बस्तर की आत्मा, संस्कृति और संघर्ष से उपजी प्रतिभा ने देश को दिया आत्मविश्वास
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बस्तर | छत्तीसगढ़
By ACGN 7647981711, 9303948009
बस्तर पंडुम-2026 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का भावनात्मक संदेश, अबूझमाड़ के नन्हे मल्लखंब खिलाड़ियों ने रचा इतिहास
जगदलपुर ACGN :- बस्तर की धरती ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि यह केवल जंगलों और संघर्षों की भूमि नहीं बल्कि संस्कृति, आत्मा और अपार प्रतिभा की जननी है। संभाग स्तरीय बस्तर पंडुम-2026 के भव्य शुभारंभ अवसर पर राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु की उपस्थिति और उनके उद्बोधन ने पूरे आयोजन को ऐतिहासिक बना दिया।

माँ दंतेश्वरी के जयघोष के साथ अपने संबोधन की शुरुआत करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि आदिवासी संस्कृति में ही छत्तीसगढ़ की आत्मा बसती है और बस्तर उस आत्मा का सबसे सशक्त प्रतीक है।



जगदलपुर के ऐतिहासिक लालबाग मैदान में आयोजित इस कार्यक्रम में हजारों की संख्या में आदिवासी कलाकार, ग्रामीणजन, महिलाएँ, युवा और जनप्रतिनिधि उपस्थित रहे। पारंपरिक वेशभूषा, ढोल-नगाड़ों की गूंज और लोकनृत्यों की छटा ने पूरे वातावरण को जीवंत बना दिया। राष्ट्रपति ने कहा कि छत्तीसगढ़ देश का ऐसा राज्य है जहाँ जनजातीय संस्कृति और परंपराओं को बचाने और आगे बढ़ाने के लिए सरकार गंभीरता से काम कर रही है। बस्तर पंडुम जैसे आयोजन जनजातीय समाज के गौरव और पहचान को मजबूती प्रदान करते हैं।



राष्ट्रपति ने बताया कि इस वर्ष बस्तर पंडुम में 12 विभिन्न विधाओं में 54 हजार से अधिक आदिवासी कलाकारों का पंजीयन हुआ है जो यह दर्शाता है कि बस्तर का समाज आज भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से मजबूती से जुड़ा हुआ है। उन्होंने आदिवासी बालिकाओं की शिक्षा पर विशेष जोर देते हुए कहा कि बेटियों को पढ़ाना केवल शासन की जिम्मेदारी नहीं बल्कि समाज और माता-पिता की भी साझा जिम्मेदारी है। शिक्षित बेटियाँ ही सशक्त समाज और उज्ज्वल बस्तर की नींव रखेंगी।

अपने संबोधन में राष्ट्रपति ने बस्तर के बदले हालातों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि वर्षों तक यह क्षेत्र हिंसा और माओवाद से प्रभावित रहा जिससे आम लोगों को भारी कष्ट झेलने पड़े। लेकिन अब स्थिति बदल रही है। लोग हिंसा का रास्ता छोड़कर लोकतंत्र और विकास की मुख्यधारा से जुड़ रहे हैं। वर्षों से बंद स्कूल दोबारा खुल रहे हैं। दुर्गम इलाकों तक सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएँ पहुँच रही हैं और लोगों के मन में विश्वास लौट रहा है।

इसी ऐतिहासिक मंच पर बस्तर की बदलती तस्वीर उस समय और गहराई से सामने आई जब सुदूर वनांचल अबूझमाड़ के नन्हे बच्चों ने राष्ट्रपति के समक्ष मल्लखंब की अद्भुत प्रस्तुति दी। अबूझमाड़ मल्लखंब एंड स्पोर्ट्स एकेडमी के इन बच्चों ने लकड़ी के खंभे पर संतुलन, फुर्ती और साहसिक करतब दिखाकर पूरे मैदान को तालियों से गूंजा दिया। राष्ट्रपति स्वयं बच्चों की कला, अनुशासन और आत्मविश्वास से इतनी प्रभावित हुईं कि उन्होंने ताली बजाकर उनका उत्साह बढ़ाया और उज्ज्वल भविष्य की कामना की।

कुटूर, करपा और परपा जैसे दुर्गम इलाकों से निकलकर इन बच्चों ने यह सिद्ध कर दिया कि प्रतिभा न संसाधनों की मोहताज होती है और न ही हालातों की। इस संघर्षपूर्ण सफलता के पीछे एकेडमी के संस्थापक मनोज प्रसाद की मेहनत और समर्पण है जो स्वयं 16वीं बटालियन में आरक्षक के रूप में सेवाएं दे रहे हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने बच्चों को अनुशासन, आत्मविश्वास और सपने देखने की ताकत दी।

इन नन्हे खिलाड़ियों ने पहले ही इंडियाज गॉट टैलेंट का खिताब जीतकर और रोमानियाज गॉट टैलेंट में उपविजेता बनकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत और बस्तर का नाम रोशन किया है। अब यह टीम भविष्य में अमेरिका और ब्रिटेन जैसे बड़े वैश्विक मंचों पर देश की लोककला और खेल प्रतिभा को प्रस्तुत करने की तैयारी में है।

बस्तर पंडुम के इस मंच से एक ओर जहाँ जनजातीय संस्कृति का उत्सव मनाया गया वहीं दूसरी ओर अबूझमाड़ के बच्चों की प्रस्तुति ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि नया बस्तर अब डर और हिंसा की पहचान से बाहर निकल चुका है। आज का बस्तर विश्वास, संस्कृति, शिक्षा, खेल और प्रतिभा के रास्ते आगे बढ़ रहा है। यह आयोजन न केवल बस्तर बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ और देश के लिए आत्मगौरव और उम्मीद का प्रतीक बन गया।

प्रदीप मिश्रा
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