़ती है रसोई गैस, बिजली, राशन, दूध, दवा, स्कूल फीससब कुछ। सत्ता आश्वस्त करती है “वेतनमान बढ़ा दिया गया है, महंगाई भत्ता बढ़ा दिया गया है।” लेकिन यह राहत कागज़ों में दर्ज एक भारत तक सीमित रहती है। शासकीय कर्मचारियों के पास नौकरी की सुरक्षा है, नियमित वेतन है, पेंशन है, इलाज की सुविधा है। यह उनकी गलती नहीं लेकिन यही वह बिंदु है, जहाँ से असमानता की गहरी दरार शुरू होती है।

इसी देश में दूसरा भारत भी है छोटा व्यापारी, निजी कर्मचारी, स्वरोज़गार करने वाला युवक, दिहाड़ी मज़दूर। जिसे न वेतन आयोग पहचानता है, न डीए का लाभ मिलता है, न भविष्य लिखित होता है। उसकी आय अनिश्चित है, लेकिन खर्च निश्चित हैं। दुकान खुलेगी या नहीं यह सवाल है, ग्राहक आएगा या नहीं यह डर है, लोने मिलेगा या नहीं यही सोचता, लेकिन बिजली बिल आएगा, बच्चों की फीस भरनी होगी, घर का राशन खत्म होगा यह तय है। महंगाई उसके लिए कोई आँकड़ा नहीं, रोज़ का ज़ख्म है।

शिक्षा : जहाँ सपने सबसे महंगे हैं

मध्यमवर्ग की कमर शिक्षा ने सबसे ज़्यादा तोड़ी है।सरकारी स्कूलों की हालत ऐसी कि वह अपने बच्चों का भविष्य वहाँ छोड़ने से डरता है। निजी स्कूलों में जाता है तो शिक्षा नहीं, व्यवस्थित आर्थिक शोषण मिलता है।एडमिशन फीस, स्मार्ट क्लास, एक्टिविटी चार्ज, किताबें, यूनिफॉर्म हर साल नई फीस, नया बहाना।

गरीब के लिए छात्रवृत्ति है, अमीर के लिए विकल्प हैं, लेकिन मध्यमवर्ग के लिए सिर्फ समझौते हैं। वह अपने शौक छोड़ता है, अपने सपने टालता है, ताकि बच्चों का भविष्य बचा सके।

स्वास्थ्य : इलाज नहीं, डर

मध्यमवर्ग के लिए बीमारी अब इलाज नहीं, दहशत बन चुकी है। सरकारी अस्पतालों में सुविधाओं की कमी, निजी अस्पतालों में इलाज से पहले पैसों की जाँच।एक ऑपरेशन, एक दुर्घटना, और वर्षों की जमा पूंजी खत्म। आयुष्मान जैसी योजनाएँ गरीबी रेखा तक सीमित हैं।

मध्यमवर्ग की आय बस इतनी होती है कि वह हर योजना से बाहर कर दिया जाता है जैसे व्यवस्था मान चुकी हो कि यह वर्ग बीमार नहीं पड़ता, और अगर पड़ता है तो अपने दम पर मरे।

आवास : सपना जो किश्तों में बिकता है

गरीबों के लिए आवास योजनाएँ हैं, अमीरों के लिए लग्ज़री प्रोजेक्ट। मध्यमवर्ग को अपना घर पाने के लिए 20–30 साल की ईएमआई में खुद को गिरवी रखना पड़ता है।किराए में रहने वाला मध्यमवर्गहर साल डर के साथ जीता है कब किराया बढ़े, कब मकान खाली करना पड़े। घर ले भी लिया तो सुकून नहीं, सिर्फ किश्तों की चिंता।

व्यापारी : जो अर्थव्यवस्था चलाता है, वही सबसे अकेला

छोटा व्यापारी और कारोबारी टैक्स देता है, रोज़गार देता है, लेकिन नीति बनाते समय सबसे पहले भुला दिया जाता है। जीएसटी की जटिलता, निरीक्षण का डर, ऑनलाइन कंपनियों की मार, बढ़ती लागत और घटता ग्राहक उसके लिए कोई आयोग नहीं बैठता, कोई राहत पैकेज नहीं आता।

 सवाल जो मध्यमवर्ग पूछना चाहता है

क्या मध्यमवर्ग सिर्फ टैक्स देने के लिए पैदा हुआ है? जब वह सबसे ज़्यादा टैक्स देता है, तो सबसे कम राहत क्यों पाता है?

क्या मध्यमवर्ग बीमार नहीं पड़ता? आयुष्मान जैसी स्वास्थ्य योजनाओं से उसे बाहर क्यों रखा गया है? क्या इलाज सिर्फ गरीब या अमीर का अधिकार है?

क्या बच्चों की शिक्षा सिर्फ अमीरों की बपौती है? निजी स्कूलों की मनमानी फीस पर सरकार की चुप्पी क्यों? मध्यमवर्ग के लिए गुणवत्तापूर्ण सरकारी शिक्षा कब?

क्या घर का सपना सिर्फ किश्तों की सज़ा है? गरीबों को आवास, अमीरों को लग्ज़री, मध्यमवर्ग को 30 साल की ईएमआई क्यों?

क्या मध्यमवर्ग का व्यापारी अपराधी है? जो टैक्स देता है, रोज़गार देता है, उसी को जीएसटी, निरीक्षण और ऑनलाइन कंपनियों से क्यों कुचला जाता है? क्या वेतनमान सिर्फ सरकारी कर्मचारियों के लिए है? निजी क्षेत्र, स्वरोज़गार और छोटे व्यापारियों के लिए महंगाई से लड़ने की कोई नीति क्यों नहीं?

क्या योजनाएँ सिर्फ वोट बैंक देखकर बनती हैं? क्या मध्यमवर्ग वोट नहीं देता? या उसका वोट इतना पक्का है कि उसे नज़रअंदाज़ किया जा सकता है?
क्या सरकार को लगता है कि मध्यमवर्ग कभी टूटेगा नहीं?

अगर वह चुप है, तो कमजोर नहीं बल्कि मजबूरी में खड़ा है।
 

हक़ की माँग मध्यमवर्ग कोई विशेषाधिकार नहीं माँग रहा, वह सिर्फ बराबरी चाहता है। शिक्षा में न्याय, स्वास्थ्य में सुरक्षा, आवास में सहारा, व्यापार में सम्मान और जीवन में भरोसा
अगर शासन–प्रशासन ने अब भी इसे सिर्फ सहने वाला वर्ग समझा, तो याद रखिए 
इतिहास गवाह है, जब मध्यमवर्ग सवाल पूछने लगता है, तो व्यवस्था को जवाब देना पड़ता है।

✍️ कलम की धार का सवाल
जिस देश को मध्यमवर्ग चलाता है, क्या उस देश में मध्यमवर्ग के लिए कोई नीति है?

सबसे खतरनाक सच

सबसे बड़ा सच यह है कि मध्यमवर्ग सबसे ज़्यादा टैक्स देता है, सबसे ज़्यादा नियम मानता है, और सबसे कम सवाल करता है। इसीलिए व्यवस्था को लगता है कि यही सबसे सुरक्षित वर्ग है इसे जितना दबाओ, यह उतना सह लेगा। लेकिन इतिहास गवाह है जब चुप रहने वाला वर्ग टूटता है, तो बदलाव भाषणों में नहीं, सड़कों पर दिखाई देता है।

यह लेख किसी शासकीय कर्मचारी के खिलाफ नहीं है। यह उस व्यवस्था से सवाल है, जो कुछ लोगों को पूरी सुरक्षा देती है और बाकी को सिर्फ सहनशीलता का पाठ पढ़ाती है।

उस थके हुए, पिसते हुए, लेकिन अब भी जिंदा मध्यमवर्ग की आवाज़ है। अगर यह आवाज़ आज भी अनसुनी रही, तो कल यह खामोशी नहीं रहेगी।

न गरीब है कि मदद मिले, न अमीर है कि बच जाए,

वह बस वही है जो हर बिल समय पर चुकाए।

न नारों में उसका नाम, न योजनाओं में पहचान,

वह टैक्स में लिखा जाता है, और आँकड़ों में मिट जाता है। वह देश चलाता है

अपने सपनों की कुर्बानी देकर, और हर रात सोता है कल की चिंता ओढ़कर।

महंगाई के इस राज में सबसे बड़ा अपराध यही है कि वह मध्यमवर्ग है,और फिर भी चुप है।

 

 

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